साधको, ‘द्वेष करना’ इस स्वभावदोष के कारण होनेवाले दुष्परिणाम जानें तथा उसे दूर करने का प्रयास कर साधना का आनंद प्राप्त करें

‘द्वेष करना’, यह स्वभावदोष क्यों उत्पन्न होता है ? उसका प्रकटीकरण कैसे होता है ? तथा यह स्वभावदोष दूर करने हेतु क्या प्रयास करने चाहिए ?’, इसका ईश्वर ने मुझसे जो चिंतन करवाया, उसे आगे दिया है ।

श्री. अशोक लिमकर

१. द्वेष का दुष्परिणाम बतानेवाली कथा

एक बार एक अध्यापिका ने छात्रों को विद्यालय में प्लास्टिक की थैली में टमाटर लाने के लिए कहा । वे जिस व्यक्ति से द्वेष करते हैं, उन बच्चों को प्रत्येक टमाटर पर उनका नाम लिखकर लाना था । इस प्रकार वे जितने व्यक्तियों से द्वेष करते हैं, उतने ही टमाटर उन्हें लाने थे । निश्चित दिन पर सभी बच्चों ने नाम लिखे हुए टमाटर लाए । कुछ बच्चे २, कुछ बच्चे ३, कुछ बच्चे ५, जबकि कुछ बच्चे २० टमाटर लाए । अध्यापिका ने बच्चों से कहा, ‘अब अगले २ सप्ताह तक इन टमाटरों को आप जहां भी जाएंगे, वहां अपने साथ लेकर जाना ।’ जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, वैसे-वैसे बच्चे टमाटरों के सडने की तथा उनसे दुर्गंध आने की शिकायत करने लगे । जिन छात्रों के पास अधिक संख्या में टमाटर थे, उन्होंने शिकायत करते हुए कहा, ‘हमें टमाटरों का बोझ सहना पड रहा है, साथ ही उनसे बहुत दुर्गंध भी आ रही है ।’ एक सप्ताह उपरांत अध्यापिका ने छात्रों से पूछा, ‘इस सप्ताह आपको कैसे लगा ?’ उस पर बच्चों ने टमाटरों से आनेवाली दुर्गंध तथा उनके कारण होनेवाले बोझ की शिकायत की । विशेषकर जो अनेक टमाटर लाए थे, उन्होंने अधिक शिकायत की ।

अध्यापिका ने कहा, ‘बच्चो, तुम्हें जो लोग अच्छे नहीं लगते, उनके प्रति आप मन में द्वेष रखते हैं न ! उन पर यह बात अचूकता से लागू होती है । द्वेष के कारण अंतःकरण दूषित होता है । आप जहां जाते हैं, वहां साथ में द्वेष लेकर जाते हैं । यदि आप टमाटर की दुर्गंध एक सप्ताह भी नहीं सहन कर सकते, तो आप कल्पना कीजिए कि आप प्रतिदिन मन में जो कडवाहट रखते हैं, आपके अंतःकरण पर उसका कितना विपरीत परिणाम होता होगा ! हमारे दुःख का यही कारण है कि हम बुरी बातों को अपने मन में संग्रहित कर रखते हैं  । अंतःकरण एक सुंदर वाटिका है । उसकी नियमित देखभाल की आवश्यकता होती है । जिनके कारण आपको यह कष्ट हुआ है, उन्हें आप क्षमा कीजिए । उससे आपके अंतःकरण में नई एवं अच्छी बातें संग्रहित करने के लिए स्थान उपलब्ध होगा । कडवाहट नहीं, अपितु कुछ अच्छा अर्जित करने के लिए हम सभी अच्छे व्यक्तियों के साथ अच्छे विषयों के लिए एकत्रित होकर काम करेंगे ।’

२. द्वेष कैसे उत्पन्न होता है ?

अ. किसी ने प्रशंसा की, तो उससे मन को अच्छा लगता है तथा निंदा की, तो मन में द्वेष उत्पन्न होता है ।

आ. ‘द्वेष’ क्रोध का सहयोगी है अर्थात जहां क्रोध है, वहां द्वेष होता ही है । सुखप्राप्ति में आनेवाली बाधाओं के कारण क्रोध आता है । क्रोध के कारण व्यक्तियों एवं वस्तुओं के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है ।

इ. बिना किसी कारण, अनावश्यक तथा मन में अनुचित अपेक्षाएं होने से द्वेष उत्पन्न होता है ।

ई. किसी व्यक्ति के प्रति मन में ‘पूर्वाग्रह’ हो, तो उसकी सहायता के लिए उसका भाई द्वेष दौडा चला आता है ।

उ. किसी के प्रति मन में ईर्ष्या की भावना हो, तो उस ईर्ष्या का प्रकटीकरण द्वेष के रूप में होता है । मान लीजिए कि किसी व्यक्ति के पास ऐसी अनेक वस्तुएं हैं, जो दूसरे व्यक्ति के पास नहीं हैं । ऐसे में उस दूसरे व्यक्ति के मन में पहले व्यक्ति के प्रति द्वेषभाव उत्पन्न हो सकता है, उदा. दूसरे व्यक्ति में चल-अचल संपत्ति, सुदृढ शरीर, निर्मल मन, प्रेमभाव, खुला मन, परिश्रम करने की वृत्ति इत्यादि गुणों में से एक अथवा अधिक गुणों का अभाव है, तो उसके मन में पहले व्यक्ति के प्रति द्वेषभाव उत्पन्न हो सकता है ।

३. द्वेष का प्रकटीकरण कैसे होता है ?

किसी के आचरण तथा बातों से द्वेष का प्रकटीकरण होता है । ‘किसी के प्रति नकारात्मक विचार प्रकट करना, उसके गुणों एवं क्षमता के प्रति शंका प्रकट करना, सकारात्मक बातें करना टालना, अन्यों के सामने उसकी निंदा करना, उसके संबंध में अनुचित कृतियां करना’ इत्यादि से उस व्यक्ति के प्रति द्वेषभाव प्रकट हो सकता है ।

४. द्वेष के दुष्परिणाम

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं,

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।

तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।।

– श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ३४

अर्थ : प्रत्येक इंद्रिय के विषय में क्रोध एवं द्वेष छिपे होते हैं । मनुष्य को उन दोनों के भी अधीन नहीं होना चाहिए; क्योंकि वे दोनों भी उसके कल्याण के पथ में विघ्न उत्पन्न करनेवाले बडे शत्रु हैं ।

अ. द्वेष से अंतर्मन में अनुचित संस्कार बढते रहने से व्यक्ति दोषों के चंगुल में फंसता जाता है, जिससे उसकी साधना की हानि होती है ।

आ. द्वेष के कारण व्यक्ति का मन कलुषित होता है । उसके कारण उसके हाथों अन्यों के भी मन कलुषित होने का पाप होता है ।

इ. द्वेष के कारण अन्यों को भी साधना से परावृत्त करने का पाप होता है । किसी व्यक्ति में कोई अच्छा गुण देखकर दूसरा व्यक्ति उस गुण को स्वयं में लाने का प्रयास करने लगे, तो तीसरा व्यक्ति उस गुणी व्यक्ति के प्रति द्वेषभाव के कारण उसके अवगुणों के विषय में दूसरे व्यक्ति को बताने लगता है अर्थात दूसरे व्यक्ति के पास उस व्यक्ति की निंदा ही की जाती है । ऐसे में सामनेवाले व्यक्ति के मन में उस व्यक्ति के प्रति सम्मान अल्प हो जाता है । उसके कारण अपनी तथा अन्यों से होनेवाली साधना के अच्छे प्रयासों में बाधाएं उत्पन्न होती हैं । अतः दोनों ही पतन के मार्ग पर अग्रसर होते हैं ।

ई. द्वेष करनेवाले व्यक्ति के मन में अनेक भाव-भावनाओं तथा अनुचित विचारों का तूफान मचा होता है । ऐसे में ‘क्या उचित तथा क्या अनुचित ?’, इसका उसे भान छूट जाता है । अत: ऐसा व्यक्ति अन्यों के साथ अनुचित व्यवहार एवं अनुचित बातें करने लगता है । जिससे उसके परिजन तथा अन्य व्यक्तियों के मन में उस व्यक्ति के प्रति सम्मान, प्रेमभाव एवं अपनापन अल्प हो जाता है । उनके उस व्यक्ति के साथ संबंध बिगड जाते हैं तथा उनमें दूरी उत्पन्न होती है ।

उ. द्वेष करनेवाले व्यक्ति के मन में त्याग की भावना नष्ट हो जाती है, जिसके कारण उससे अन्यों का विचार नहीं होता ।

ऊ. द्वेष के कारण ‘सामनेवाले व्यक्ति में तथा स्वयं में भी भगवान का अंश है’, ऐसा व्यक्ति यह बात भूल जाता है । द्वेष करनेवाला व्यक्ति ‘मैं ईश्वर से ही द्वेष कर रहा हूं’, यह भूल जाता है तथा ईश्वर से दूर चला जाता है ।

ए. द्वेष के कारण व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों में वृद्धि होती है । उसे दूर करने हेतु मूल कारण को ढूंढे बिना उपाय करने से कष्टों का स्तर अल्प न होकर बढता ही जाता है ।

५ साधना से ‘द्वेष करना,’ यह स्वभावदोष अल्प होना

अ. ‘द्वेष करना,’ यह स्वभावदोष सभी में अल्पाधिक मात्रा में होता ही है । जैसे-जैसे साधना में प्रगति होकर उन्नत अवस्था अथवा संतपद प्राप्त होता है, वैसे-वैसे द्वेष का स्तर घटते-घटते अंततः शून्य हो जाता है । जिस मात्रा में आसक्ति अल्प होती जाती है, उस मात्रा में द्वेष भी अल्प होता जाता है ।

आ. ज्ञानी लोगों में आसक्ति न होने के कारण उनमें द्वेष नहीं होता ।

इ. जो इंद्रियों को जीत लेता है तथा इंद्रियों को अपने अधीन रखता है, वह सुख-दुःख के परे जा पहुंचा होता है । राग एवं द्वेष उसके आसपास भी नहीं फटकते ।

६. ‘द्वेष करना’ स्वभावदोष दूर करने हेतु आवश्यक प्रयास

अ. ‘द्वेष किस कारण उत्पन्न होता है ?’, इसे पहले ढूंढें, उदा. किसी प्रतियोगिता में हमें प्रथम स्थान न मिलकर दूसरा स्थान मिला । उस समय जिस खिलाडी को प्रथम स्थान मिला है, उसके प्रति मन में उत्पन्न होनेवाली द्वेषभावना दूर करने के लिए मन को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण देकर उस द्वेषभावना को मन से जड सहित उखाड फेंकें । ‘खेल में किसी की हार, तो किसी की जीत तो होती ही है’, इसे खुले मन से तथा हंसते-खेलते स्वीकार करना आना चाहिए । प्रथम स्थान प्राप्त करनेवाले खिलाडी का अभिनंदन कर हमने विशाल हृदय का परिचय दिया, तो द्वेष का विचार हमारे मन में नहीं आएगा । अब यहां ‘मुझे प्रथम स्थान नहीं मिला’, इसे स्वीकार करना तथा ‘मैं अगली प्रतियोगिता में अच्छे प्रयास कर प्रथम स्थान प्राप्त करूंगा’, ऐसा सकारात्मक विचार कर मन को समझाने का प्रयास किया, तो उससे मन में द्वेषभावना का कोई स्थान नहीं रह जाएगा ।

आ. ‘द्वेष करना’ स्वभावदोष दूर किए बिना मेरी साधना ईश्वरप्राप्ति की दिशा में आगे नहीं बढेगी । द्वेष के कारण मेरा जीवन दूषित होनेवाला है । ‘क्या उचित है तथा क्या अनुचित ?’, इसके विषय में मेरे मन में भ्रम उत्पन्न होकर मुझसे अनुचित आचरण तथा बातें होंगी । उसके परिणामस्वरूप मुझे शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्ट का सामना करना पडेगा’, मन को इसका भान कराएं । उस प्रकार स्वसूचना बनाकर सत्र करें ।

इ. व्यक्ति निरंतर सत्संग में रहे ।

७. ‘द्वेष करना,’ यह स्वभावदोष दूर होने के लाभ

अ. मन से द्वेष का विचार दूर होने पर उचित आचरण व बातें होती हैं ।

आ. मन हल्का होकर आनंद अनुभव होता है ।

इ. मन से द्वेष का विचार दूर करने पर अन्य दोषों से संबंधित विचारों को भी मन में प्रवेश करने का अवसर नहीं मिलता । इससे मन निर्मल बना रहता है तथा ‘निर्मल मन में ही भगवान का वास होता है’, यह विचार बढता है और भगवान से आंतरिक सान्निध्य में वृद्धि होती है ।

ई. स्वयं से पापाचरण नहीं होते । उचित कृति होकर संचित के अनुसार जो प्रारब्ध प्राप्त हुआ है, उसे भोगकर वह जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है ।

उ. ‘मुझमें एवं अन्यों में भगवान का वास है तथा भगवान सभी को साधना के प्रयासों में सहायता कर आगे-आगे ले जाने के लिए मुझे क्रियाशील बना रहे हैं’, इसका अनुभव होता है ।

ऊ. प्रेमभाव एवं अन्य गुणों में वृद्धि होकर परिवार में आनंदमय वातावरण उत्पन्न होता है । एक-दूसरे के प्रति अपनापन, सम्मान एवं त्याग की भावना बढती है । अन्यों का विचार करने की वृत्ति बढती है ।

८. कृतज्ञता एवं प्रार्थना

‘ईश्वर ने मुझसे यह चिंतन करवा लिया, मुझे विविध सूत्र सुझाए तथा उन्हें मुझसे लिखवा लिया’, इसके लिए मैं ईश्वर के चरणों में अनंत कोटि कृतज्ञता व्यक्त करता हूं ।

‘सभी साधक स्वयं में व्याप्त ‘द्वेष’, इस स्वभावदोष का निर्मूलन कर उसके स्थान पर ‘निरपेक्ष प्रेम, त्याग एवं सभी में ईश्वर को देखने की वृत्ति’, ये गुण अपनाएं’, प.पू. गुरुदेवजी के चरणों में यही प्रार्थना है तथा यह सब लेखन मैं उन्हीं के चरणों में समर्पित करता हूं ।’

– श्री. अशोक लिमकर (आयु ७३ वर्ष), सनातन आश्रम, पनवेल