‘सूर्यमाला के ग्रह विशिष्ट सूक्ष्म ऊर्जाओं के वाहक हैं । वे मनुष्य के अंतःकरण पर अर्थात व्यक्तित्व पर अपना प्रभाव छोडते हैं । व्यक्ति के विचार एवं कृति उसके व्यक्तित्व पर आधारित होते हैं । ग्रह मनुष्य के व्यक्तित्व के किन पहलुओं को दर्शाते हैं, इस लेख के द्वारा यह समझ लेते हैं ।
(भाग १)

१. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों का महत्त्व
१ अ. निरंतर गतिशील ग्रह परिवर्तन के सूचक होना : ज्योतिषशास्त्र में प्रमुख ३ घटक हैं – जन्मकुंडली में स्थित स्थान, आकाश में स्थित नक्षत्र एवं सूर्यमाला के ग्रह ! उनमें से जन्मकुंडली में स्थित स्थान एवं आकाश के नक्षत्र, ये स्थिर घटक हैं । (जन्मकुंडली में स्थित स्थान आकाश के १२ विभाग हैं, इसलिए उनमें कभी परिवर्तन नहीं होता । नक्षत्र भी स्थिर हैं; परंतु पृथ्वी स्वयं की परिक्रमा करती है, उसके कारण ऐसा दिखाई देता है कि नक्षत्र प्रतिदिन पूर्व से पश्चिम की ओर बढ रहे हैं ।) किन्तु सूर्यमाला के ग्रह निरंतर गतिशील रहते हैं । ग्रहों के गतिशील होने के कारण वे परिवर्तन के सूचक होते हैं ।
१ आ. ग्रहों की स्थिति के अनुसार उनसे प्रक्षेपित ऊर्जा का परिणाम जीव के अंतःकरण पर होना : ग्रहों में उनका आकार, रंग, गति आदि के अनुसार विशिष्ट सूक्ष्म ऊर्जा होती है । यह ऊर्जा त्रिगुण (सत्त्व, रज एवं तम) तथा पंचतत्त्वों (पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश) के स्तर पर होती है । २ ग्रहों में विशिष्ट योग (कोण) बनता है, तो उन २ ग्रहों की ऊर्जाओं के मिलन से एक तीसरी ऊर्जा उत्पन्न होती है । पृथ्वी पर जीव के स्थान के अनुसार कोई ग्रह आकाश के किस भाग (स्थान) में है, इसके अनुसार भी ऊर्जा की तीव्रता में परिवर्तन होता है । ग्रहों से प्रक्षेपित ऊर्जा मनुष्य के शरीर, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त एवं अहं पर प्रभाव डालती है । शिशु के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के अनुसार उनसे प्रक्षेपित ऊर्जाओं का शिशु के अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त एवं अहं) पर परिणाम होता है ।
२. ग्रहों की विशिष्ट ऊर्जा का मनुष्य के व्यक्तित्व पर होनेवाला प्रभाव

२ अ. मन के संस्कारों को दर्शानेवाला चंद्रमा : पृथ्वी से सबसे निकट का (उप) ग्रह है चंद्रमा ! चंद्रमा आपतत्त्व से संबंधित है । ग्रहणशीलता, संवेदनशीलता एवं संस्कारक्षमता चंद्रमा की विशेषताएं हैं । उसके कारण चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है । मन की विशेषता यह है कि उस पर किसी भी अच्छी-बुरी बात का संस्कार बडी सहजता से होता है । उन विषय में तर्क-वितर्क (कारणमीमांसा) करने की क्षमता मन के पास नहीं होती; वह क्षमता बुद्धि में होती है । मन जिस बात के संपर्क में आता है, वह उसे उसी स्थिति में स्वीकार करता है । ज्योतिषशास्त्र में चंद्रमा को बचपन का कारक माना गया है । १२ वर्ष का होने तक बालक उसके माता-पिता, परिवार, उसके आसपास की स्थिति आदि से होनेवाले संस्कारों को वैसे के वैसे ही ग्रहण करता रहता है । इस काल में उसके व्यक्तित्व की नींव आकार लेती है ।
२ अ १. चंद्रमा का अन्य ग्रहों के साथ संयोग : जन्मकुंडली में स्थित चंद्रमा के अन्य ग्रहों से होनेवाले संयोग के आधार पर व्यक्ति के मन पर किस प्रकार के संस्कार हो सकते हैं, यह ध्यान में आता है; उदा. चंद्रमा का बुध से संयोग हो, तो मन पर जिज्ञासा, सतर्कता, तर्क, चंचलता आदि गुणों के संस्कार होते हैं । चंद्रमा का शुक्र के साथ संयोग हो, तो मन पर प्रेम, सौंदर्य, वात्सल्य, सृजनशीलता आदि के संस्कार दिखाई देते हैं । मंगल के साथ चंद्रमा का संयोग होने पर मन पर क्रियाशीलता, उत्साह, धैर्य, बल आदि के संस्कार हो सकते हैं । बृहस्पति से चंद्रमा का संयोग होने पर मन पर सात्त्विकता, व्यापकता, अन्यों का विचार करना, धर्मपरायणता आदि के संस्कार होते हैं । चंद्रमा का शनि के साथ संयोग होने से मन पर संयम, उदासीनता, विचारशीलता आदि के संस्कार होते हैं ।
२ आ. आकलनशक्ति का कारक बुध : चंद्र के उपरांत व्यक्ति के व्यक्तित्व की नींव को आकार देनेवाला दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रह है बुध ! चंद्रमा मन का, जबकि बुध बुद्धि का कारक है । बुद्धि के पास कारणमीमांसा करने की क्षमता होने से वह कोई भी बात, जैसी होती है, उसी स्थिति में स्वीकार न कर उस बात का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है । उसके कारण जिज्ञासुवृत्ति, आकलनशक्ति, स्मरणक्षमता आदि बुध ग्रह की विशेषताएं हैं । बुध ग्रह किशोरावस्था से संबंधित है । किशोर आयु में अर्थात आयु के १२ से १८ वर्ष की अवधि में बच्चों में जिज्ञासा एवं समझ बढती रहती है । इस काल में बच्चों को उनकी रुचि-अरुचि, क्षमता एवं कुछ मात्रा में कौशल का बोध होने लगता है तथा उनकी बौद्धिक क्षमता विकसित होती रहती है ।
२ आ १. अन्य ग्रहों से बुध का संयोग : जन्मकुंडली में स्थित बुध के अन्य ग्रहों के साथ संयोग के आधार पर व्यक्ति की बुद्धि का स्वरूप तथा उसकी दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है । बुध का शुक्र के साथ संयोग हो, तो ऐसे व्यक्ति का झुकाव कला, कौशल, सौंदर्य, सृजनशीलता (कल्पनाशक्ति का उपयोग कर कुछ नई निर्मिति की क्षमता) आदि की ओर होता है । बुध का संयोग मंगल से हो, तो उस व्यक्ति की बुद्धि तीक्ष्ण होने से उसे गणित, तकनीक, विज्ञान, सांख्यिकी-विवेचन आदि में गति होती है । बुध का संयोग बृहस्पति के साथ हो, तो व्यक्ति में अध्येतावृत्ति होने से उसे विद्या, शास्त्र, इतिहास, न्याय, समाज, धर्म आदि में रुचि होती है । बुध का शनि के साथ संयोग होने से व्यक्ति में परिपक्वता होने से शोध कार्य, चिंतन, सामाजिक सुधार आदि के लिए वह अनुकूल होता है ।
२ इ. जीवन के रस का (सुख का) कारक शुक्र : शुक्र व्यक्ति की मानसिकता को तैयार करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण ग्रह है ।
१. शुक्र जीवन का ‘रस’ है । यह रस आनंद, सौंदर्य, प्रेम, हर्ष, सुख आदि विभिन्न रूपों में व्यक्त होता है ।
२. परिजनों से मनोवैज्ञानिक सुरक्षा एवं सहानुभूति; जीवनसाथी से प्यार एवं सहयोग मिलेंगे ।
३. घर, वाहन, धन एवं अन्य भौतिक सुविधाओं के कारण मिलनेवाले सुख के विषय शुक्र ग्रह से संबंधित हैं ।
४. गायन, वादन, नृत्य, शिल्प आदि विभिन्न कलाओं से व्यक्त होनेवाला सौंदर्य, आनंद आदि पर शुक्र ग्रह का प्रभाव है ।
५. शुक्र युवावस्था से संबंधित है । व्यक्ति को उसकी युवावस्था में सुख एवं प्रेम प्राप्त करने की अभिलाषा अधिक होती है ।
२ इ १. अन्य ग्रहों के साथ शुक्र : जन्मकुंडली में स्थित शुक्र के अन्य ग्रहों से संयोग के आधार पर व्यक्ति किन बातों में सुख की खोज करता है, इसका बोध होता है ।
अ. शुक्र चंद्रमा के साथ होने पर व्यक्ति को वात्सल्य, शुश्रूषा, सौंदर्य, कला आदि में आनंद प्रतीत होता है ।
आ. शुक्र मंगल के साथ होने से व्यक्ति को वस्त्राभूषण, भौतिक वस्तुएं, धन, इंद्रियसुख आदि में अधिक सुख प्रतीत होता है ।
इ. शुक्र बृहस्पति के साथ होने से व्यक्ति को समृद्धि, धर्माचरण, संस्कृति, सामाजिक एकता, ईश्वरभक्ति आदि में आनंद प्रतीत होता है ।
ई. शुक्र शनि के साथ होने से व्यक्ति को ज्ञान, वैराग्य, त्याग आदि में संतुष्टि प्रतीत होती है ।
२ ई. इच्छाशक्ति एवं बल का कारक मंगल : मनुष्य के जीवन का कुल उत्कर्ष साधने में मंगल ग्रह की भूमिका महत्त्वपूर्ण है । मंग्रल ग्रह अग्नितत्त्व से संबंधित है । किसी कर्म को करने के लिए आवश्यक ‘इच्छाशक्ति’ एवं ‘बल’ मंगल ग्रह के विशेष गुण हैं । उसके कारण कर्तृत्व, पराक्रम, साहस, धैर्य, आत्मविश्वास, क्रियाशीलता आदि विशेषताएं मंगल ग्रह से संबंधित हैं । मंगल ग्रह युवावस्था पर प्रभाव डालता है । युवावस्था में व्यक्ति में स्थित बल, उत्साह, उन्नति की प्रेरणा, स्वयं की क्षमता को प्रकट करने की इच्छा, प्रतिकूल स्थिति का सामना करने की तैयारी आदि मंगल की शक्ति की अभिव्यक्ति हैं ।
२ ई १. अन्य ग्रहों के साथ मंगल : जन्मकुंडली में अन्य ग्रहों के साथ मंगल ग्रह के होने से व्यक्ति में किस प्रकार की क्षमता है, यह ध्यान में आता है ।
अ. बुध ग्रह के साथ मंगल होने पर व्यक्ति को संवाद, विश्लेषण, तर्क, तकनीक आदि में गति एवं रुचि होती है ।
आ. शुक्र ग्रह के साथ मंगल होने पर व्यक्ति सृजनशीलता, कला, सौंदर्यीकरण, प्रस्तुतीकरण आदि में निपुण होता है ।
इ. रवि के साथ मंगल होने पर व्यक्ति में नेतृत्व, अधिकार, व्यवस्थापन आदि की क्षमता होती है ।
ई. बृहस्पति के साथ मंगल होने पर व्यक्ति को धर्म, न्याय, शिक्षा आदि में रुचि होती है तथा वह समाजकार्य में योगदान देता है ।
उ. शनि के साथ मंगल होने पर व्यक्ति में परिश्रम की वृत्ति एवं दृढता होती है ।
२ उ. माया का परिपूर्ण विकास साधनेवाला राहु : व्यक्त कराना, वृद्धि करना, स्थूलता की ओर जाना आदि कार्य राहु ग्रह के हैं । उसके कारण राहु ग्रह का स्वभाव बहिर्मुख है; जिसकी गति ‘अंदर से बाहर’, ऐसी है । राहु की दृष्टि में आत्मा की अपेक्षा शरीर, सारगर्भ से अधिक सतह, सूक्ष्म की अपेक्षा स्थूल तथा एक की अपेक्षा अनेक का अधिक महत्त्व है । उसके कारण राहु को ‘भ्रमित करनेवाला एवं मायाजाल रचनेवाला’ कहा जाता है; परंतु राहु ग्रह स्वयं को व्यक्त करनेवाली, विविधता उत्पन्न करनेवाली तथा कार्य को मूर्त रूप प्रदान करनेवाली ईश्वर की ही एक शक्ति है । राहु ग्रह धन, बुद्धि, सुख, प्रसिद्धि आदि भौतिक बातों का दाता है ।
२ उ १. अन्य ग्रहों के साथ राहु : जन्मकुंडली में राहु के अन्य ग्रहों के साथ होने पर व्यक्ति किन माध्यमों से स्वयं को अभिव्यक्त करेगा, यह ध्यान में आता है ।
अ. यदि राहु बुध के साथ है, तो व्यक्ति बुद्धि, संवाद, साहित्य आदि से स्वयं को अभिव्यक्त करता है ।
आ. यदि राहु शुक्र के साथ है, तो व्यक्ति सौंदर्य, कला, रचनात्मकता आदि से स्वयं को अभिव्यक्त करता है ।
इ. यदि राहु मंगल के साथ है, तो व्यक्ति कर्तृत्व, नेतृत्व, बल आदि से स्वयं को अभिव्यक्त करता है ।
ई. यदि राहु बृहस्पति के साथ है, तो व्यक्ति पांडित्य, विद्वत्ता, विद्या आदि से स्वयं को अभिव्यक्त करता है ।’
(क्रमशः)
– श्री. राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (१०.११.२०२५)
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