
अहिल्यानगर – पंढरपुर स्थित विठ्ठल-रुक्मिणी मूर्ति की तर्ज पर अब प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र शनिशिंगणापुर स्थित शनि मूर्ति (शिला) के दीर्घकालिक संवर्धन हेतु वज्रलेप लगाया जाएगा, ऐसा वृत्त है । प्रतिदिन होने वाला १ सहस्त्र ५०० किलो तेल का अभिषेक, ग्रीष्म-वर्षा सहित परिवर्तित होता ऋतुचक्र तथा बढती भीड, इनके कारण मूर्ति का क्षरण होने का निष्कर्ष विशेषज्ञों ने निकाला है । इसके लिए छत्रपति संभाजीनगर स्थित पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों के दल की नियुक्ति की गई है ।

देवस्थान प्रशासन की शिथिल कार्यप्रणाली के विषय में गंभीर सूत्र –
१. मिलावटयुक्त तेल का पाश तथा प्रशासन की अक्षम्य उपेक्षा ।
शनिशिंगणापुर परिक्षेत्र में श्रद्धालुओं द्वारा मूर्ति पर प्रतिदिन सहस्रों लीटर तेल अर्पित किया जाता है , परंतु इस तेल की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए देवस्थान प्रशासन के पास वर्तमान में कोई भी स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली अथवा प्रयोगशाला उपलब्ध नहीं है । परिक्षेत्र में सर्वत्र निकृष्ट एवं मिलावटयुक्त तेल का क्रय-विक्रय होने की शिकायतें श्रद्धालुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा निरंतर की जा रही हैं । इसी रासायनिक मिलावट के कारण ही श्री शनिदेव की मूर्ति को क्षति पहुंच रही है तथा वर्ष २०२२ में मूर्ति का कुछ भाग खंडित होने की बात भी सम्मुख आई थी । खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने इस ओर पूर्णतः नेत्रमुंदन कर लिया है तथा श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य एवं हिन्दुओं के श्रद्धास्थानों के साथ खिलवाड करने वाले ऐसे मिलावटखोरों पर तत्काल कठोर वैधानिक कार्यवाही होना अत्यंत आवश्यक है । (जब तक देवस्थान प्रशासन परिक्षेत्र में मिलावटयुक्त तेल के विक्रय को प्रतिबंधित नहीं करता तथा रासायनिक सामग्रियों पर रोक नहीं लगाता, तब तक केवल रासायनिक प्रक्रिया करने से मूर्ति की रक्षा नहीं होगी – संपादक)
२. पूजन सामग्री के विषय में कठोर नियमावली की आवश्यकता ।
श्री शनिदेव की मूर्ति पर तेल के साथ काले तिल, रासायनिक रंगयुक्त काले वस्त्र, नारियल तथा अश्व की लौह नाल अर्पित करने की कुप्रथा वर्तमान में बढ गई है । इन वस्तुओं के घर्षण के कारण तथा रासायनिक प्रक्रिया से पवित्र मूर्ति के पृष्ठभाग पर विपरीत प्रभाव पड रहा है । हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार मूर्ति की पवित्रता अक्षुण्ण रखने के लिए एवं श्रद्धालुओं की श्रद्धा की रक्षा के लिए देवस्थान प्रशासन द्वारा पूजन सामग्री के विषय में तत्काल एक निश्चित नियमावली लागू करना आवश्यक है ।
३. अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए विशेष दर्शन सुविधा ।
चबूतरे (चौतरे) पर जाकर श्री शनिदेव के दर्शन करने के लिए सामान्य श्रद्धालुओं से ५०० रुपये शुल्क लिया जाता है, तो दूसरी ओर अतिविशिष्ट व्यक्तियों से दर्शन के लिए प्रशासन द्वारा पलक-पावडे बिछाए जाते हैं । विभिन्न अनुशंसाएं (सिफारिशें) लेकर आने वाले राजनीतिक नेताओं तथा अधिकारियों को बिना किसी शुल्क के सीधे दर्शन कराए जाते हैं ।
श्री शनिदेव की मूर्ति के लिए मिलावटयुक्त तेल का उपयोग न किया जाए – श्रीमती पुष्पाताई बालासाहेब बानकर, सरपंच, शनिशिंगणापुर
श्री शनिदेव की मूर्ति को वज्रलेप करने के विषय में प्रक्रिया गतिमान होने की सूचना है । यहां बाह्य दुकानों में कोई भी तेल उपलब्ध होता है । वह तेल मिलावटयुक्त होता है । उस तेल के कारण मूर्ति पर भिन्न स्वरूप की धारियां (ओघळ) बन जाती हैं । उस तेल में मिलावट होने के कारण मूर्ति का क्षरण हो सकता है । हमारी मांग है कि मूर्ति पर अर्पण करने के लिए खाद्य तेल का ही उपयोग किया जाना चाहिए । अर्थात जो तेल हम पाककला (रसोई) में उपयोग करते हैं, वही मूर्ति को भी अर्पित किया जाना चाहिए, तभी उसका लाभ प्राप्त हो सकता है । अन्य तेलों में मिलावट होती है, उदाहरणार्थ इस स्थान पर सरसों का तेल मिलता है , परंतु वह अखाद्य तेल है । इसलिए उसकी गुणवत्ता के विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता । इस विषय में पूर्व सरपंच श्री. बाला साहेब बानकर ने भी पूर्व में पत्राचार किया था कि जो तेल बाहर बिकता है, वह या तो शुद्ध होना चाहिए, अन्यथा देवस्थान को दो या तीन ‘ब्रांड’ (उत्पादकों) के नाम घोषित करने चाहिए । उसी प्रतिष्ठान का तेल क्रय किया जा सकेगा, जिससे उसके शुद्ध होने की निश्चितता रहेगी तथा उसके कारण मूर्ति पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा ।
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