कोंकण क्षेत्र के मंदिरों की सहस्रो एकड देवराई भूमि पर महाराष्ट्र सरकार का नाम लगने का प्रकरण ।

रत्नागिरी, १ जुलाई (संवाददाता) – कोंकण की जैवविविधता, पर्यावरण एवं सांस्कृतिक परंपरा की मुख्य रीढ रहीं प्राचीन ‘देवराई एवं देवराहाटी’की भूमियां बिना किसी पूर्वसूचना के अवैधरूप से महाराष्ट्र सरकार के नाम से करने की राजस्व विभाग की कार्यवाही का राज्य सरकार ने संज्ञान लिया है । इस प्रकरण में ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’द्वारा की गई मांग के उपरांत राज्य के राजस्वमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने राजस्व विभाग के उपसचिव को इस संपूर्ण प्रकरण की गहन जांच कर तत्काल ब्योरा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है । सरकार के इस सकारात्मक कदम के कारण कोंकण क्षेत्र के सहस्रो ग्रामवासियों एवं मंदिर प्रबंधकों को भले ही तात्कालिक चैन मिला हो, तब भी भूमियों के ७/१२ अभिलेखों पर मूल प्रविष्टियां पूर्ववत् होने तक यह लडाई चालू रखने का मंदिर महासंघ ने निश्चय किया है ।
१. महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे एवं राजस्वमंत्री चंद्रशेखर बावनकुले को प्रस्तुत किए गए ज्ञापन में प्रशासन की मनमानी कार्यपद्धति उजागर की है ।
२. वर्ष २०१८ के रत्नागिरी के जिलाधिकारी के एक पत्र का अनुचित अर्थ निकालकर संबंधित तहसीलदारों ने बिना कोई व्यक्तिगत नोटिस दिए अथवा बिना सुनवाई किए, यह एकतरफा कार्यवाही की । सहस्रो एकड देवराई को ‘अवैध धार्मिक स्थल’ दिखाकर ७/१२ अभिलेखों पर अंकित देवस्थानों के नाम हटाकर उसके स्थान पर ‘महाराष्ट्र शासन’, ऐसी प्रविष्टियां की ।
३. स्थानीय ग्रामवासी एवं मंदिर महासंघ ने इसका कडा विरोध किया, क्योंकि देवराई कोई भी मनुष्यनिर्मिति अवैध निर्माणकार्य नहीं है, अपितु वह पहले से चली आ रही प्रकृति की तथा देवस्थान की ही भूमि है ।
४. महासंघ ने ‘महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता १९६६’के अनुच्छेद १५० में निहित कानूनी प्रावधानों का सीधे उल्लंघन कर यह कार्यवाही की है, ऐसी आपत्ति की है । ‘इतने बडे स्तर पर दुर्लभ जैवविविधतावाले वनक्षेत्र पर सरकार का नाम लगाने के पीछे इन भूमियों को हडपकर उन्हें निर्माण व्यावसायियों के जेब में डालने का तो षड्यंत्र नहीं है न ?, ऐसी आशंका स्थानीय ग्रामवासी व्यक्त कर रहे हैं ।
५. इससे कोंकण की संस्कृति एवं पर्यावरण के संतुलन को संकट उत्पन्न हुआ है । इसके आगे का संस्करण क्या महाराष्ट्र राज्य में स्थित देवस्थानों की ५.५ लाख हेक्टैर भूमि हडपने के लिए बनाया गया ‘महाराष्ट्र देवस्थान इनाम निर्मूलन प्रारूप २०२६’ था ?, यह संदेह व्यक्त किया जा रहा है ।
६. ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ने ज्ञापन में प्रमुखता से ३ मांगें की हैं । उनमें ‘बाधित ७/१२ अभिलेखों पर देवस्थान का नाम पूर्ववत् लगाना, कानून तोडनेवाले राजस्व अधिकारियों की उच्चस्तरीय जांच करना तथा भविष्य में इन भूमियों के विषय में निर्णय लेते समय स्थानीय ग्रामसभा को अवगत कराना’, इन मांगों का समावेश है ।
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