क्या बुद्धि शिक्षा का विधि विधान निश्चय कर सकती है ?
आजकल मनोराज्य का अधिक बोल-बाला है । मनुष्य का अंतर्मन समझता है कि उसका ही विचार ठीक है । मनुष्य अपनी वासनाओं के विषयों (रूप, रस, गंध, श्रवण और स्पर्श) एवं ज्ञान का मनोनुकूल भोग चाहता है। ऐसी स्थिति में विविध निर्णयों या क्रिया-कलापों के विषय में वाद-विवादों का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।