
‘मेरे कक्ष के पूजाघर में पहले मेरे गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी के छायाचित्र में उनके मुखमंडल के आस-पास प्रभामंडल दिखाई देने लगा । अब कालांतर में पूजाघर में रखे अन्य देवताओं के चित्रों में प्रभामंडल बढ रहा है, ऐसा ध्यान में आया । इससे यह स्पष्ट हुआ कि हमने साधना की, तो गुरुतत्त्व प्रसन्न होता ही है, साथ ही अन्य देवताओं के आशीर्वाद भी अपनेआप प्राप्त होते हैं । संक्षेप में कहा जाए, तो संत रहीम के ‘एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय ।’ इस दोहे की प्रतीति होती है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा अनुभव किया गया श्री गुरु का महत्त्व !

‘प.पू. भक्तराज महाराजजी के कारण उनके जीवनकाल में ही मेरी व्यष्टि साधना की नींव पक्की हुई । उसके कारण आगे जाकर मेरे लिए समष्टि साधना करना संभव हुआ ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
सच्चे गुरु शिष्य से साधना की प्रत्यक्ष कृति करवा लेते हैं !

‘यह करो, वह मत करो’, ऐसा बोलनेवाले अनेक लोग होते हैं; परंतु वे कितने लोगों से उस प्रकार कृति करवाते हैं ?; इसके विपरीत, सच्चे गुरु शिष्य से ‘तन, मन एवं धन का त्याग करना सिखानेवाली कृति’ करवा लेते हैं ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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