
१. श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी के भूमिपूजन करते समय पक्षियों द्वारा उनकी परिक्रमा करना :
दूसरे दिन श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी जळगांव सेवाकेंद्र के लिए ली गई भूमि देखने नांद्रा गांव में गई थीं । वहां उन्होंने भूमिपूजन किया । उस समय कुछ पक्षी उनके पास आ रहे थे एवं उनकी परिक्रमा कर रहे थे ।

२. श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी द्वारा खेत में गेहूं के पौधों को स्पर्श करने पर पौधों का उनकी ओर झुक जाना :
भूमिपूजन करने के उपरांत श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी भूमि देखने खेत में गईं । उस समय खेत में गेहूं एवं जवार की फसल थी । भूमि देखते समय वे गेहूं की फसल को हाथ लगा रही थीं । उस समय गेहूं के पौधे उनकी ओर झुक गए । तब श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी का यह भाव था, ‘यह भूमि सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी की है; इसलिए यहां उगी फसल साधक ही हैं ।’ उन्हें उस फसल के प्रति प्रीति अनुभव हो रही थी ।
३. श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी के दाहिने पैर की चप्पल का तल (सोल) अलग होकर भूमि में फंस जाने से वहां चिन्ह अंकित होना, जिसे महर्षियों द्वारा शुभचिन्ह बताया जाना :
श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी जब खेत में घूम रही थीं, उस समय उनके दाहिने पैर की चप्पल का तल (सोल) अलग होकर खेत की मिट्टी में गिर गया । सामान्यतः चप्पल टूटने पर उसका कुछ भाग टूटता है; परंतु इसमें श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी की चप्पल का पूरा तल ही बाहर निकल आया तथा भूमि में जहां फंसा, वहां चिन्ह अंकित हो गया । उस समय ‘मानो श्री लक्ष्मीदेवी ने वहां अपना पदचिन्ह छोड रखा है’, ऐसा मुझे लगा । उनकी वह चप्पल हमने संग्रहित कर रखी है । महर्षियों को यह प्रसंग बताने पर उन्होंने नाडीपट्टिका के माध्यम से बताया, ‘यह शुभचिन्ह है ।’ साधकों को लगा, ‘जळगांव सेवाकेंद्र की भूमि पर साक्षात श्री महालक्ष्मीदेवी ने आशीर्वाद के रूप में उनका पदचिन्ह अंकित किया है ।’ इससे वहां सदैव देवी का वास होगा’, ऐसा मुझे लगता है ।
४. श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी द्वारा सूरजमुखी के उद्यान का अवलोकन करते समय वहां केवल एक ही फूल सीधा खडा दिखना तथा उस फूल को सेवाकेंद्र लाने पर ४ दिनों तक उसका ताजा रहना :
दोपहर १ बजे श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी सेवाकेंद्र की भूमि का अवलोकन कर वापस जा रही थीं, उस समय उन्हें खेत में सूरजमुखी की फसल दिखाई दी । उसे देखने के लिए हम वहां रुके । उस समय सभी फूल नीचे झुके हुए थे; परंतु एक ही फूल सडक की ओर मुख कर सीधा खडा था । उसे देखते ही श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) सिंगबाळजी उसके पास गईं । हमने उस फूल के साथ उनके छायाचित्र खींचे । उसके उपरांत हम उस फूल को लेकर आश्रम आ गए । वास्तव में देखा जाए, तो सूरजमुखी का फूल पेड से अलग करने के उपरांत कुछ ही देर में मुरझा जाता है; परंतु वह फूल ४ दिनों तक ताजा रहा । उस फूल की ओर देखते ही साधकों की भावजागृति हो रही थी । मुझे ऐसा लगा कि उस फूल का जीवन सार्थक हो गया है ।
– श्रीमती क्षिप्रा प्रशांत जुवेकर (आध्यात्मिक स्तर ६४ प्रतिशत, आयु ३९ वर्ष) जळगांव, महाराष्ट्र. (४.८.२०२३)
| इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । – संपादक |
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