
चित्तवृत्तियों का निरोध करना अर्थात योग । अन्य शब्दों में, चित्त में विद्यमान संस्कार नष्ट करना, अर्थात योग; ऐसी योग की परिभाषा है । चित्तवृत्तियों का निरोध करने के लिए स्वयं ही साधना करनी पडती है और जनता को भी सिखानी पडती है ।
योगासन मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं, किंतु आध्यात्मिक व्यायाम हैं । मानसिक स्तर पर कार्य करनेवाले धर्मद्रोहियों का कार्य और उनके नाम कुछ वर्ष उपरांत किसी के ध्यान में नहीं रहते । इसके विपरीत ऋषियों द्वारा दिए ज्ञान का अनंत काल तक अस्तित्व बना रहता है; क्योंकि उसमें ‘ॐ’ की निर्गुण शक्ति है !
प्रतिदिन साधना करना ही योग !
‘कुछ लोग वर्ष में एक दिन ‘योग (योगासन) दिवस’ मनाने के लिए बताते हैं । इसके विपरीत सनातन के साधक एक दिन नहीं, अपितु ३६५ दिन ‘योग’ अर्थात साधना करते हैं !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?