हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताओं के लिए आदर्श जीवन-पद्धति का महत्त्व !

१. स्वरक्षा प्रशिक्षण के माध्यम से शारीरिक सामर्थ्य की प्राप्ति

‘हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताओं को साधना का स्तर बढाना चाहिए । मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहा, ‘आप स्वरक्षा प्रशिक्षण देते हैं; परंतु एक कार्य और करना चाहिए । यदि हम केवल एक हाथ में भाला लेकर निकलेंगे, तो हमारा कल्याण नहीं होगा । हमें दूसरे हाथ में जपमाला लेकर भी चलना चाहिए ।’ साधना, भजन और अपनी आध्यात्मिक शक्ति को और अधिक बढाने के लिए प्रयास बढाने चाहिए । इसके लिए सभी को व्यक्तिगत साधना करना आवश्यक है ।

कार्यकर्ताओं में ब्राह्मतेज के साथ शौर्यवृत्ति भी बढनी चाहिए । अत: हमने स्वरक्षा हेतु भगिनियों को तलवारें वितरित कीं । मैं मातृशक्ति को लाठी चलाना सिखा रहा हूं । जिससे मुझे अनेक बार वाद-विवाद का सामना करना पडता है । एक वर्ष पूर्व आश्रम में कानून-व्यवस्था के नाम पर पुलिस ने एक धारा लगा दी थी । किसी को भी बाहर जाने नहीं दिया जा रहा था; परंतु ऐसे में भी हमने कार्य जारी रखा । हमारी ‘संस्कार वाहिनी’ के २० सहस्र लोग शांत नहीं बैठे । वे निरंतर कार्यरत रहे ।


पू. श्री रामबालकदास महात्यागी महाराजजी का परिचय

पू. श्री रामबालकदास महात्यागी महाराजजी

पूज्य श्री रामबालकदास महात्यागीजी महाराज, श्री जांभली पाटेश्वरदास रेवा महाराज संस्थान, छत्तीसगढ के संचालक हैं । वे इस संस्थान के माध्यम से धर्मांतरण रोकने, धर्मांतरितों को पुनः स्वधर्म में लाने, गोरक्षण तथा हिन्दू धर्मरक्षा हेतु संगठित रूप से प्रयास करते हैं । वे हिन्दू धर्मरक्षा के लिए राज्यभर के युवाओं को संगठित कर उन्हें धर्मशिक्षा देने का अभियान चला रहे हैं । वे ‘ऑनलाइन सत्संग’ के माध्यम से लाखों हिन्दुओं का मार्गदर्शन करते हैं । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो तथा देशभर में गोवंश हत्या पर प्रतिबंध लगे, इसके लिए वे संतों का संगठन कर रहे हैं ।

 

२. हिन्दू कार्यकर्ताओं के लिए भाषा, वेशभूषा और सात्त्विक आहार का महत्त्व

सबसे पहले, हम कहीं भी रहते हों, हमें अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए । केवल यहां ही नहीं, कभी भी और कहीं भी बोलते समय हमारी वाणी नम्र होनी चाहिए । हिन्दू कार्यकर्ताओं द्वारा ‘हैलो’, ‘हाय’ जैसे शब्दों का प्रयोग आरंभ करना उचित नहीं है । दूरभाष पर बात करते समय सदैव ‘जय श्रीराम’ अथवा ‘नमस्कार’ कहना चाहिए । कहीं भी एक-दूसरे को संबोधित करते समय आदरपूर्वक संबोधित करना चाहिए । सबसे पहले सामनेवाले व्यक्ति पर हमारी बोलने की शैली का प्रभाव पडता है । हमारी भाषा ही हमारी पहचान है । इसलिए हमारी व्यक्तिगत बोलने की शैली के आधार पर वह व्यक्ति हमारे विषय में मत बनाता है । हमारी भाषा अत्यंत संयमित, आध्यात्मिक और ब्रह्मनिष्ठ होनी चाहिए, साथ ही राष्ट्रीय एवं धार्मिक शब्दों से सुसज्जित भी होनी चाहिए ।

३. पारंपरिक आदर्श वेशभूषा

अपनी वेशभूषा अधिकाधिक भगवा अथवा सात्त्विक हिन्दुत्वनिष्ठ होनी चाहिए । हम किसी भी कार्यालय में जाएं, तो मस्तक पर तिलक लगाकर जाना चाहिए । इस तिलक से हमारा सम्मान बढता है । इसके साथ ही हमारे सिर पर शिखा (चोटी) भी होनी चाहिए । एक जिलाधिकारी किसी जिले में नियुक्त हुए थे । उन्होंने सुना कि निकटवर्ती जंगल में एक बस्ती है, जहां के लोग निर्वस्त्र रहते हैं । उस जिलाधिकारी ने उनसे मिलने का विचार किया । उन्होंने निश्चय किया, ‘जहां हम जाते हैं, वहां के लोगों जैसा बनकर जाना चाहिए । इसलिए आज हम वस्त्र धारण नहीं करेंगे ।’ जिलाधिकारी के आगमन का समाचार उस बस्ती के लोगों को ज्ञात हुआ । उन्होंने सोचा कि जिलाधिकारी बहुत शिक्षित हैं, इसलिए आज हम सभी वस्त्र धारण करेंगे । स्वाभाविक है कि जब जिलाधिकारी वहां निर्वस्त्र अवस्था में पहुंचे होंगे, तब क्या हुआ होगा, इसकी कल्पना सहज की जा सकती है । इसलिए विवाह समारोह में भी आधुनिक वस्त्र धारण कर जाने के स्थान पर पारंपरिक वेशभूषा में जाना ही अपने लिए हितकर है । हम जैसे हैं, वैसे ही रहें, तो हमें सम्मान प्राप्त होगा । इसलिए अपनी वेशभूषा पर दृढ रहना उचित है ।


धर्मकार्य सफल होने हेतु शासन के साथ वाद नहीं, अपितु सुसंवाद होना चाहिए !


‘केवल ‘हिन्दुत्व’ और ‘अध्यात्म’ ही सबसे सशक्त तंत्र हैं । इसलिए केंद्र और राज्यों में भी हिन्दुत्व का प्रभाव दिखाई दे रहा है । देश में होनेवाला परिवर्तन केवल हिन्दुत्वनिष्ठों के कारण हो रहा है । शासन-व्यवस्था अत्यंत बडा साधन है । उस पर धर्म का धर्मदंड समान रूप से होना चाहिए । इसके लिए प्रतिनिधिमंडल को शासन के साथ बैठकर चर्चा करनी चाहिए । वाद-विवाद करने की अपेक्षा सुसंवाद करने से ही हम सफल हो सकते हैं । संपूर्ण भारतवर्ष में ४ कुंभ होते हैं । इन ४ कुंभ मेलों के अतिरिक्त हिन्दुत्वनिष्ठ शासन और संतों के सहयोग से हमने छत्तीसगढ में ‘राजीम कुंभ मेला’ प्रारंभ किया । इसकी भव्यता और संतों की एकजुटता के कारण राजीम कुंभ मेले का छत्तीसगढ के लोगों पर अत्यधिक प्रभाव पड रहा है । इसी प्रकार शासन के संपर्क में रहकर धर्मांतरण, गोतस्करी, हिन्दुत्वनिष्ठों पर आक्रमण अथवा हिन्दू धार्मिक प्रतीकों के अपमान को रोका जा सकता है । शासन के साथ सुसंवाद स्थापित करने के लिए चयनित लोगों का एक समूह तैयार रहना चाहिए । इससे शासन के साथ समन्वय बनाए रखना सरल हो जाएगा ।’

– पू. श्री रामबालकदास महात्यागी महाराजजी

 

४. सात्त्विक भोजन-पद्धति

‘जैसा अन्न, वैसा मन’, ऐसा कहा जाता है । इसलिए हमारे लिए भोजन सबसे महत्त्वपूर्ण विषय है । परिवार, घर, समाज अथवा वैवाहिक भोज जैसे किसी भी स्थान पर जाएं, पर अपनी भोजन-पद्धति नहीं छोडनी चाहिए । ऐसा न करने पर मानो हम आक्रमणकारियों को अपना व्यक्तिगत सहयोग प्रदान करते हैं । आक्रमणकारी हमारी इन्हीं दुर्बलताओं पर आघात करते हैं । इसलिए हमें अधिकाधिक आदर्श जीवन-पद्धति अपनाना आवश्यक है ।

– पू. श्री रामबालकदास महात्यागी महाराजजी, संचालक, श्री जामडी पाटेश्वरधाम सेवा संस्थान, पाटेश्वर धाम, छत्तीसगढ