जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज के वैकुंठगमन के विषय में शरद पवार का आपत्तिजनक वक्तव्य ।
वारकरी संप्रदाय में तीव्र रोष ।

पिंपरी-चिंचवड – वर्तमान काल में वैकुंठगमन इत्यादि कहना मुझे स्वीकार्य नहीं है । ऐसा कहना अर्थात एक विशिष्ट वर्ग द्वारा अपने कृत्यों को छिपाने के लिए थोपी गई बातों को सत्य मानने जैसा होगा, ऐसा वक्तव्य आकुर्डी में राष्ट्रवादी शरदचंद्र पवार पक्ष के अध्यक्ष शरद पवार ने जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज के ३७५ वें वैकुंठगमन वर्ष की पृष्ठभूमि पर दिया । वे यहां एक कार्यक्रम में बोल रहे थे ।
ठीक आषाढी एकादशी तथा पालखी सोहला ( उत्सव ) के पवित्र वातावरण में महाराष्ट्र के आराध्य देव तथा संतों की परंपरा पर किए गए इस कीचड उछालने के कृत्य के कारण वारकरी संप्रदाय में तीव्र अप्रसन्नता व्यक्त की गई है तथा आक्रोश की लहर उमड पडी है । वारकरी संगठनों ने चेतावनी दी है कि, ‘ राजनीतिक स्वार्थ के लिए संतों का इतिहास एवं वारकरियों की अस्मिता के साथ खिलवाड रोकना चाहिए ’ ।
शरद पवार ने इस वक्तव्य के पश्चात अपने आधिकारिक फेसबुक पोस्ट पर इसका समर्थन करते हुए जगद्गुरु तुकोबाराय के ‘ भले तरी देऊ कासेची लंगोटी, नाठाळाचे माथी हाणू काठी ’ ( भले व्यक्ति के लिए सर्वस्व अर्पण, किंतु दुष्ट के सिर पर लाठी का प्रहार ) इस अभंग का संदर्भ दिया । ( संतों के नाम पर अपना हिन्दू -विरोधी कार्यक्रम चलाने वाले राजनीतिज्ञों पर वारकरी संप्रदाय का दैवीय दर्शन सदैव भारी रहेगा – संपादक )
संतों के विचार शरद पवार को मान्य नहीं हैं । – आचार्य तुषार भोसले, प्रदेशाध्यक्ष, भाजपा आध्यात्मिक आघाडी![]() शरद पवार को हिन्दू संत तथा उनके विचार मूल रूप से स्वीकार्य ही नहीं हैं । जगद्गुरु तुकोबा सहित अन्य समकालीन संतों के उनके वैकुंठगमन के अखंड होते हुए भी यदि उस पर प्रश्न उपस्थित न किया जाए, तो वे शरद पवार कैसे ? परंतु उनके मानने या न मानने से कोई लाभ नहीं है , क्योंकि महाराष्ट्र के लाखों वारकरी ३७५ वर्षों से जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज का वैकुंठगमन स्वीकार करते हैं तथा जब तक चंद्र एवं सूर्य हैं, तब तक यह सत्य ऐसे ऐरे-गैरे लोगों के प्रलाप से परिवर्तित नहीं होगा । |
चर्चा में बने रहने के लिए दयनीय प्रयास । – ह.भ.प. रामकृष्ण हनुमंत महाराज वीर, वारकरी पाईक संघ![]() किसी बात को योजनाबद्ध ढंग से, तथा त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण से समाज के समक्ष प्रस्तुत करना, इसे शास्त्र में ‘ प्रमाद ’ नामक दोष कहा जाता है । संपूर्ण राजनीतिक जीवन तथा दल की दुर्दशा होने के पश्चात भी किसी भी प्रकार से स्वयं को चर्चा के केंद्र में रखना चाहिए, इसके लिए यह दयनीय प्रयास है । समाज में वैमनस्य उत्पन्न करना ही उनकी अब तक की पूंजी रही है । यह उनका कोई प्रथम प्रयास नहीं है । उनके समस्त प्रयासों पर वारकरी संप्रदाय का दर्शन सदैव प्रभावी रहेगा । |


आषाढी वारी में श्रद्धालुओं को असुविधा नहीं होगी, इसकी चिंता करें – देवेंद्र फडणवीस, मुख्यमंत्री
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(और इनकी सुनिए…) ‘श्रीराम दशरथ के पुत्र नहीं थे !’ – Prof. K.S. Bhagwan
विवादित ‘ईठ्ठला’ नाटक से संतों के नाम एवं आपत्ति जनक प्रसंग हटाईए।