सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्टता से दिखाई देने का कारण !

बाईं ओर के छायाचित्र में गुरुदेवजी के माथे पर अंकित कमल का चिन्ह दिखाई दे रहा है । दाहिनी ओर के छायाचित्र में यह स्पष्ट कर दिखाया गया है । (मार्च २०२३)

संकलनकर्ता : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्ट दिखाई देने का क्या कारण है ? वर्ष २०११ एवं वर्ष २०१२ की अवधि में उस कमल की ४ पंखुडियां अस्पष्ट दिखाई देती थीं तथा वर्ष २०१३ में वे सुस्पष्ट दिखाई देने लगी । ‘कमल का सुस्पष्ट होना’ क्या दर्शाता है ?

श्री. राम होनप :

१.  संतों के माथे पर अंकित कमल सुस्पष्ट दिखाई देने का कारण

श्री. राम होनप

व्यक्ति की साधना मूलाधारचक्र से आरंभ होती है । ‘व्यक्ति की साधना एवं ईश्वर की कृपा’ के कारण उसकी कुंडलिनी ऊपर-ऊपर यात्रा करती है । व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति सुषुम्ना नाडी के द्वारा होती है ।

संतों की आध्यात्मिक प्रगति के अंतिम चरण में सुषुम्ना नाडी का रूपांतरण ‘ब्रह्मनाडी’ में होता है । ब्रह्मनाडी का मिलन सहस्रारचक्र के स्थान पर स्थित आनंद के साथ होता है । यह प्रक्रिया पूर्ण होने पर सहस्रारचक्र में कमल की आकार की भांति आनंद का प्रकटीकरण होता है । उसे ‘ब्रह्मकमल’ कहते हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी का कार्य समष्टि से संबंधित होने से उसे ‘विश्वकमल’ की उपमा दी गई है ।

१ अ. सुषुम्ना नाडी एवं ब्रह्मनाडी के मध्य का अंतर : सुष्मुना नाडी की कुछ शक्ति का व्यय ‘संतों का शरीर, मन एवं बुद्धि’ के कार्याें के लिए होता है; परंतु ब्रह्मनाडी जीव को केवल आनंद देने का कार्य करती है । ब्रह्मनाडी का कार्य होता है ‘जीव को ब्रह्मानंद देना’ ।

२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के माथे पर दिखाई देनेवाली कमल की पंखुडियों में से ४ पंखुडियों की विशेषता

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के माथे पर दिखाई देनेवाली कमल की पंखुडियों में से ४ पंखुडियों के नाम एवं कार्य आगे दिए हैं –
२ अ. सचेता : ‘स’ का अर्थ है ‘सह’ एवं ‘चेता’ का अर्थ ‘चेतना’ अथवा ‘चैतन्य’ है । कमल की एक पंखुडी चैतन्य के साथ कार्य करती है । उसे ‘सचेता’ कहा गया है ।

२ आ. प्रचेता : ‘प्र’ का अर्थ है ‘जागृत !’ जिस कमल की पंखुडी में विद्यमान चैतन्य काल के अनुरूप जागृत होता है, उसे ‘प्रचेता’ कहा गया है ।

२ इ. नित्या : ‘नित्य’ का अर्थ है ‘सदैव !’ कमल की एक पंखुडी सदैव कार्यरत होती है । उसे ‘नित्या’ कहते हैं ।

२ ई. अनित्या : ‘अनित्या’ का अर्थ है ‘कभी कभी’ । कमल की एक पंखुडी विशिष्ट कार्य के लिए ही जागृत होती है, उसे ‘अनित्या’ कहा गया है ।

३. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी के माथे पर पहले कमल की पंखुडियां ‘अस्पष्ट दिखाई देना तथा उसके उपरांत वे सुस्पष्ट दिखाई देना’; इसका कारण

वर्ष २०११ एवं वर्ष २०१२ की अवधि में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी की ब्रह्मनाडी के द्वारा परमेश्वर से मिलन की प्रक्रिया चल रही थी । (‘वर्ष २०११ में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी ने साधना के द्वारा ९१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया, इसका अर्थ उन्होंने ‘परात्पर गुरु’ पद प्राप्त किया । उसके उपरांत वर्ष २०१२ में उन्होंने ९२ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया ।’ – संकलनकर्ता)
उस समय यह प्रक्रिया अधूरी होने से उनके माथे पर कमल की ४ पंखुडियां अस्पष्ट दिखाई दे रही थीं । वर्ष २०१३ में यह प्रक्रिया पूर्ण हुई । उसके कारण उनके माथे पर कमल की पंखुडियां सुस्पष्ट दिखाई देने लगीं ।’

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (४.११.२०२५)

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक
  • सूक्ष्म-परीक्षण : कुछ घटना अथवा प्रक्रिया के विषय में चित्त को (अंतर्मन को) जो अनुभव होता है, उसे ‘सूक्ष्म परीक्षण’ कहते हैं ।