नवरात्रोत्सव के उपलक्ष्य में …


‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।
अर्थ : जो कुंदपुष्प, चंद्रमा, हिमतुषार अथवा मोतियों के हार की भांति गौरवर्णी हैं, जिन्होंने शुभ्रवस्त्र धारण किया है, जिनके हाथ उत्तम वीणा से शोभायमान हैं, जो श्वेत कमलों के आसन पर विराजमान हैं; ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि देवता जिनका निरंतर स्तुतिगान करते हैं, जो सभी प्रकार की जडता (अज्ञान) दूर करती हैं, ऐसी श्री सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें ।
इस ध्यान श्लोक में देवी सरस्वती के सगुण रूप का वर्णन किया है । वेदकालीन ऋषियों को ‘सरस्वती’ ज्ञात थीं; परंतु वे ‘देवी’ के रूप में नहीं, अपितु एक पवित्र नदी के रूप में ! वेदकाल में वर्तमान समय की देवी सरस्वती के सगुण रूप का अस्तित्व नहीं था ।
१. आर्यों की संस्कृति की प्रतीक सरस्वती नदी !
सरस्वती नदी के तट पर ही वेद की अनेक ऋचाओं का जन्म हुआ । वहीं आर्यों के छोटे-बडे यज्ञ निर्विघ्न संपन्न होने लगे । वेद एवं यज्ञ के सहचर से सरस्वती नदी आर्यों के लिए पूजनीय बन गईं । आर्यों की संस्कृति में जो कुछ तेजोमय एवं सौंदर्यमय था, उसके प्रतीक के रूप में सरस्वती नदी सिद्ध हुई ।
सरस्वती नदी का उद्गम मेरू पर्वत पर हुआ था । आगे जाकर वह ‘ब्रह्मावर्त’ एवं ‘आर्यावर्त’, इन प्रदेशों से बहते हुए प्रयाग के पास (उत्तर प्रदेश) जहां गंगा-यमुना का संगम होता है, वहां जाकर वह गंगाजी में मिल गई थी । ‘निरंतर आगे बढते रहिए…. आगे बढते रहिए…. तथा स्वयं के लिए नहीं, अपितु दूसरों के लिए जीएं’ मानो वह यही संदेश आर्यों को दे रही थी !
‘कालांतर में सृष्टि के क्रियाकलापों में यह नदी विलुप्त हो गई; परंतु हिन्दुओं की आज भी यह मान्यता है कि वह प्रयाग के पास गुप्तरूप से गंगा में मिलती है; इसलिए वहां वास्तव में भले ही गंगा-यमुना, इन दो नदियों का संगम दिखाई देता हो, तब भी उसे ‘त्रिवेणी संगम’ ही कहा जाता है ।
२. ‘ब्रह्मावर्त’ प्रदेश एवं आर्यों के पवित्र ग्रंथ
सरस्वती एवं दृशद्वती, इन २ नदियों के मध्य के प्रदेश को ‘ब्रह्मावर्त’ नाम था । इस उपजाऊ प्रदेश में आर्य बस गए । वे अपने गाय-पशु लेकर जहां चारा मिलता था, वहां जाते थे । यह आर्याें की जीवनपद्धति थी । ब्रह्मवर्त में आर्य कुछ समय तक बसकर खेती करने लगे, साथ ही यज्ञ करने लगे । इससे आर्य संस्कृति विकसित होने लगी ।
उस समय आर्यों के समाज में वेद एवं यज्ञ, इन दो बातों को प्रधानता थी । यज्ञ मात्र धार्मिक आचार नहीं था; अपितु वह एक बडी सामाजिक एवं सांस्कृतिक घटना थी । भारतीय सिद्धांतों का उद्गम वेदों में मिलता है । वेदों में भारतीय ऋषियों की केवल कल्पना ही नहीं; अपितु उनके आत्मानुभव तथा उनके आध्यात्मिक ज्ञान का भी समावेश है । वेदों को ईश्वर के निःश्वसित माना गया; उसके कारण वेद अपौरुषेय सिद्ध हुए । वेद ही आर्यों के पवित्र धर्मग्रंथ थे ।
३. आर्यों की प्रतिज्ञा
एक ही स्थान पर बने रहना आर्यों का स्वभाव नहीं था । ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।’ (ऋग्वेद, मण्डल ९, सूक्त ६३, ऋचा ५.
अर्थ : हम समस्त विश्व को आर्य [सुसंस्कृत] बनाएंगे), यह उनकी प्रतिज्ञा थी; इसलिए वे स्थायी रूप से ब्रह्मवर्त में नहीं रहे । गंगा-यमुना के प्रदेश को ‘आर्यावर्त’ कहा जाता था । आर्य ब्रह्मावर्त से आर्यावर्त चले गए तथा कालांतर में उन्होंने संपूर्ण आर्यावर्त को समा लिया ।
नई बस्तियां बसाते समय आर्यों को असुरों के द्वारा, अर्थात अनार्यों से तीव्र विरोध का सामना करना पडा । इससे आर्य एवं अनार्यों के मध्य युद्ध हुए । कुछ अनार्य समुदाय सुधारित थे । उसके कारण उनका प्रतिकार भी तीव्र होता था । वेदों में ऐसे अनेक युद्धों के वर्णन आए हैं ।
आर्यों की अगली पीढियां सरस्वती नदी से दूर चली गईं, इतना ही नहीं; सरस्वती नदी गुप्त हो गई, तब भी आर्यों के मन से सरस्वती नदी के प्रति का पूज्यभाव लेशमात्र भी अल्प नहीं हुआ था ।
४. आर्यों के देवता
‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।’ (ईशावास्योपनिषद्, मंत्र १) अर्थात ‘इस जगत के प्रत्येक अणु-रेणु में ईश्वर का अस्तित्व है ।’ ‘विश्व में जो कुछ जीवन है, उसे ईश्वर ने बसाया है तथा वे सर्वशक्तिमान हैं । वे ही विश्व के निर्माता, पालनकर्ता एवं विध्वंसक भी हैं ।’ यह विचार वैदिक ऋषियों के लिए अपरिचित नहीं था । आज भी इस विचार से हम पूर्ण परिचित हैं । तभी हम अनेक देवताओं को मानते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं ।
वेदकाल में अग्नि, वरुण, रुद्र, वायु एवं आदित्य, ये आर्यों के देवता थे । वास्तव में देखा जाए, तो प्रकृति में ये जो विभिन्न शक्तियां हैं, उन्हीं को आर्यों ने देवता का रूप माना था । इस विचार के अनुसार ही आगे जाकर प्रकृति में स्थित गंगा-सरस्वती-यमुना इत्यादि नदियों को भव्य एवं विशाल वास्तुओं को देवता का रूप मिला । इसमें भी सरस्वती नदी की महिमा तो विशेष ही थी । पौराणिक काल में नदी सरस्वती तो देवी सरस्वती बन गईं ।
५. सरस्वतीदेवी तथा उनके वाहन हंस के विषय में अलौकिक जानकारी
‘शारदा’, ‘वाक्’, ‘वाणी’, ‘भारती’ जैसे नाम सरस्वतीदेवी के अन्य नाम हैं । इन नामों के आधार पर देखा जाए, तो देवी सरस्वती साहित्य से संबंधित हैं, ऐसा दिखाई देता है । सरस्वतीदेवी कला, साहित्य, ज्ञान एवं पवित्रता की देवता हैं । ‘हंस’ को सरस्वतीदेवी का वाहन माना गया है । ‘हंस’ शब्द के कुछ दूसरे भी अर्थ हैं । ‘हंस’ अर्थात प्राण एवं आत्मा ! योगशास्त्र में ‘हंस’ शब्द का प्रयोजन ‘प्राण एवं आत्मा’, इन दोनों अर्थों से प्रयोग किया है । ‘हंस’ शब्द का एक और अर्थ है ‘शुद्ध ज्ञान !’ अतः ‘शुद्ध ज्ञान’रूपी हंस पक्षी विद्या की देवी का वाहन बना, जो उचित ही है ।
६. सरस्वतीदेवी के सगुण रूप का ध्यानमंत्र
एक संस्कृत स्तोत्र में देवी सरस्वती के सगुण रूप का ध्यान कुछ इस प्रकार वर्णित है –
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतपुष्पोपशोभिता ।
श्वेताम्बरधरा नित्या श्वेतगन्धानुलेपना ।।
अर्थ : श्वेत पद्मासन पर विराजमान देवी सरस्वती श्वेत पुष्पों से सुशोभित दिखाई दे रही हैं, उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं तथा श्वेत चंदन का लेपन किया है ।
श्वेताक्षी सूत्रहस्ता च श्वेतचन्दनचर्चिता ।
श्वेतवीणाधरा शुभ्रा श्वेतालङ्कारभूषिता ।।
अर्थ : देवी सरस्वती के हाथ में श्वेत रुद्राक्षों की माला है, वे श्वेत चंदन से लिप्त हैं, उन्होंने श्वेत वीणा धारण की है, साथ ही वे श्वेत आभूषणों से सुशोभित हैं ।
७. सरस्वतीदेवी के वर्णन में शुभ्रता को प्रधानता क्यों है ?
देवी सरस्वती के वर्णन में ‘शुभ्र’ अथवा ‘श्वेत’, इस रंग को प्रधानता क्यों दी गई है ? ज्ञान अथवा प्रकाश का रंग श्वेत माना जाता है, इसके विपरीत अज्ञान को काला अंधकार कहा गया है । सरस्वतीदेवी विद्या एवं ज्ञान की देवता हैं । तो उनके सगुणरूप के वर्णन में शुभ्रता को प्रधानता मिलना तर्क संगत ही है । वे ‘वीणाधरा’ हैं । इससे यही सूचित होता है कि वे संगीतादि कलाओं की अधिष्ठात्री देवता हैं । एक श्लोक में तो वे ‘वीणा-पुस्तक-धारिणी’ हैं, ऐसा वर्णन है । उनके हाथ में पुस्तक है । इस संकेत का अर्थ खुलकर बताने की क्या आवश्यकता है भला ?
‘माघ शुक्ल पंचमी’ अथवा ‘वसंत पंचमी’ को देवी सरस्वती के उत्सव का दिन माना जाता है । इस दिन आसेतुहिमाचल अखिल भारत में अनेक स्थानों पर देवी सरस्वती का उत्सव होता है ।’
– रा.ग. कुंभोजकर
(साभार : मासिक ‘ज्ञानदूत’, दीपावली अंक १९७९)
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