संपादकीय : हिन्दुओं का दुर्भाग्य !

हिन्दुओं की लाखों वर्षों की परंपरा को अखंडित रखनेवाला  कुम्भ पर्व ! वर्तमान में प्रयागराज में चल रहा पर्व १४४ वर्ष उपरांत आया है; इसलिए वह ‘महाकुम्भ पर्व’ है । सूर्य एवं बृहस्पति के मध्य १४४ वर्ष में एक बार आनेवाले विशिष्ट राशियों के संबंधों के कारण यह संयोग बनता है । इससे पूर्व वर्ष १८८१ तथा अगला महाकुम्भ पर्व वर्ष २१६९ में आएगा; इसीलिए वर्तमान में जीवित सर्वसामान्य मनुष्यों को अगला महाकुम्भ देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा । भले ही ऐसा हो; परंतु ऐसे भी कुछ योगी महापुरुष हैं, जो दिव्य भारतभूमि के हिमालय अथवा अन्य वनों में रहकर सैकडों वर्षाें से साधनारत हैं । उनमें से कुछ लोग ऐसे मेलों में आते हैं, ऐसा बताया जाता है । संक्षेप में कहा जाए, तो उनके आने से कुम्भ पर्व के चैतन्य में अनेक गुना वृद्धि होती है, जबकि हिन्दू समाज को अज्ञानवश ही क्यों न हो; परंतु ऐसे महानुभावों का सत्संग मिलना हिन्दुओं का परमसौभाग्य है, यह ध्यान में लेनेयोग्य है । अध्यात्म, तपस्या, अनासक्ति, भगवद्प्राप्ति, पुण्यसंग्रह आदि के समुच्चय के अलौकिक दर्शन करने का पृथ्वी का सर्वाेत्कृष्ट, अपितु एकमात्र स्थान है यह महाकुम्भ पर्व ! महाकुम्भ पर्व की अद्वितीयता को शब्दों में व्यक्त करना सर्वथा असंभव ! हमारे धर्मग्रंथों में बताया गया है कि तीर्थस्थलों के राजा प्रयागराज के संगम तट पर इस अवधि में किया जानेवाला ‘कल्पवास’ नाम का व्रताचरण ‘मनुष्य को एक कल्प के समान अर्थात ४३२ करोड वर्षाें के समान फल प्रदान करता है । १५ लाख लोग संगम तट पर रहकर यह कठिन व्रत कर रहे हैं । कुम्भ पर्व में सम्मिलित होकर आंशिक रूप से ही क्यों न हो; परंतु उसकी अद्वितीयता का अनुभव किया जा सकता है । उसके कारण केवल भारत के ही नहीं; अपितु विश्वभर के जिज्ञासु, भक्त एवं साधक इस आध्यात्मिक सत्संग का लाभ उठाने हेतु यहां आए हैं ।

हिन्दुओं की प्रत्येक परंपरा पर कीचड उछालनेवाले वर्तमान समय के महाभाग अर्थात ही ‘बी.बी.सी.’, ‘वापो’, ‘एन.वाई.टी.’ जैसे विदेशी प्रसारमाध्यम ! नागा साधुओं की आलोचना करना उनका प्रिय शौक रहा है । हिन्दुओं के कुम्भ पर्व के नकारात्मक चित्रण का यह कुटिल षड्यंत्र है, यह तो सर्वविदित ही है । धर्मशिक्षा के अभाव से आज की युवा पीढी इन लोगों के झांसे में आ रही है, जो हम जैसे सश्रद्ध हिन्दुओं के लिए चिंता का विषय है । वास्तव में देखा जाए, तो कुम्भ पर्व में विद्यमान चैतन्य के कारण तथा विदेशी श्रद्धालुओं में भारत एवं हिन्दू धर्म के प्रति विद्यमान उत्कट भाव के कारण भारत के युवकों में धर्म की महिमा ध्यान में आकर उनमें धर्म के प्रति जिज्ञासा की चिंगारी भडकनी चाहिए । धर्म का आचरण करने के लिए वे प्रेरित होने चाहिए; परंतु ऐसा हो रहा है या नहीं ?, यह प्रश्न है । वर्तमान में जिस धर्मशिक्षा के अभाव से युवा पीढी दिशाहीन बन गई है, यही स्थिति भारतीय प्रसारमाध्यमों की है !  महाकुम्भ पर्व की चकाचौंध करनेवाली आध्यात्मिक समृद्धि, प्रायः विश्व को भारत की सांस्कृतिक तथा दैवी महिमा बताकर भारत की प्रतिष्ठा को चमकाने का यह स्वर्णिम अवसर है । उसे छोडकर अनेक प्रसारमाध्यमों में ओछे विचारों से प्रेरित होकर इस कुंभ पर्व को नीचा दिखाने की होड मची है ।

पीली पत्रकारिता !

हर्षा रिचारीया, संन्याशी अभय सिंह और मोनालिसा भोसले

मोनालिसा भोसले नामक जपमाला बेचनेवाली मध्य प्रदेश की इंदौर की एक लडकी का उदाहरण लीजिए ! जब वह महाकुम्भ पर्व में जपमाला बेच रही थी, उस समय उसकी सुंदरता के कारण प्रसारमाध्यम हाथ धोकर उसके पीछे पड गए । इसमें गली-मोहल्लों में बने केवल यू ट्यूब चैनल्स ही नहीं, अपितु विख्यात ‘सो कॉल्ड मेनस्ट्रीम’ (कथित मुख्य प्रवाह के) प्रसारमाध्यमों का भी समावेश है । बिहार के ‘भोजपुरिया जवान ४५’ नामक एक यू ट्यूब चैनल ने तो कमाल ही किया । उसने ‘कुम्भ पर्व में आए श्रद्धालु नागा साधुओं तथा अघोरी बाबाओं को छोडकर मोनालिसा के पीछे पडे हैं’, इस प्रकार से अत्यंत लज्जाप्रद वार्तांकन किया । वह वीडियो केवल ४ दिनों में २.५ लाख लोगों ने देखा । ऐसे वार्तांकन में धर्म, अध्यात्म आदि का लेशमात्र भी अंश नहीं हैं; परंतु ऐसे लोग समाज को अश्लीलता की ओर ले जा रहे हैं । मोनालिसा को रातोरात मिली अभूतपूर्व प्रसिद्धि के कारण उसे अपना बोरिया बिस्तर बांधकर अपने गांव लौटना पडा है । धर्म पर लांच्छन लगाने का पाप करनेवाले इन प्रसारमाध्यमों ने इस लडकी की जीविका पर भी पैर रखा है । इस प्रकार की पीली पत्रकारिता करनेवालों को उत्तरदायी प्रमाणित कर उनपर कार्यवाही करने हेतु क्या कानून नहीं बनना चाहिए ?

दूसरा उदाहरण है ‘आईआईटी बाबा’ का ! अभय सिंह नामक यह मध्यम आयु का युवक मूलतः ‘आईआईटी पवई’ से शिक्षा प्राप्त अभियंता ! आरंभ में जब उसका विषय समाज के सामने आया, तब कनाडा में ३६ लाख रुपए के वार्षिक वेतनभोगी एक सफल अभियंता का सबकुछ छोडकर अध्यात्म के प्रति समर्पित होना अनेक धर्मप्रेमी हिन्दुओं के लिए गर्व का विषय था; परंतु आगे जाकर ओछी पत्रकारिता करनेवाले कुछ पत्रकारों ने अभय सिंह से ‘उसने यह मार्ग कैसे अपनाया ?’, ‘क्या उसकी कोई गर्लफ्रेंड थी ?’ जैसे अत्यंत निचले स्तर के व्यक्तिगत प्रश्न पूछे । हमारे यहां जहां आवश्यकता नहीं होती, वहां टांग अडाने की परंपरा तो है ही ! अब अभय सिंह के इस उदाहरण से सभी साधु ऐसे ही होते हैं, इसका डंका पीटने के लिए हमारा आधुनिकतावादी गिरोह तो मुक्त ही है ! इससे हिन्दू पुनरुत्थान साध्य होगा अथवा हिन्दू धर्म की बदनामी ?

यह लज्जाजनक है !

भारतीय संस्कृति में सर्वस्व त्यागकर संन्यास स्वीकार करने को उच्चतम स्थान प्राप्त है । अनेक आध्यात्मिक लोग साधु-साध्वी बनकर अनासक्त पद्धति से जीवन व्यतीत करते हैं । स्वार्थ, पैसा, पद, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि सामान्य परंपरा से दूर जाकर भगवद्प्राप्ति का मार्ग और सुलभ हो, इसके लिए अनेक लोगों द्वारा इस मार्ग को अपनाना प्रवाह के विरुद्ध तैरना ही है । ऐसा होते हुए भी हर्षा रिछारिया नामक ‘मॉडल’ एक अखाडे के माध्यम से साधना कर रही है । हमारे लज्जाजनक प्रसारमाध्यम उसे ‘सबसे सुंदर साध्वी’ बोलते फिर रहे हैं । उसमें अब नब्बे के दशक की फिल्म अभिनेत्री ममता कुलकर्णी का भी नाम जुड गया है । ममता कुलकर्णी विगत २५ वर्षाें से अमेरिका में थी । मादक पदार्थाें के अधीन होकर उसकी तस्करी करनेवाले विकी गोस्वामी के साथ वे इतने वर्षाें तक रहीं । कुछ ही दिन पूर्व भारत लौटने पर अब उन्होंने किन्नर अखाडे की दीक्षा ग्रहण की है तथा अब वे ‘महामंडलेश्वर माई ममतानंद गिरी’ बन गई हैं । उनकी यह यात्रा शोध का तथा कौतुहल का विषय बन सकता है; परंतु अब सभी प्रसारमाध्यम सबकुछ छोडकर उनकी ही प्रसिद्धि कर रहे हैं । काल निरंतर प्रबल हो रहा है, इसे ध्यान में रखना होगा ! कुम्भ पर्व से ‘अर्थ’ एवं ‘काम’ का ‘ग्लैमर’ नहीं; अपितु ‘धर्म’ एवं ‘मोक्ष’ की अनिवार्यता रेखांकित होनी चाहिए; परंतु वर्तमान में ऐसा होता दिखाई नहीं देता । यह हिन्दुओं का दुर्भाग्य ही है ! और क्या !

हिन्दुओं का महाकुम्भ पर्व ‘अर्थ’ एवं ‘काम’ का ग्लैमर नहीं; अपितु ‘धर्म’ एवं ‘मोक्ष’ की अनिवार्यता दर्शानेवाला तीर्थस्थल है !