
संपूर्ण विश्व में कभी भी नष्ट न होनेवाली सप्तपुरी हैं । उनमें से ‘कांचीपुरम्’ एक नगरी है । यह मोक्षपुरी भी है । कामाक्षी देवी इस नगर की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी के ‘कांचीपुरम्’ में निवास हेतु आने का कारण आगे दिया है ।

१. कांचीपुरम् के ‘एकांबरेश्वर’ मंदिर में जाने पर हुई एक घटना !
१ अ. सप्तर्षि की आज्ञा के अनुसार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी का कांचीपुरम् के ‘एकांबरेश्वर’ मंदिर में जाना : १.७.२०२३ को अर्थात गुरुपूर्णिमा से दो दिन पहले, सप्तर्षि ने जीवनाडी-पट्टिका के माध्यम से श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी को कांचीपुरम् के ‘एकांबरेश्वर’ मंदिर में जाने के लिए कहा । दक्षिण भारत में पंचमहाभूतों से संबंधित शिवजी के ५ मंदिर हैं । उनमें से ‘एकांबरेश्वर’ शिवजी का पृथ्वीतत्त्व से संबंधित मंदिर है । उसी के अनुसार, श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के साथ हम (मैं, श्री. वाल्मीक भुकन, श्री. स्नेहल राऊत (आध्यात्मिक स्तर ६३ प्रतिशत, आयु ३८ वर्ष) और श्री. विनीत देसाई) उस मंदिर में गए ।
१ आ. मंदिर से बाहर आने पर केवल श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी की ही चप्पल गायब होना और ढूंढने पर भी न मिलना : वह शाम का समय था । चप्पल बाहर निकालकर हमने मंदिर में प्रवेश किया । दर्शन करने के पश्चात बाहर आने पर हम सभी की चप्पलें थीं, किंतु श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी की चप्पल नहीं दिख रही थीं । मैं और श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी मंदिर के बाहर खडे रहे और पास ही श्री. वाल्मीक भुकन, श्री. स्नेहल राऊत और श्री. विनीत देसाई, ये श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी की चप्पल खोज रहे थे ।
१ इ. एक लंबे व्यक्ति का पास आकर श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी से कांचीपुरम् की गुरुपूर्णिमा के विषय में पूछना : इतने में एक लंबा-सा व्यक्ति हमारे पास आया । उसने श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी के प्रति आदरवश अपनी चप्पल उतारी और उसने श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी की ओर देखकर तमिल भाषा में पूछा, ‘‘कल गुरुपूर्णिमा है । क्या आपको पता है कि कांचीपुरम् में गुरुपूर्णिमा कहां मनाई जाती है ?’’ इस पर मैंने उनसे कहा, ‘‘स्वामी, हम कांचीपुरम् के निवासी नहीं हैं । वर्तमान में हम चेन्नई में रहते हैं । हमें कांचीपुरम् के विषय में कुछ जानकारी नहीं है ।’’ तब वह व्यक्ति बोला, ‘‘गुरुपूर्णिमा व्यास ऋषि के लिए होती है । इसे ‘व्यासपूर्णिमा’ भी कहते हैं ।’’

१ ई. मस्तक पर विभूति का त्रिपुंड्र धारण किए हुए उस व्यक्ति का गायब हो जाना और खोजने पर भी न मिलना : इतने में हमने चप्पल खोज रहे साधकों की ओर मुडकर देखा और वापस मुडकर सामने देखा, तो वे व्यक्ति गायब हो गए थे । उस समय मंदिर में दर्शन के लिए अनेक भक्त आए थे । हम उन व्यक्ति को खोजते हुए बहुत दूर तक गए, फिर भी वे कहीं नहीं मिले । उन व्यक्ति के मस्तक पर विभूति का त्रिपुंड्र (टिप्पणी) था ।
टिप्पणी : त्रिपुंड्र अर्थात विभूति की तीन आडी रेखाएं । यह मस्तक पर लगाया जाता है और भगवान शिव से संबंधित है ।
१ उ. ‘वे व्यक्ति साक्षात शिव ही थे’, ऐसा श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी द्वारा बताया जाना : थोडी देर बाद श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी ने हमसे कहा, ‘‘वे व्यक्ति कोई और नहीं, साक्षात शिव ही थे ।’’ यह सब ४-५ मिनट में हुआ । उस समय ‘क्या हो रहा है ?’, यह हमें समझ में ही नहीं आया ।
२. सप्तर्षिें की आज्ञा के अनुसार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी द्वारा कांचीपुरम् में रहने का निश्चय करना

सप्तर्षि की आज्ञा के अनुसार, वर्ष २०२३ के नवरात्रि के समय, श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी ने आपदाकाल की दृष्टि से चेन्नई छोडकर कांचीपुरम् में निवास के लिए जाने की तैयारी आरंभ कर दी । हम वर्ष २०२३ में विजयादशमी के ४ दिन उपरांत कांचीपुरम् में एक किराए के मकान में रहने आए ।
हमारे पुराणों में कांचीपुरम् को ‘भूकैलास’ भी कहा गया है । शिवपुराण में ऐसा कहा गया है कि शिव के २ नेत्र हैं, वे हैं ‘काशी’ और ‘कांची’ ! काशी (वाराणसी) में तो हमारे साधक हैं ही । अब शिव की कृपा से कांची में भी, अर्थात कांचीपुरम् में भी सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के साधक सदैव रहेंगे, ऐसा हमें लगा ।
३. सप्तर्षि द्वारा श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी को बहुत बार कांचीपुरम् जाने के लिए कहना
जनवरी २०१५ में श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी पहली बार कांचीपुरम् आईं । अप्रैल २०१५ में वे जीवनाडी-पट्टिका के माध्यम से सप्तर्षि के संपर्क में आईं । वर्ष २०१५ से २०२३ तक, इस ८ वर्ष की अवधि में, सप्तर्षि ने ५० से अधिक बार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी को कांचीपुरम् जाने के लिए कहा और उसी के अनुसार वे उतनी बार गईं भी ।
– श्री. विनायक शानभाग (आध्यात्मिक स्तर ६८ प्रतिशत, आयु ४२ वर्ष), कांचीपुरम्, तमिलनाडु. (२१.१०.२०२४)
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