Temple Land Protection Movement : राजस्वमन्त्री चन्द्रशेखर बावनकुळे की घोषणा : ‘देवस्थान इनाम उन्मूलन प्रारूप अधिनियम २०२६’ को स्थगिती !

राजस्वमन्त्री एवं भाजपा के नेता चन्द्रशेखर बावनकुळे

नागपुर – देवस्थानों की भूमि सरलता से दूसरों को हस्तान्तरित हो सकेगी, ऐसे प्रावधानवाले एवं जिसके कारण देवस्थानों के आर्थिक स्रोत नष्ट होने की सम्भावना हो ऐसे ‘देवस्थान इनाम उन्मूलन प्रारूप अधिनियम २०२६’ इस प्रारूप को स्थगिती देने की घोषणा राजस्वमन्त्री एवं भाजपा के नेता चन्द्रशेखर बावनकुळे ने यहां की । इस प्रारूप का प्रमुखता से विश्व हिन्दू परिषद, विविध मन्दिरों के विश्वस्त एवं मन्दिर महासंघ ने बडे स्तर पर विरोध किया था । सरकार ने उपरोक्त प्रारूप सार्वजनिक करके आपत्तियां एवं सम्मतियां मांगी थीं । हिन्दुत्वनिष्ठ सङ्गठनों सहित मन्दिर विश्वस्तों ने मुख्यमन्त्री, तथा राजस्वमन्त्री से भेंट करके उपरोक्त प्रारूप के कारण मन्दिरों पर होनेवाले आघातों के गम्भीर संकट सरकार तक पहुंचाए थे । परिणामस्वरूप सरकार ने उसका अध्ययन करके ५ जून को आपत्तियां लेने की अवधि समाप्त होने पर ६ जून के दिन उपरोक्त घोषणा की ।

इस समय बावनकुळे ने कहा, ‘‘राज्य में साढे पांच लाख हेक्टर देवस्थान इनाम भूमि है । उनमें से कुछ पर अतिक्रमण हुए हैं अथवा कुछ वहिवाटदार (भोगकर्ताओं), भाडेदार, काश्तकार (बटाईदारों) अथवा कृषकों के पास हैं । यह भूमि पुनः देवस्थान को मिले, देवस्थान के अधिकार स्थापित हों, तथा काश्तकारों की भी रक्षा हो, इस उद्देश्य से यह कानून लाने का सरकार का विचार था । इस प्रारूप पर बडे स्तर पर आपत्तियां आने से यह प्रारूप हम स्थगित कर रहे हैं । देवस्थानों को अपेक्षित ऐसा, उनके अधिकार अबाधित रखनेवाला, देवस्थान को सुदृढ करनेवाला कानून बनाया जाएगा ।’’

नवीन समिति के सम्मुख प्रत्येक आपत्ति की सुनवाई कर नवीन प्रारूप सिद्ध करेंगे !

राजस्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (ए.सी.एस.) विकास खारगे की अध्यक्षता में २ विभागीय आयुक्त, २ जिलाधिकारी, ३ उपसचिव एवं १५ देवस्थान के प्रतिनिधि इनकी एक समिति स्थापित की जाएगी । इस समिति में पहले देवस्थानों के लिए कानूनी संघर्ष करनेवाले अधिवक्ताओं का भी समावेश किया जाएगा । १५ अगस्त तक आई प्रत्येक आपत्ति पर सुनवाई की जाएगी । १५ सितम्बर तक नवीन प्रारूप लाया जाएगा । उसे पुनः जनता को दिखाने के लिए (पब्लिक डोमेन के लिए) रखा जाएगा । उसके उपरान्त दिसम्बर के अधिवेशन में उसे कानून का रूप दिया जाएगा, ऐसी जानकारी राजस्वमन्त्री बावनकुळे ने दी है ।

इस समय बावनकुळे ने कहा कि जो भूमि देवस्थान को प्रत्यक्ष रूप से मिल सकती है, वह प्रत्यक्ष रूप से लेनी पडेगी । जहां सम्भव है वहां मन्दिरों के निकट स्थान दिया जाएगा ।

सरकार के निर्णय का स्वागत ! – सुनील घनवट, राष्ट्रीय संगठक, महाराष्ट्र मन्दिर महासंघ

देवभूमि के लिए संघर्ष करनेवाले महाराष्ट्र मन्दिर महासंघ, अष्टविनायक मन्दिर, विश्व हिन्दू परिषद के प्रयत्नों को बडी सफलता !

मुम्बई – राज्य के राजस्वमन्त्री चन्द्रशेखर बावनकुळे ने नागपुर में ‘देवस्थान इनाम उन्मूलन प्रारूप अधिनियम २०२६’ स्थगित करने की महत्त्वपूर्ण घोषणा की । इस मन्दिरहितैषी निर्णय का हम मनःपूर्वक स्वागत करते हैं । इस प्रारूप के सन्दर्भ में मन्दिर विश्वस्तों की ओर से राज्यभर में अध्ययनपूर्ण विषय रखकर, तथा पत्रकार परिषदों, देवस्थान भूमि संरक्षण परिषदों का आयोजन करके शासन को सकारात्मक निर्णय लेने की दिशा देनेवाले महाराष्ट्र मन्दिर महासंघ, अष्टविनायक मन्दिर समिति, विश्व हिन्दू परिषद एवं राज्यभर के समस्त मन्दिर विश्वस्त का हम सार्वजनिक अभिनन्दन करते हैं । यह निर्णय अर्थात सभी मन्दिर विश्वस्त एवं समस्त हिन्दुत्ववादी संगठनों के संगठित संघर्ष तथा प्रयत्नों को मिली बडी सफलता है, ऐसी जानकारी महाराष्ट्र मन्दिर महासंघ के राष्ट्रीय संगठक श्री. सुनील घनवट ने प्रसिद्धिपत्रक द्वारा दी ।

सुनील घनवट

श्री. सुनील घनवट ने कहा कि,

१. देवस्थान की इनाम भूमि पुनः मन्दिरों को दिलवाना, वक्फ बोर्ड की भांति सरकार द्वारा वहां के अतिक्रमण हटाना, न्यायालयीन संघर्ष के लिए नामांकित अधिवक्ताओं का परामर्श लेना एवं १०० से २०० वर्ष पुरानी वहिवाटों के विषय में मन्दिरों की हानि न होने देते हुए निकट के परिसर में समान मूल्य का (सममूल्य) भूखण्ड मन्दिर को देने का बन्धनकारक प्रावधान करना, यह राजस्वमन्त्री के निर्णय अत्यन्त स्वागतयोग्य एवं मन्दिर के हित में हैं ।

२. १५ अगस्त तक की सुनवाई प्रक्रिया के लिए स्थापित होनेवाली अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) इनकी १५ सदस्यीय समिती में देवस्थान प्रतिनिधियों को स्थान देने की भूमिका का भी हम स्वागत करते हैं ।

३. शासन द्वारा मन्दिर हित में अनेक निर्णय लेने पर भी, हिन्दू मन्दिरों की सर्वांगीण रक्षा के लिए हमारे प्रस्ताव के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयों का इस नवीन प्रक्रिया एवं कानून में समावेश हो, ऐसी हमारी आग्रही मांग है ।

४. भक्तों द्वारा अर्पण की गई निधि केवल हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार, मन्दिरों के जीर्णोद्धार एवं हिन्दू समाज की धार्मिक आवश्यकताओं के लिए ही उपयोग में लाई जानी चाहिए । वह किसी भी धर्मनिरपेक्ष अथवा सरकारी योजनाओं पर व्यय नहीं की जानी चाहिए ।

५. राजनीतिक साठगांठ से मन्दिरों की निधि का उपयोग किया जाना रुकना चाहिए, अन्यथा करछूट के दमनकारी नियम तत्काल निरस्त करने के आदेश निकालने चाहिए ।

६. राज्य के छोटे एवं उपेक्षित मन्दिरों के पुनर्निर्माण के लिए बडे मन्दिरों की निधि का सुयोग्य उपयोग हो तथा गांवों में निष्काम भाव से देव की सेवा करनेवाले गुरव, तथा अन्य सेवादारों के लिए प्रति मास न्यूनतम १० सहस्र रुपये से १५ सहस्र रुपये निर्वाह निधि प्रारम्भ की जाए, ऐसी हमारी मांगें हैं ।