सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार

मनोविकारों का मूल कारण है स्वेच्छा !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

‘अपनी इच्छा के अनुसार न हो, तो मानसिक तनाव बढता है और आगे अनेक मनोविकार होते हैं । आजकल के मनोविकार विशेषज्ञ इस हेतु विविध उपाय सुझाते हैं; परंतु कोई भी यह नहीं सिखाता कि स्वेच्छा नहीं रखनी चाहिए । इस कारण पूरे विश्व में ऐसे रोगियों की संख्या बढती जा रही है । सर्वस्व का त्याग करनेवाले ऋषि-मुनियों और संतों को कभी भी मनोविकार नहीं हुआ । इसके विपरीत वे सदैव सच्चिदानंद अवस्था में रहते थे ।’


भारत के सात्त्विक लोगों के अनुचित दृष्टिकोण के कारण ही रज तम-प्रधान विदेशी भारत पर सैकडों वर्ष राज्य कर पाए !

‘संकट आने पर भी सात्त्विक लोग कभी-कभी क्रियमाण का उपयोग न कर, ईश्वर पर आधी-अधूरी श्रद्धा के आधार पर ‘जो होगा, अच्छा होगा’ इस अनुचित दृष्टिकोण से आनेवाले संकट की ओर देखते हैं । इस कारण संकट का सामना करने की उनकी तैयारी नहीं होती । परिणामस्वरूप संकट के समय वे पराजित हो जाते हैं और रज तम-प्रधान लोग जीत जाते हैं । विदेशी भारत पर आक्रमण कर यहां सैकडों वर्ष राज्य कर पाए, इसका मुख्य कारण यही है ।’


अध्यात्म का अध्ययन करने की अपेक्षा साधना करें !

‘अध्यात्मशास्त्र अनंत का शास्त्र है । अनंत ग्रंथों में इसे अनंत प्रकार से प्रस्तुत किया गया है । इस कारण बुद्धि से उसका अध्ययन करने की अपेक्षा साधना करें और स्वयं अनंत की (परमेश्वर की) अनुभूति लें ।


भ्रष्टाचार नष्ट करने का एकमात्र उपाय !

‘धर्म त्याग सिखाता है; जबकि राजनीति स्वार्थ सिखाती है । इसलिए भ्रष्टाचार इत्यादि बढते जा रहे हैं । इसका एक ही उपाय है और वह है, सभी को सर्वस्व का त्याग सिखानेवाली साधना सिखाना !’

– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले