
नवी देहली — फुटपाथ पर चलना लोगों का मौलिक अधिकार है । यदि सडक है, तो वहां पैदल चलने वालों के लिए निर्धारित तथा अच्छी तरह से रखरखाव किए गए फुटपाथ भी होने चाहिए । केंद्र सरकार को पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा हेतु कानून बनाने पर विचार करना चाहिए, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने एक प्रकरण की सुनवाई के समय कहा । इस प्रकरण में विद्यालय जा रहे ५ वर्षीय बालक की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी ।
संविधान ने दिया है चलने का अधिकार !
न्यायालय ने कहा कि चलने का अधिकार संविधान के भाग-३ के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है । यह अनुच्छेद १९(१)(डी) के अंतर्गत आवागमन की स्वतंत्रता के साथ-साथ अनुच्छेद १९(१)(ए), १९(१)(बी), १९(१)(सी) तथा अनुच्छेद २१ से भी जुडा हुआ है । फुटपाथ पर वाहनों की अपेक्षा पैदल यात्रियों का अधिकार है । संबंधित संस्थाओं को फुटपाथों का निर्माण, रखरखाव एवं संरक्षण करना चाहिए ।
अनेक चालक पैदल यात्रियों तथा उनके फुटपाथ को बाधा मानकर उन्हें कुचल देते हैं !
न्यायालय ने यह भी कहा कि मनुष्य पहिए के आविष्कार से बहुत पहले से चल रहा है । अब तक चलने के अधिकार को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया गया । आज यातायात ने सडकों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है । स्थिति ऐसी हो गई है कि अनेक चालक पैदल यात्रियों तथा उनके फुटपाथ को बाधा मानकर उन्हें कुचल देते हैं । यह स्थिति बदलनी चाहिए । मोटर वाहन अधिनियम, १९८८ कई दृष्टियों से पैदल यात्रियों के अधिकारों को दुर्बल करने वाला सिद्ध हुआ है ।
सडक दुर्घटनाओं में होने वाली प्रत्येक पांचवीं मृत्यु पैदल यात्री की होती है !
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख विभाग तथा सडक परिवहन मंत्रालय के आंकडों के अनुसार वर्ष २०१९ से २०२३ के मध्य सडक दुर्घटनाओं में अनुमानतः १ लाख ५२ हजार पैदल यात्रियों की मृत्यु हुई है । औसतन प्रति वर्ष ३० हजार लोग सडक पर चलते समय दुर्घटनाओं का शिकार होकर अपने प्राण गंवाते हैं । सडक दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मृत्यु में उनका अनुपात २० प्रतिशत है । अर्थात् प्रत्येक पांचवीं मृत्यु एक पैदल यात्री की होती है ।
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