चित्तवृत्तियों का निरोध करना ही योग !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

चित्तवृत्तियों का निरोध करना अर्थात योग । अन्य शब्दों में, चित्त में विद्यमान संस्कार नष्ट करना, अर्थात योग; ऐसी योग की परिभाषा है । चित्तवृत्तियों का निरोध करने के लिए स्वयं ही साधना करनी पडती है और जनता को भी सिखानी पडती है ।

योगासन मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं, किंतु आध्यात्मिक व्यायाम हैं । मानसिक स्तर पर कार्य करनेवाले धर्मद्रोहियों का कार्य और उनके नाम कुछ वर्ष उपरांत किसी के ध्यान में नहीं रहते । इसके विपरीत ऋषियों द्वारा दिए ज्ञान का अनंत काल तक अस्तित्व बना रहता है; क्योंकि उसमें ‘ॐ’ की निर्गुण शक्ति है !

प्रतिदिन साधना करना ही योग !

‘कुछ लोग वर्ष में एक दिन ‘योग (योगासन) दिवस’ मनाने के लिए बताते हैं । इसके विपरीत सनातन के साधक एक दिन नहीं, अपितु ३६५ दिन ‘योग’ अर्थात साधना करते हैं !’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले