१. राजौरी (जम्मू-कश्मीर) में सहस्रों हिन्दुओं के नरसंहार से हिन्दू अनभिज्ञ
वर्ष १९४७ में भारत में महाराजा हरि सिंह ने विलय संबंधी ‘करारनामे’ पर हस्ताक्षर किए । उससे २ – ३ दिन पूर्व दीपावली के दिन पाकिस्तानी घुसपैठियों ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी पर नियंत्रण ले लिया और २० सहस्र से अधिक हिन्दुओं का संहार किया । उससे संबंधित वहां ५ मंजिल का ‘बलिदान भवन’ बनाया गया है । वहां नरसंहार के विभिन्न श्वेत-श्याम छायाचित्र लगाए गए हैं । उनमें मानव खोपडियों का ढेर दर्शानेवाला एक छायाचित्र भी है । दीपावली के दिन घर के अधिकांश पुरुष वर्ग खरीदारी करने बाहर गए हुए थे, तभी पाकिस्तानी घुसपैठियों ने आक्रमण किया । उनसे शीलरक्षा करने के लिए अनेक महिलाओं ने धारदार शस्त्रों से आत्महत्या कर ली । जिनके पास कोई भी धारदार शस्त्र नहीं था, उन्होंने कांच की बोतलें फोडकर और उनके कांच खाकर मृत्यु को स्वीकार किया । हिन्दू महिलाओं ने शीलरक्षा के लिए अत्यंत पीडादायक मृत्यु का वरण किया; किन्तु वे जीवित धर्मांधों के हाथ नहीं लगीं । यह रक्तरंजित इतिहास भारत में रहनेवालों को भी ज्ञात नहीं है, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ।
श्री. गिरिधर मामिडी का परिचय

भाग्यनगर, तेलंगाना के श्री. गिरिधर मामिडी ‘प्रज्ञा भारती तेलंगाना’ के उपाध्यक्ष हैं । वे ‘गूगल इंडिया’ के प्रथम ‘वित्त एवं लेखा’ प्रमुख रहे हैं । अनेक दूरदर्शन चैनलों के चर्चासत्रों में वे वक्ता के रूप में सहभागी होते हैं । भारतीय सेना की विजय तथा ‘अखंड भारत’ की पुनर्स्थापना के लिए उन्होंने पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की सीमावर्ती क्षेत्रों में अनेक रुद्राभिषेक किए हैं ।
२. अधर्म का अधर्म से ही उत्तर देनेवाले भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का हिन्दुओं को विस्मरण
‘वर्ष १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात अंग्रेजों ने कानून बनाकर हिन्दुओं के शस्त्र छीन लिए और उन्हें निःशस्त्र कर दिया । उन्होंने वही कानून मुसलमानों पर लागू नहीं किया । परिणामस्वरूप विभाजन के समय जब धर्मांध मुसलमानों ने हिन्दुओं पर आक्रमण किया, तब निःशस्त्र हिन्दू अपना रक्षण नहीं कर सके । आंध्र प्रदेश के भाग्यनगर में वर्ष १९८० से १९९० के कालखंड में प्रतिवर्ष गणेशमूर्ति विसर्जन के समय कुछ न कुछ हिंसाचार अवश्य होता था । वहां के मुसलमान निर्दोष हिन्दुओं की हत्या करते थे । जब हिन्दुओं ने आत्मरक्षा के लिए प्रतिकार करना आरंभ किया, तब उसका प्रभाव धर्मांधों पर भी पडा । इसके पश्चात हिन्दुओं पर होनेवाले आक्रमण बंद हो गए । यदि सर्वत्र के हिन्दू भी उनका अनुकरण करें, तो उसमें आश्चर्य क्या है ? अन्यथा राजौरी जैसी घटनाएं पुनः-पुनः होती रहेंगी ।
दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण करने के कारण बाद में हुए महाभारत युद्ध में कौरवों की संपूर्ण १८ अक्षौहिणी सेना को भगवान श्रीकृष्ण ने संकल्प से पहले ही मार दिया था । उसमें भीष्म, कर्ण, द्रोणाचार्य, दुर्योधन आदि सभी का वध हुआ । इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम हिन्दू चाहे कितना भी धर्मानुसार आचरण करें, शत्रु किसी धर्म का पालन नहीं करता । इसलिए हमें भी अधर्म के साथ अधर्म से ही युद्ध करना चाहिए । यह इतिहास भूल जाने के कारण हिन्दुओं की स्थिति महाभारत के युद्ध में मोहग्रस्त अर्जुन जैसी तथा मोहम्मद गौरी के हाथों पराजित पृथ्वीराज चौहान जैसी हो गई है । हिन्दू स्त्रियों पर प्रतिदिन इतने अत्याचार हो रहे हैं, तब भी हिन्दू समाज की ओर से विशेष प्रतिकार होता हुआ दिखाई नहीं देता; क्योंकि हम इस शिक्षा को पूर्णतः भूल चुके हैं । अब पुनः उसकी ओर लौटने का समय आ गया है । जब तक हम लडाकू वृत्ति का विकास नहीं करेंगे, तब तक हमें मुक्ति नहीं मिलेगी । इसके लिए अपने बच्चों को सैन्य प्रशिक्षण देना आवश्यक है ।’
३. हिन्दुओं को शस्त्रसज्ज करनेवाली दक्षिण भारत की ‘वीरभद्रपल्यम्’ प्रथा
‘तेलंगाना में ‘आराछिलो’, अर्थात ‘लिंगाधार’ समाज है । वे शिवलिंग धारण कर उसकी पूजा करते हैं । वे स्वयं को ‘शिव’ मानते हैं । गृहप्रवेश, विवाह जैसे किसी भी मांगलिक अवसर पर उनके यहां ‘वीरभद्रपल्यम्’ नामक एक प्रथा प्रचलित है । इसमें संपूर्ण दिन शस्त्रपूजा की जाती है । वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जैसा किया था, उसी प्रकार वे पुनः शस्त्र हाथ में लेकर नगर की सभी गलियों में नृत्य करते हुए निकलते हैं । (देवी सती के आत्मदाह से क्रोधित भगवान शिव ने अपनी जटाओं से वीरभद्र की उत्पत्ति की थी । वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और अंत में अहंकार के मूर्त स्वरूप प्रजापति दक्ष का सिर धड से अलग कर दिया ।)
वर्ष ११५० से १३२३ के मध्य दक्षिण भारत (मुख्यतः तेलंगाना और आंध्र प्रदेश) में ‘काकतीय’ अत्यंत शक्तिशाली और समृद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश था । उन्होंने ‘ओरुगल्लू’ (वर्तमान वारंगल) से शासन किया था । कालांतर में वर्ष १३२३ में इस साम्राज्य का पतन हो गया और वहां मुसलमानों का शासन स्थापित हो गया । तब इन लोगों ने इस प्रथा का आरंभ किया । जब मुसलमान शासक आकर उनसे पूछते थे, तब वे कहते थे, ‘यह हमारे भगवान का अस्त्र है, हम इसकी पूजा कर रहे हैं । वीरभद्र ने जो किया था, हम उसी का अनुकरण कर रहे हैं ।’ इसके बाद वे अपने शरीर में एक सुई चुभोते हैं । उस समय यदि रक्त निकलता है, तो उसके माध्यम से समाज को संदेश देते हैं कि हम तुमसे भयभीत नहीं हैं । यह प्रथा ८०० वर्षों से चली आ रही है । इसलिए यदि हमें हिन्दू धर्म को सुरक्षित रखना है, तो हिन्दू समाज में पुनः लडाकू वृत्ति जागृत करने की आवश्यकता है ।
४. आई.एस.आई.एस. के आतंकवादियों को सबक सिखानेवाली कुर्दिश महिला योद्धा
आई.एस.आई.एस. के आतंकवादी मृत्यु से नहीं डरते; क्योंकि उन्हें बताया गया है कि ‘यदि धर्म के लिए मृत्यु हुई, तो स्वर्ग में ७२ अप्सराओं (७२ हूरों) का भोग मिलेगा ।’ वही आई.एस.आई.एस. के आतंकवादी कुर्दिश महिला योद्धाओं से भयभीत रहते हैं; क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि उनकी मृत्यु महिलाओं के हाथों हुई, तो अल्लाह उन्हें स्वर्ग नहीं देगा । आई.एस.आई.एस. के आतंकवादियों का सामना करने के लिए कुर्दिश महिला योद्धाओं की सेना तैयार की गई है । उन्हें देखकर आई.एस.आई.एस. के आतंकवादी पलायन कर जाते हैं ।
५. हिन्दू धर्मशास्त्र पर आधारित नया संविधान लिखना आवश्यक !
भारत के संविधान की आधारशिला वर्ष १९४६ में रखी गई थी । देश छोडकर जाते समय अंग्रेजों ने पहले से तैयार संविधान मसौदा समिति को सौंप दिया था । उसके बाद उसमें विशेष परिवर्तन नहीं किए गए । इसलिए वर्तमान संविधान को वास्तविक अर्थों में भारतीय संविधान नहीं कहा जा सकता । इस संविधान ने वर्तमान में हिन्दुओं को अधिकार नहीं, अपितु केवल कर्तव्य दिए हैं । ये सभी बातें ‘एंग्लो-क्रिश्चियन प्रोटेस्टेंट’ विचारधारा पर आधारित संविधान के अनुसार हैं । भारतीय संविधान दूसरी संस्कृति की विचारधारा के अनुसार बना है । इसलिए हिन्दू धर्मशास्त्र पर आधारित नए संविधान की मांग करना आवश्यक है ।’
– श्री. गिरिधर मामिडी, तेलंगाना अखिल भारतीय सदस्य, प्रज्ञा प्रवाह.
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