२ मार्च को ‘होली’ है, इस उपलक्ष्य में …
१. होली के विभिन्न नाम
होली का त्योहार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन आता है । देश के विभिन्न क्षेत्रों की पद्धतियों के अनुसार फाल्गुनी पूर्णिमा से लेकर पंचमी तक के ५ – ६ दिन की अवधि में कहीं २ दिन, तो कहीं ५ दिन मनाया जाता है । उत्तर में यह त्योहार होरी एवं दौलायात्रा के नाम से; गोवा एवं महाराष्ट्र राज्यों में शिमगा, होली, हुताशनी महोत्सव अथवा होलिकादहन के नाम से, बंगाल में दौलायात्रा के नाम से; जबकि दक्षिण में कामदहन के नाम से जाना जाता है ।
२. होली का भावार्थ
दुष्ट प्रवृत्तियों एवं अमंगल विचारों का नाश कर सत्प्रवृत्ति का मार्ग दिखानेवाला उत्सव है होली !
३. होली का इतिहास
प्राचीन काल में ढूंढा अथवा ढौंढा नामक राक्षसी गांव में घुसकर छोटे बच्चों को कष्ट देती थी । वह रोग उत्पन्न करती थी । लोगों ने उसे गांव से बाहर निकाल देने के लिए बहुत प्रयास किए; परंतु वह गांव से बाहर नहीं जा रही थी । ‘नगर के बच्चों को कष्ट देनेवाली ‘ढूंढा’ राक्षसी का प्रतिकार कैसे करें ?’, इस विषय में नारदमुनि सम्राट युधिष्ठिर को उपाय बताते हैं कि सूखी लकडियों एवं उपलियों का ढेर रचकर रक्षोघ्न अर्थात राक्षसों का नाश करनेवाले मंत्रों से अग्नि प्रज्वलित करें । अग्नि की ३ परिक्रमाएं कर हर्षित मन से तालियां बजाएं तथा हंसे । इस कृति के कारण पापी राक्षसी क्षीण हो जाएगी तथा वहां से बाहर निकल जाएगी । भविष्योत्तर पुराण में यह उल्लेख मिलता है ।
४. मनाने की विधि
‘सायंकाल में अथवा रात में होली मनाने हेतु श्री होलिकापूजन का स्थान गोबर से लीपकर रंगोली बनाकर सुशोभित करें । मध्य में एरंड, नारियल, सुपारी अथवा गन्ना खडा कर उसके आस-पास उपलें एवं सूखी लकडियां डालें । पूजा करनेवाला व्यक्ति शुचिर्भूत होकर तथा देशकाल का उच्चारण कर संकल्प कर पूजा करें तथा भोग लगाए । उसके उपरांत ‘होलिकायै नमः’ बोलकर होली जलाएं । होली जलना आरंभ होने पर होली की परिक्रमा करें तथा मुंह पर उल्टा हाथ रखकर होहल्ला मचाएं । श्री श्री होलिकादेवी को मीठी पुरी का भोग एवं नारियल समर्पित करें तथा वहां इकट्ठा लोगों को उसे प्रसाद के रूप में दें । होली के पूरे जल जाने पर उस पर दूध एवं घी छिडककर उसे शांत करें’, यह होली की विधि है ।
५. दुष्प्रचार का खंडन
वर्तमान में अनेक स्थानों पर होली के संदर्भ में ‘कचरे की होली करें अथवा होली को मीठी पुरी अर्पण न कर उसे गरीबों में बांटे’, ऐसा आवाहन किया जाता है । विशेष बात यह कि ऐसा आवाहन करनेवाले तथाकथित आधुनिकतावादियों को पर्यावरणप्रेम अथवा समाजकार्य का स्मरण केवल हिन्दुओं के त्योहारों के समय ही होता है । ये लोग पूरे वर्ष तोडे जानेवाले वृक्ष एवं होनेवाले प्रदूषण के विषय में कभी कुछ नहीं बोलते । इसलिए होली के उपलक्ष्य में किए जानेवाले धर्मविरोधी आवाहनों के झांसे में न आकर हमें पारंपरिक पद्धति से होली मनानी चाहिए; क्योंकि शास्त्रशुद्ध पद्धति से जलाई जानेवाली होली से प्रदूषण नहीं होता, अपितु वातावरण की शुद्धि होती है ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)
धुलैंडी
१. तिथि : फाल्गुन पूर्णिमा (३ मार्च)
२. पूजन : इस दिन होली की राख अथवा धुलि की पूजा का विधान है । पूजा हो जाने पर आगे दिए मंत्र से उसकी प्रार्थना करते हैं ।
वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शङ्करेण च ।
अतस्त्वं पाहि नो देवि भूते भूतिप्रदा भव ॥
अर्थ : हे लक्ष्मी, तुम इंद्र, ब्रह्मा एवं महेश द्वारा वंदित हो, इसलिए हे ऐश्वर्यवती देवी, तुम हमें ऐश्वर्य देनेवाली बनो एवं हमारी रक्षा करो ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार मनाने की उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)

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