भारतीय मजदूर संघ के कुछ नेताओं ने कर्मचारियों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, उन्हें कौन-सी सुविधाएं दी जानी चाहिए, उन्हें कितना वेतन तथा कितनी छुट्टियां देनी चाहिए; इसके नियम बतानेवाले ‘शुक्रनीति’ के कुछ श्लोक उद्धृत किए । ‘हमसे पहले श्रमिकों की चिंता करनेवाले इस त्रिभुवन में कोई नहीं था तथा हमारे बिना दूसरा कोई नहीं है’, यह दृढ (अंध) विश्वास रखनेवाले यह श्लोक सुनकर क्रोधित होकर विवाद करते हुए कहने लगे, ‘हमारे विचारों का अनुकरण करते हुए श्री.भा. वर्णकर जैसे संस्कृत पंडित से इन श्लोकों को नए सिरे से बनवाया है तथा ये लोग प्राचीनता के नाम पर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं ।’ साम्यवादी संप्रदाय इसी प्रकार से हठी एवं दुराग्रही होता है । दूसरों की कोई अच्छी बात सत्य भी हो, तब भी वे उसे सहन नहीं कर पाते । साम्यवादी राष्ट्र तो लोगों के विचारों को पूरी तरह बदलने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं तथा उसके लिए वे क्रूरता के भयानक स्तर पर भी उतर आते हैं ।
– प.पू. स्वामी वरदानंद भारती
(साभार : ‘हीच गुरुपूजा खरी’ पुस्तक से, लेखिका : वसुधा परांजपे)

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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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