भारतीय संत महापरिषद की संत समन्वयक स्वामिनी उन्मेष भारतीजी ने दी सनातन आश्रम को सदिच्छा भेंट !

महापरिषद की ओर से देहली में होनेवाले संत-महंतों के सम्मेलन का सनातन संस्था को निमंत्रण

बाईं ओर से श्रीमती जयलक्ष्मी एवं स्वामिनी उन्मेष भारतीजी को ‘सनातन प्रभात’ के विषय में जानकारी देते श्री अभिषेक पै

रामनाथी (गोवा) – भारतीय संत महापरिषद की संत समन्वयक एवं कैलाश मठ की प्रतिनिधि स्वामिनी उन्मेष भारतीजी ने २४ अप्रैल को यहां के सनातन आश्रम को सद्भावना भेंट दी । वे बेंगलुरू के श्री राजराजेश्वरी मंदिर की निवासी हैं । उनके साथ कैलाश मठ की अनुयायी श्रीमती जयलक्ष्मी उपस्थित थीं । सनातन के साधक श्री अभिषेक पै ने उन्हें आश्रम में चल रहे राष्ट्र एवं धर्म प्रसार कार्य की जानकारी दी ।

स्वामिनी उन्मेष भारती यांचा सन्मान करतांना सनातनच्या साधिका अश्‍विनी कुलकर्णी

इसके उपरान्त हुए एक समारोह में सनातन संस्था की साधिका अश्विनी कुलकर्णी ने स्वामिनी उन्मेष भारतीजी का शाल , श्रीफल एवं पुष्पहार अर्पण कर , तथा सनातन के ग्रन्थ भेंट देकर सम्मान किया । इस मंगल अवसर पर स्वामिनी उन्मेष भारतीजी ने गौरव उद्गार निकालते हुए कहा , “आश्रम में आकर मुझे अतिशय आनन्द हुआ । आश्रम अतिशय सुन्दर है तथा इसे अतिशय अच्छे प्रकार से रखा गया है ।” सनातन के संत पू. पृथ्वीराज हजारेजी के साथ सनातन के कुछ साधक इस समय उपस्थित थे ।

स्वामिनी उन्मेष भारतीजी से महापरिषद का सनातन संस्था को मिला निमंत्रण स्वीकार करते पू. पृथ्वीराज हजारेजी

सभी संतों के संगठन के लिए भारतीय संत महापरिषद की ओर से बेंगलुरू में देशभर के संतों एवं महंतों का एक सम्मेलन हुआ था । उसी प्रकार का सम्मेलन देहली में १८ मई को आयोजित किया गया है । इस सम्मेलन का निमंत्रण स्वामिनी उन्मेष भारतीजी ने सनातन संस्था को दिया । सनातन के संत पू. पृथ्वीराज हजारेजी ने निमंत्रण स्वीकार किया । इस समय उन्होंने पू. हजारेजी का सम्मान भी किया ।

पू. पृथ्वीराज हजारेजी का सम्मान करतीं स्वामिनी उन्मेष भारतीजी

गुरुकृपा सतत रहने के लिए उनके बताए अनुसार हमें आचरण करते रहना चाहिए ! – स्वामिनी उन्मेष भारतीजी

इस समय उपस्थित साधकों को मार्गदर्शन करते हुए स्वामिनी उन्मेष भारतीजी ने कहा, “तरुणों में राष्ट्र एवं धर्म कार्य के लिए क्षात्रतेज होता है, परन्तु उनमें ब्राह्मतेज भी होना चाहिए । साधना करने से ही वह प्राप्त हो सकता है । ईश्वर की सेवा, सत्संग, नामजप जीवन में अंगीकार करने पर व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास होता है । इसलिए हमें सदैव गुरुचरणों में रहना चाहिए । हम गुरुचरणों में अपना शीश अर्पण करें, तो भी वह अल्प ही है । हम गुरु से सदैव सकाम वस्तुएं मांगते हैं; परन्तु हमारा दुःख हमारा ही कर्म होता है । इसलिए वह हमें ही भोगना होता है । अतः गुरुदेवजी से हमें सदैव दुःख सहन करने के लिए बल मांगना चाहिए । अनेक जन्मों के पुण्य से गुरु का आंतरिक सान्निध्य मिलता है । गुरु की हम पर सतत कृपा बनी रहे, इसके लिए उनके बताए अनुसार हमें आचरण करना चाहिए ।”