अनेक बार हमारे ध्यान में नहीं आता कि अपने नित्य जीवन में हम ऐसे कुछ काम करते हैं, जो अनुचित हैं । चाहे वह कुलदेवता का नाम हो, पूर्वजों का नाम हो, प्रकृति का नाम हो अथवा अन्य कोई भी अर्थपूर्ण नाम हो, बच्चों के नाम अच्छे उद्देश्य से रखे जाते हैं; परंतु हमारे समाज में यह बात सामान्य है कि हम उन्हें उनके पूरे नाम से नहीं पुकारते । जैसे कि रामकृष्ण के स्थान पर राम, शिव कुमार के स्थान पर शिव, श्रीनिवास के स्थान पर सीनू, बालकृष्ण के स्थान पर बाल इत्यादि । इस प्रकार अधूरा नाम लेने से उस व्यक्ति का विकास रुक जाता है, जिससे अनिष्ट शक्तियां उसे घेर लेती हैं ।

संपूर्ण नाम लेकर पुकारने से व्यक्ति को सकारात्मकता एवं ऊर्जा मिलना
प्रत्येक नाम की अपनी एक शक्ति एवं महत्त्व होता है । जब किसी व्यक्ति को उसके पूरे नाम से पुकारा जाता है, तब उस नाम से संबंधित सकारात्मकता एवं ऊर्जा उस व्यक्ति को प्राप्त होती है । जिस प्रकार सूर्योदय के समय सूर्य हमें नई ऊर्जा देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य में प्रतिदिन सकारात्मक ऊर्जा आती है, उदाहरणार्थ किसी देवता का नाम लेने से वह दैवीतत्त्व उस व्यक्ति में वास करता है । किसी पितातुल्य व्यक्ति का नाम लेने से उनके गुण एवं शक्ति उस नाम के माध्यम से प्रवाहित होने लगती है; इसलिए किसी को अधूरे नाम से पुकारने की आदत हमें तुरंत छोड देनी चाहिए ।
हमें बचपन से ही सभी को उनके पूरे नाम से पुकारने की आदत डालनी चाहिए । जैसे ईश्वर के विषय में कहा जाता है, ‘यदि आपके पास आपके नाम का सामर्थ्य है, तो वह पर्याप्त है ।’ उसी प्रकार व्यक्तियों के नाम में भी एक महत्त्वपूर्ण शक्ति होती है । नाम की यह शक्ति प्रत्येक व्यक्ति एवं प्रत्येक जीव में है । किसी को उसका पूरा नाम लेकर पुकारने से उस व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है । प्रत्येक व्यक्ति को अपने नित्य जीवन में इस सकारात्मक आदत को अपनाने का प्रयास करना चाहिए ।
उपनाम से (घर के नाम से) पुकारकर उस व्यक्ति में हीन भावना उत्पन्न करने की अपेक्षा सम्मानपूर्वक दिए गए नाम से पुकारना अधिक उचित !
अनेक घरों में बच्चों को प्रेम से उपनाम से पुकारने की प्रथा है । कभी-कभी यह नाम लाड एवं अपनेपन से दिया जाता है; परंतु अनेक बार बच्चों की ऊंचाई, रंग, वजन, उनकी बात करने की शैली अथवा उनकी किसी आदत पर रखे जानेवाले उनके उपनाम उन पर नकारात्मक परिणाम डालते हैं । जैसे, लट्ठू, कालू एवं गप्पू जैसे नामों से पुकारना बच्चों के मन में हीनता का भाव उत्पन्न कर सकता है । छोटी आयु में उनकी आत्मप्रतिमा संवेदनशील होती है । अत: ऐसे नामों के कारण उनका आत्मविश्वास अल्प होने की संभावना रहती है । उपनाम बच्चों के व्यक्तित्व को आकार देते हैं । वे स्वयं के विषय में कैसे विचार करते हैं ? तथा वे अन्यों के साथ कैसे व्यवहार करते हैं ?, यह उस पर निर्भर होता है । कभी-कभी बच्चों के हास्यास्पद नामों के कारण विद्यालय में उनके मित्रों द्वारा उन्हें चिढाए जाने की संभावना भी बढ जाती है । उनके बडे हो जाने पर भी ऐसे अनुभवों का परिणाम दिखाई देता है ।
अभिभावक, परिजन अथवा निकट के लोगों द्वारा बच्चों को दिए गए वास्तविक नाम से अथवा सम्मानपूर्वक दिए गए प्रेमभरे नाम से पुकारना अधिक उचित है । उसके कारण वे स्वयं के प्रति सकारात्मक भावना विकसित करते हैं, उनका आत्मविश्वास बढता है तथा उससे उनका व्यक्तित्व स्वस्थ रूप से विकसित होता है । इसीलिए बच्चों को अनादरजन्य अथवा उन्हें नीचा दिखानेवाले उपनामों से पुकारना तत्काल बंद करना, उनके भविष्य के लिए एक छोटा परंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध होता है ।
– निर्मिति तुषार रसाळ (साभार : ‘टीवी ९’ का जालस्थल)
| बुरी शक्ति : वातावरण में अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्य में अच्छी शक्तियां मानव की सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानव को कष्ट देती हैं । प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञों में राक्षसों ने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणों में हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ अनिष्ट शक्तियों से हो रही पीडा के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपचार वेदादि धर्मग्रंथों में वर्णित हैं । |
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