श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी का सर्वाेच्च गुण ‘प्रीति’ !

‘महर्षियों ने श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के दैवी तत्त्व को पहचानकर नाडीपट्टिका में किए उल्लेख के अनुसार उनके नाम से पूर्व ‘श्रीचित्शक्ति’ उपाधि लगाई । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी में ‘सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी’ के दैवी गुण हैं; परंतु जो गुण, उनके संपर्क में आने पर अध्यात्म की कुछ भी जानकारी न रखनेवाले सामान्य लोगों को भी तुरंत समझ में आते हैं, भाते हैं तथा उन्हें जोडकर रखते हैं, वे गुण हैं उनका अपनापन, उनका अपनेपन से बातें करना तथा निकटता साध्य करना ! आध्यात्मिक परिभाषा में इन गुणों को ‘प्रीति’ कहते हैं । व्यवहारिक जीवन में भी जो काम हमारी विद्वता से नहीं बनता, वह काम प्रेमभाव एवं उससे भी श्रेष्ठ गुण प्रीति से साध्य होता है; क्योंकि वे प्रीति के धागों के अटूट बंधन से जुड जाते हैं । (कपडा बुनते समय दो धागों की एक-दूसरे में बुनाई जितनी अटूट होती है, उतना ही कपडा दृढ एवं टिकाऊ बनता है । उसी प्रकार प्रीति के कारण लोग एक-दूसरे से दृढता से जुड जाते हैं ।) तथा स्थायी रूप से अपने बन जाते हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी में अनेक गुण हैं, परंतु उनका सर्वाेच्च गुण (मुकुटमणि) है प्रीति !

सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी

ज्ञानमार्गी व्यक्तियों की भी श्री चित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी के साथ सहजता से निकटता होना !

ज्ञानमार्गी संत पू. अनंत आठवलेजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के बडे भाई) से ज्ञानमार्ग की विशेषताएं समझते हुए श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी (वर्ष २०२१)

किसी व्यक्ति का स्वभाव गंभीर होता है अथवा कोई व्यक्ति ज्ञानमार्गी होता है । सामान्यतः लोग ऐसे व्यक्तियों से बात करना टालते हैं । वैसी प्रकृति के संत अथवा मान्यवर आश्रम में आए, तो उन व्यक्तियों से अपनापन निर्माण करने में श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी को कोई भी समस्या नहीं आती थी । वास्तव में ज्ञानमार्गियों के प्रश्नों के उत्तर देना बहुत कठिन होता है; किंतु श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी गुरुकृपा से ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने के कारण, ऐसे प्रश्नों के उत्तर सहजता से दे पाती थीं । मुखर स्वभाव के कारण उन्हें विविध जानकारी प्राप्त हुईं और प्रबल स्मरणशक्ति के कारण वे किसी भी विषय पर बात कर पाती हैं । इसलिए ज्ञानमार्गी व्यक्तियों की भी श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी से सहजता से निकटता निर्माण हो जाती है ।

– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ

१. ‘प्रीति’ गुण की विशेषता

अध्यात्म में ‘प्रीति’ सर्वोच्च गुण है । वह पंचमहाभूतों में से आकाशतत्त्व से संबंधित है । जैसे आकाशतत्त्व सभी को समा लेता है, उसी प्रकार प्रीति गुण के कारण हम सभी को अपना बना सकते हैं । आध्यात्मिक प्रगति में ‘प्रीति’ गुण का सबसे अधिक योगदान है । वह अपने में निर्माण करने के लिए दूसरे का सम्मान करना, दूसरे की बात सुनना, उनका प्रत्युत्तर देना, उचित समय पर उनको स्मरण कर उन्हें अपने में समा लेना, उनके दिए सहयोग के लिए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना जैसे पहलुओं का हमारे में होना आवश्यक है । ये सभी पहलू हममें भी निर्माण हों, इसके लिए हमारा अहं अल्प होना चाहिए ।

२. श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी में जन्मजात ‘प्रीति’ गुण होना

श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने साधना के उपरांत स्वयं में ‘प्रीति’, यह गुण विकसित किया है, ऐसा नहीं है, अपितु उनमें यह गुण बचपन से अर्थात जन्मजात ही है । हम देखते हैं कि वे चाहे कहीं भी जाएं, उनके आस-पास अनेक लोग इकट्ठा हो जाते हैं । उसी प्रकार उनके बचपन में भी चाहे विद्यालय हो अथवा कोई पारिवारिक कार्यक्रम, उनके आस-पास अनेक लोग इकट्ठा होते थे । उनमें छोटे-बडे सभी होते थे । उनके बचपन से लेकर आज तक के सभी परीचित, अपने प्रत्येक कार्यक्रम में उन्हें बुलाते हैं,उन्हें वे चाहिए होती हैं । इसका मुख्य कारण है प्रत्येक व्यक्ति से उनकी निकटता, सभी से अपनेपन से बातें करना तथा किसी को क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए; इसकी ओर ध्यान देने का उनका उनका स्वभाव ! उसके कारण वे सभी की लाडली हैं ।

पारिवारिक प्रेम की भांति द्वाराहाट, उत्तराखंड की एक महिला के साथ सहजता से संवाद करती हुईं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ! (वर्ष २०१७)
बाईं ओर से आंध्र प्रदेश के तुर्मादा नरसिंहा मूर्ति, उनकी माता (स्व.) सीतादेवी एवं पुत्र रमण के साथ श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ! (वर्ष २०२२)

३. साधक हों अथवा साधिकाएं, सभी श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी से मन खोलकर बात कर सकते हैं !

जो परिजनों के संदर्भ में ध्यान में आया, वही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी जब साधना में आईं, तब साधकों के संदर्भ में भी दिखाई दिया । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजलीजी की ‘सभी से निकटता तथा सभी से प्रेमपूर्वक बातें करना’, इन गुणों के कारण चाहे साधक हों अथवा साधिकाएं, सभी उनसे सहजता से बात कर सकते हैं ! उनसे बात करते समय किसी को अपनी आयु की बाधा नहीं आती । सभी छोटे-बडे उनसे बातें करते हैं । साधना में आनेवाली मन की बाधाएं दूर करने हेतु तथा मन खोलकर बोलने हेतु साधकों को श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के साथ बातें करने के लिए कहा गया था । इसमें साधकों एवं साधिकाओं ने उनके जीवन में आईं समस्याएं तथा घटित बुरे प्रसंग श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी को बहुत ही खुले मन से बताए । इससे साधकों का तनाव तथा उनका अपराधीपन दूर हुआ और गुरुकृपा से उन्हें साधना में आगे की यात्रा के लिए में दृष्टिकोण मिले ।

४. आश्रम में आनेवाले समाज के संतों अथवा माननीय व्यक्तियों से बहुत ही सहजता से निकटता साध्य करना, ‘अतिथि देवो भव’ के भाव से उनका आतिथ्य करना तथा उसके कारण उन व्यक्तियों द्वारा श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी को विशेष रूप से स्मरण रखना

गोवा के रामनाथी आश्रम में समाज के कोई संत अथवा मान्यवर आते हैं, तब उनसे परिचय करना, उनका कार्य जानना, उन्हें सनातन संस्था का कार्य, साथ ही आध्यात्मिक शोधकार्य की जानकारी देकर ‘उसमें और क्या किया जा सकता है ?’, इस विषय में उनसे जानकर लेना इत्यादि सेवाएं वे बडी सहजता से करती थीं । यह सब करते समय ‘अतिथि देवो भव’ के भाव से वे उन अतिथियों का बहुत अच्छा प्रबंध करतीं । जिससे संबंधित संत अथवा मान्यवर से पहली बार में अच्छे संबंध निर्माण होते थे, साथ ही वे श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी को विशेषरूप से स्मरण रखते थे । वर्ष २०१२ से श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी धर्म एवं संस्कृति के संवर्धन के लिए पूरे भारत का भ्रमण कर रही हैं । आश्रम में आकर गए समाज के संत अथवा मान्यवर पुनः कहीं मिले तथा श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने पुनः आश्रम आने का निमंत्रण दिया, तो वे कहते थे, ‘जब आप आश्रम में होंगी, तभी हम आएंगे !’

५. श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

द्वारा संपूर्ण भारत का भ्रमण कर स्वयं में विद्यमान ‘प्रीति’, इस गुण के कारण अमूल्य ज्ञान एवं सांस्कृति धरोहर का संरक्षण किया जाना, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के संतों एवं मान्यवरों को सनातन संस्था से जोडकर रखना

भारत देश धर्म एवं संस्कृति के संदर्भ में प्रचुरता से संपन्न है । भारत का पौराणिक महत्त्व है । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी वर्ष २०१२ से भारत भ्रमण कर रही हैं । अब तक उन्होंने ७-८ लाख किलोमीटर की यात्रा की है । भारतभ्रमण का उनका उद्देश्य अतिप्राचीन एवं अमूल्य हिन्दू संस्कृति पर शोध करना तथा उसका संरक्षण करना है । अब तक उन्होंने भारत के विभिन्न तीर्थस्थल, मठ, मंदिर, कलाक्षेत्र इत्यादि स्थानों पर कर हिन्दू संस्कृति एवं परंपराओं का चित्रीकरण करना, वहां के मान्यवरों के साथ भेंटवार्ताएं करना, उनके पास उपलब्ध अमूल्य धरोहर का दर्शन करना जैसी सेवाएं की हैं । चित्रीकरण एवं भेंटवार्ताओं के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर स्थित अमूल्य धरोहर का संरक्षण हो रहा है, साथ ही संग्रहित करने हेतु अमूल्य वस्तुएं मिल रही हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी में विद्यमान ‘प्रीति’ इस गुण के कारण ही यह संभव हो रहा है । वास्तव में देखा जाए, तो कोई ऐसे ही उन्हें ज्ञात जानकारी नहीं बताता अथवा उनके पास उपलब्ध धरोहर नहीं खोलता; परंतु श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली में विद्यमान ‘अपनेपन से बातें करना’, ‘निकटता बनाना’, ‘उन्हीं में से एक हो जाना’ इत्यादि गुणों के कारण समाज के संत, व्यक्ति, पुजारी आदि उनसे पहली ही भेंट में सभी जानकारी बताते हैं तथा चित्रीकरण करने की अनुमति देते हैं । केवल इतना ही नहीं, अपितु ऐसे व्यक्ति सनातन संस्था के साथ स्थायी रूप से जुड जाते हैं, साथ ही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी की साधना के कारण उनके विषय में समाज के उन व्यक्तियों को अच्छी अनुभूतियां भी होती हैं । ‘श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी कोई अलग हैं तथा दैवीय हैं’, यह उनकी समझ में आता है ।

कृतज्ञता

श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी में विद्यमान ‘प्रीति’, इस गुण के कारण उनका बना बडा लोकसंग्रह, उनके द्वारा किया जानेवाला सभी का विचार तथा वे व्यक्ति भी किस प्रकार श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी की प्रशंसा करते हैं तथा उनके पास जो कुछ है, वह अर्पण करते हैं; इसकी यहां संक्षेप में जानकारी दी है । लिखनेयोग्य इतना कुछ है कि लेखनी अधूरी पड जाए ! मैं यह लिख पाया; इसके लिए मैं श्री गुरुचरणों में कृतज्ञता व्यक्त करता हूं ।’

– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ (श्रीचित्शक्ति [श्रीमती] अंजली गाडगीळजी के पति), पीएच.डी., गोवा. (२५.११.२०२४)