
प्रश्न :
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : ‘क्या व्यक्ति के अनाहत चक्र के स्थान पर उसका अंतर्मन होता है ? यदि हां, तो उसका बाह्यमन कहां होता है ?’ (२६.११.२०२५)
उत्तर :
श्री राम होनप :
१. मन का उद्गम स्थान :

व्यक्ति का ‘अनाहत चक्र’ ।
२. मन की परिभाषा :
व्यक्ति के अनाहत चक्र के स्थान पर उसकी इच्छाओं, वासनाओं एवं अहंकार की सूक्ष्म संवेदनाएं होती हैं । इसमें आकर्षण शक्ति होती है । इसके द्वारा व्यक्ति के शरीर के पंचप्राण आंशिक रूप से घनीभूत (condensed) होते हैं । आत्मा के चारों ओर इस घनीभूत वायु का एक आवरण बन जाता है । उस घनीभूत वायु को ही ‘व्यक्ति का मन’ कहते हैं ।
३. मन का वर्गीकरण :
व्यक्ति के मन का वर्गीकरण इस प्रकार है :
३ अ. अंतर्मन : व्यक्ति के अनाहत चक्र से ३ मिमी (मिलीमीटर) की दूरी तक मन गोलाकार होता है । इसे ‘व्यक्ति का अंतर्मन’ कहते हैं । इसमें व्यक्ति के वर्तमान जन्म में भोगे जानेवाले ‘प्रारब्ध’ (भाग्य) समाहित होते हैं ।
३ आ. श्लेषज मन (श्लेषज मन) : व्यक्ति के अनाहत चक्र से ३ मिमी से ६ मिमी की दूरी तक गोलाकार मन होता है । इस मन को ‘श्लेषज मन’ (जोडने वाला मन) कहते हैं । व्यक्ति के अंतर्मन एवं बाह्यमन के मिलन/संयोग को ‘श्लेषज मन’ कहते हैं ।
३ आ १. श्लेषज मन का कार्य : व्यक्ति के अंतर्मन में वर्तमान जन्म के प्रारब्ध होते हैं । ये प्रारब्ध व्यक्ति की आयु एवं काल के अनुसार चरणबद्ध पद्धति से प्रकट होते रहते हैं । ये सूक्ष्म संवेदनाएं अंतर्मन से श्लेषज मन तक पहुंचती हैं । इसके विपरीत, व्यक्ति दैनिक जीवन में अनगिनत परिस्थितियों का सामना करता है । उनकी सूक्ष्म संवेदनाएं बाह्यमन से श्लेषज मन तक तथा उसके पश्चात अंतर्मन तक पहुंचती हैं । ‘श्लेषज मन’ ही अंतर्मन एवं बाह्यमन से आनेवाली इन सूक्ष्म संवेदनाओं का नियंत्रण करता है ।
३ आ २. श्लेषज मन एवं बुद्धि का परस्पर संबंध : श्लेषज मन व्यक्ति के मस्तिष्क से संबंधित कोशिकाओं (cells) तथा उनमें प्रवाहित सूक्ष्म ऊर्जा के साथ जुडा होता है । श्लेषज मन अंतर्मन एवं बाह्यमन से आनेवाली सूक्ष्म संवेदनाओं को एक ही समय में बुद्धि तक पहुंचाता है । इसके उपरांत बुद्धि यह निश्चित करती है कि ‘किन संवेदनाओं के अनुसार विचार एवं कृति करनी है ?’ इससे व्यक्ति के लिए दैनिक जीवन जीना सरल हो जाता है । श्लेषज मन एवं बुद्धि (मेधा) के इस संबंध को ‘श्लेषज-मेधा बंध’ कहते हैं ।
३ आ ३. श्लेषज मन के निर्बल (कमजोर) होने से होनेवाली हानि : यदि व्यक्ति का श्लेषज मन निर्बल हो जाए, तो अंतर्मन में उठनेवाली तीव्र भावनाओं (जैसे समुद्र की लहरें) पर श्लेषज मन का नियंत्रण नहीं रह जाता है । फलस्वरूप वे सभी भावनाएं व्यक्ति के बाह्यमन तक पहुंच जाती हैं । ऐसी स्थिति में मन के ऊपर से बुद्धि का नियंत्रण छूट जाता है । परिणामतः वह व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है अथवा आत्महत्या कर लेता है ।
३ आ ४. श्लेषज मन के विषय में सूक्ष्म से प्राप्त (ओवियां) काव्य पंक्तियां !
अंतर्मन ‘ज’ है तथा बाह्यमन ‘सजग’ है ।
श्लेषज मन दोनों का भार ढोता है ।। १ ।।
मन का यह गूढ ज्ञान अपने आप स्पष्ट होता है ।
गुरुकृपा से ही भीतर की यह समझ है ।। २ ।।
उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ : व्यक्ति के अंतर्मन में उसके वर्तमान जन्म के प्रारब्ध होते हैं, इसलिए उस मन को ‘जड’ कहा गया है । व्यक्ति का बाह्यमन ‘विभिन्न व्यक्तियों एवं परिस्थितियों’ के प्रति निरंतर जागरूक रहता है । अंतर्मन एवं बाह्यमन का समन्वय, अर्थात इनका संतुलन श्लेषज मन संभालता है । अंतर्मन एवं बाह्यमन के विचार तो व्यक्ति की समझ में आ सकते हैं; परंतु इन दोनों के मध्य स्थित श्लेषज मन का ज्ञान साधक को केवल गुरुकृपा से ही प्राप्त हो सकता है ।
४. बाह्यमन :
समाज के साथ व्यक्ति के संपर्क के कारण उसके मन में अनगिनत संवेदनाएं उत्पन्न होती हैं । इस कारण अनाहत चक्र से ६ मिमी से ९ मिमी तक मन का वृत्ताकार विस्तार हो जाता है । इसे व्यक्ति का ‘बाह्यमन’ कहते हैं ।
५. अंतर्मन, श्लेषज मन एवं बाह्यमन (सारांश) :
व्यक्ति के अनाहत चक्र से ३ मिमी की दूरी तक अंतर्मन, उसके आगे ३ मिमी से ६ मिमी तक श्लेषज मन तथा उसके पश्चात ६ मिमी से ९ मिमी तक बाह्यमन होता है ।
– श्री राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा । (२७.११.२०२५)
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