
१. मां का निधन होने पर घर (गोवा) न जाकर प्रयागराज के महाकुंभपर्व की सेवा को प्राथमिकता देना
‘२५.१.२०२५ को श्री. गुरुराज प्रभु (आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत, आयु ४९ वर्ष) की मां का (श्रीमती भारती प्रभु, आध्यात्मिक स्तर ६३ प्रतिशत, आयु ८७ वर्ष) का मडगांव (गोवा) में निधन हुआ । उस समय श्री. गुरुराज एवं उनकी पत्नी श्रीमती श्रेया प्रभु (आध्यात्मिक स्तर ६८ प्रतिशत, आयु ४८ वर्ष) प्रयागराज के महाकुंभपर्व की महत्त्वपूर्ण सेवा में सहभागी थे । उस समय महाकुंभपर्व का महत्त्वपूर्ण क्षण चल रहा था । ऐसी स्थिति थी कि ‘उन दोनों को घर (गोवा) जाना पडेगा ।’ उन दोनों ने आपस में बात की, ‘मां की मृत्यु पर सेवा छोडकर घर जाएं या नहीं ?’, साथ ही उन्होंने इस विषय में गोवा में उनके परिजनों से भी बात की । उसके उपरांत उन्होंने घर न जाकर महाकुंभ की सेवा को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया । इसके लिए उनके परिजनों की भी प्रशंसा करनी पडेगी कि इनसे कोई अपेक्षा न रखते हुए स्थिति को संभाला तथा दोनों को पूर्ण सहयोग दिया ।

२. कुंभपर्व के उपरांत भी सेवा को ही महत्त्व देना तथा ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ से संबंधित सेवा के लिए गोवा जाना
मार्च २०२५ में कुंभपर्व समाप्त होने पर श्री. गुरुराज एवं उनकी पत्नी श्रीमती श्रेया ने घर जाना सुनिश्चित किया था; परंतु उन्हें कुंभपर्व पश्चात की अनेक सेवाएं पूर्ण करनी थीं । इसलिए उन दोनों ने सेवा के दायित्व का भान रखते हुए घर न जाकर पुनः सेवा को ही प्राथमिकता दी । श्री. गुरुराज अप्रैल महीने में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ की सेवा के लिए सीधे गोवा चले गए तथा वहां उन्होंने महोत्सव के मंडप-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, साथ ही श्रीमती श्रेया महोत्सव के एक दिन पूर्व गोवा आईं तथा उन्होंने भी महोत्सव में सेवा की ।
इस प्रकार इन दोनों ने सभी साधकों के सामने ‘गुरुकार्य के लिए त्याग कैसे करना चाहिए ?’, इसका एक आदर्श रखा है । ‘गुरुदेवजी की कृपा से हमें श्री. गुरुराज एवं श्रीमती श्रेया जैसे साधकरत्न मिले हैं’, इसके लिए गुरुदेवजी के चरणों में जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, अल्प ही है ।’
– (सद्गुरु) श्री. नीलेश सिंगबाळ, धर्मप्रचारक संत, हिन्दू जनजागृति समिति, वाराणसी, उत्तर प्रदेश. (१०.६.२०२५)
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