
वर्ष १९६२ में जो कामिया (Joe Kamiya) नामक जैवमानस वैज्ञानिक ने अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से पहली बार योगसिद्धियों के संदर्भ में विद्यमान वास्तविकताओं से संबंधित वैज्ञानिक ब्योरा प्रकाशित किया ।
इस ब्योरे से यह प्रमाणित हुआ कि विज्ञान के लिए असंभव प्रतीत होनेवाली गतिविधियां – उदा. हृदयस्पंदन अथवा श्वसनक्रिया की गति अल्प-अधिक करना, योग के कारण संभव है । रूढ (Classical) शरीरक्रियाशास्त्र और मस्तिष्क विज्ञान (Physiology और Brain Science) की अनेक मान्यताओं में इस ब्योरे से बडी क्रांति आने लगी ।
योगसाधना के संदर्भ में जब अधिक चिकित्सा आरंभ हुई, तब स्वाभाविक रूप से ही उसके सभी अंगों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन होने लगा । ‘योगसाधना से जो सिद्धियां प्राप्त होती हैं’, वह कोई चमत्कार अथवा पाखंड नहीं है; किंतु एक वास्तव है, यह प्रमाणित होने लगा ।
दुर्भाग्यवश भारत में यह योगशास्त्र आज प्राणायाम और आसनों के परे जाता हुआ नहीं दिखाई देता ।
– संपादक : डॉ. विजय वासुदेव बेडेकर (संदर्भ : त्रैमासिक ‘सद्धर्म’, जुलाई २०१५)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !