
१. ‘सनातन राष्ट्र’ की संकल्पना
सनातन सिद्धांत मूलरूप से कल्याणकारी, व्यक्ति की ऐहिक-पारमार्थिक उन्नति साधनेवाले तथा सर्वसमावेशी हैं । वे किसी भी व्यक्तिसमूह तक सीमित नहीं हैं, अपितु अखिल मानवाजाति के लिए ही लागू हैं । सनातन के सिद्धांत न्याय, समानता, नीति, योग, साधना आदि पर आधारित हैं । वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत, ज्ञानेश्वरी आदि सनातन के धर्मग्रंथों में इस विषय में सिद्धांत हैं । सनातन राष्ट्र इन सिद्धांतों पर चलनेवाला एक आदर्श कल्याणकारी राष्ट्र होगा । संक्षेप में कहा जाए, तो ‘कलियुग में त्रेतायुग के रामराज्य का स्वरूप ही ‘सनातन राष्ट्र’ है, ऐसा कहा जा सकता है ।
२. वर्तमान स्थिति तथा धर्म के अधिष्ठान का महत्त्व
वर्तमान धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में गो (गोमाता), गंगा, गीता, तुलसी, मठ-मंदिर आदि सनातन के मानबिंदुओं पर निरंतर आघात हो रहे हैं । आधुनिकता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सनातन के आस्था के केंद्रों का हनन किया जा रहा है । हिन्दुओं की धार्मिक परंपराओं तथा आचारों को अंधविश्वास का ‘लेबल’ लगाया जा रहा है । वैदिक विज्ञान को ‘छद्म विज्ञान’ बोलते हुए उसकी आलोचना की जा रही है । पारिवारिक स्तर पर देखा जाए, तो देवीस्वरूप मानी जानेवाली महिला सुरक्षित नहीं है । परिवारों में भी एक-दूसरे के प्रति अपनापन तथा प्रेम अल्प हुआ है । व्यक्ति भौतिक दृष्टि से भले ही संपन्न हुए हों, तब भी मानसिक दृष्टि से दुर्बल हुए हैं तथा संकटों का सामना करने की लोगों की क्षमता क्षीण हुई है, ऐसा देखने को मिलता है । इस पूरी स्थिति का प्रमुख कारण है धर्माचरण एवं साधना-उपासना के बल का अभाव ! धर्म का अधिष्ठान हो, तभी व्यक्ति की, अपितु समाज एवं राष्ट्र की उन्नति होती है । धर्मविहीन भारत केवल भूगोल है, अतः भारत के गौरवशाली इतिहास की परंपरा भविष्य में भी आगे बढानी हो, तो उसके लिए धर्म की रक्षा होना आवश्यक है ।

वैश्विक इतिहास में अनेक संस्कृतियां उदित हुई तथा विलुप्त भी हुईं, उदा. इजिप्शियन, ग्रीक, रोमन संस्कृति आदि; परंतु राजनीतिक संघर्ष, विदेशी आक्रमण, प्राकृतिक आपदाएं आदि संकटों का सामना करते हुए केवल एक ही संस्कृति टिकी रही, वह है ‘सनातन संस्कृति’ ! सनातन अर्थात शाश्वत, चिरंतन टिका रहनेवाला; परंतु तब भी नित्य नूतन तत्त्व ! सनातन धर्म ने सदैव ही विश्वकल्याण की संकल्पना रखी है । सनातन धर्म ही भारत का प्राण है । जब तक सनातन धर्म का अनुकरण हो रहा था, तब तक भारत वैभव के शिखर पर था; परंतु विगत कुछ दशकों में जानबूझकर सनातन धर्म की ओर अवहेलना की दृष्टि से देखा गया । उसके परिणामस्वरूप अनेक पारिवारिक, मानसिक, सामाजिक, धार्मिक तथा राष्ट्रीय संकट उत्पन्न हुए । वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय अनुदान पर पोषित अनेक व्यक्ति तथा संगठन सनातन धर्म को मिटाने का बीडा उठाकर कार्यरत हुए हैं । इस पृष्ठभूमि पर सनातन धर्म की रक्षा हेतु देवता, देश एवं धर्म की सेवा करनेवाले व्यक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनों का संगठन तथा उनमें जागृति आना आवश्यक है । सनातन धर्म के सशक्तिकरण से ही रामराज्य के समान तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण संभव है । उसके लिए ही गोवा में १७ से १९ मई की अवधि में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद’ महोत्सव का आयोजन किया गया है ।
संकलनकर्ता : श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था
३. सनातन राष्ट्र की आवश्यकता

वर्तमान समय में धर्म पर हो रहे आघातों के विरुद्ध जागृति आकर भले ही धर्म की रक्षा के लिए आंदोलन चलाए जा रहे हों, तब भी हिन्दुत्व पर हो रहे आघात पूर्णतया रुके नहीं हैं । ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ जैसे (प्रार्थनास्थल कानून जैसे) काले कानूनों ने विदेशी आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त मंदिरों के पुनर्निर्माण का मार्ग रोक लिया है । हाल ही में पारित वक्फ कानून के संशोधन के कारण वक्फ बोर्ड की मनमानी पर कुछ स्तर तक लगाम लगी है, ऐसा कहा जा सकता है । भले ही ऐसा हो, तब भी इस कानून का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन होकर धर्मांधों द्वारा अवैधरूप से हडप ली गई भूमियां कब खुली सांस लेंगी, यह तो आनेवाला समय ही बता पाएगा । वर्तमान में घुसपैठ के गंभीर संकट के कारण अनेक प्रदेश भारत से अलग होने की स्थिति में हैं । वर्तमान व्यवस्था में राष्ट्र एवं धर्म पर हो रहे आघातों का सक्षमता से सामना न किए जाने से सनातन राष्ट्र की आवश्यकता है । देश का विकास केवल ‘जीडीपी’ (सकल घरेलु उत्पाद की दर) अथवा ‘टेक्नोलॉजी’ (प्रौद्योगिकी) के कारण नहीं होता, अपितु वह धर्म के कारण होता है । (धर्मेण जयति राष्ट्रम्); इसीलिए भारतीय संस्कृति में सोने की लंका की नहीं, अपितु श्रीराम के रामराज्य की पूजा की जाती है ।
४. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की दूरदर्शिता !
वर्तमान समय में ‘सनातन’, यह विषय बडे स्तर पर चर्चा में रहा है तथा हिन्दू राष्ट्र की मांग ने भी जोर पकड लिया है । सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने २७ वर्ष पूर्व अर्थात जिस काल में ‘सनातन’ शब्द तो छोड ही दीजिए; किंतु ‘हिन्दू’ शब्द का उच्चारण करना भी साहसपूर्ण माना जाता था, ऐसे काल में ‘ईश्वरीय राज्य की स्थापना’ नामक ग्रंथ लिखकर अध्यात्म पर आधारित राष्ट्ररचना की संकल्पना रखी । इससे संतों की दूरदर्शिता दिखाई देती है । अब तक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने धर्म, अध्यात्म, साधना आदि विषयों पर ३८० से अधिक ग्रंथों का संकलन किया है तथा भारतीय संस्कृति में समाहित कलाओं-विद्याओं को पुनर्जीवित करने के लिए अनेक उपक्रम चलाना आरंभ किया है । हिन्दुत्व पर हो रहे आघातों की जानकारी सर्वदूर पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘सनातन प्रभात’ नाम से प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ नियतकालिक आरंभ किया । उनकी प्रेरणा से हिन्दू एकता की दृष्टि से भी अनेक आंदोलन चलाए जा रहे हैं । अल्पावधि में देश-विदेशों में इस कार्य का हुआ विस्तार, उनके दैवी कार्य की ही साक्ष्य है ।
५. सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव

सनातन संस्था का रजत जयंती महोत्सव तथा सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ केवल धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, अपितु वह राष्ट्र एवं धर्म के पुनर्जागरण में एक महत्त्वपूर्ण चरण है । भारत के उज्ज्वल भविष्य का यह शंखनाद है । इस उपलक्ष्य में सनातन धर्म की सेवा हेतु क्रियाशील एवं गतिशील होना, एक प्रकार से राष्ट्ररचना अर्थात धर्मसंस्थापना के कार्य में भाग लेना ही है तथा यही वर्तमान काल की साधना भी है ।
संकलनकर्ता : श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
परिवार व्यवस्था, धर्मसंस्था एवं शिक्षाप्रणाली को साम्यवाद से संकट !
अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास का महत्त्व !
हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से अमृता विश्वविद्यापीठम् के निदेशक डॉ. यु. कृष्णकुमार से सद्भावना भेंट !
आपातकालीन स्थिति : ऊर्जा सुरक्षा, अति आवश्यक आपूर्ति एवं ऊर्जा की बचत !
धर्मनिरपेक्षता और हिन्दू राष्ट्र !