‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘समाजवाद’ शब्द हटाएं !

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री. दत्तात्रय होसबाळे

धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवाद, ये ऊपर से अच्छे, सीधे तथा निर्मल शब्द लगते हैं; परंतु इन्हीं दो शब्दों ने भारतीय समाज, संस्कृति एवं सभ्यता पर आघात किया है, इसका विगत ५० वर्षाें में भारतीयों ने अनुभव किया है । इन शब्दों की आड में ही इस देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज पर एक के पश्चात एक प्रहार तथा अन्याय के पश्चात अन्याय किया गया है । इन दो शब्दों के कारण ही भारतीय जीवनव्यवस्था की आत्मा ही कहीं खो गई है, ऐसा परिदृश्य दिखाई देता है । इन दो शब्दों का पुनः नए सिरे से स्मरण होने का कारण है, कुछ ही दिन पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री. दत्तात्रय होसबाळे की भारत के संविधान से ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ इन शब्दों को हटाने की मांग ! अनेक राष्ट्रप्रेमियों तथा धर्मप्रेमियों ने भले ही इससे पूर्व यह मांग की है, तब भी अब संघ द्वारा यह मांग की जाने से उसका महत्त्व बढ गया है । संघ के द्वारा यह मांग किए जाने के कारण सभी का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ है । इसीलिए केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने वाराणसी में बात करते हुए यह मांग दोहराई है । आपातकाल की अवधि में संविधान में किए गए संशोधनों को निरस्त करने की आवश्यकता उन्होंने रेखांकित की है । एक केंद्रीय मंत्री द्वारा यह मांग करने के कारण अर्थात एक प्रकार से यह सरकार का ही विचार होने के कारण ‘इस मांग पर तुरंत कार्यवाही हो’, यह भारतीय जनमानस की अपेक्षा है । सरकार को यह साहस दिखाकर संविधान में केवल यही संशोधन नहीं, अपितु अनेक राष्ट्रविरोधी प्रायः विशेषकर हिन्दूविरोधी संशोधन निरस्त करने चाहिए, यह जनता की भावना है ।

वर्तमान वर्ष आपातकाल लागू होने के उपरांत का ५०वां वर्ष है । केंद्र सरकार ने २५ जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है । ५० वर्ष पूर्व अर्थात २५ जून १९७५ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित करते हुए छोटासा भाषण दिया । उसमें ‘मेरे द्वारा जनहित में लिए गए निर्णयों के विरुद्ध बडा तथा व्यापक षड्यंत्र रचा जा रहा है; इसलिए राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है’, यह बताते हुए देश पर आपातकाल थोप दिया । वर्ष १९७५ से १९७७ तक का दो वर्षाें का यह काल आपातकाल का था । इसमें विरोधी दल के अर्थात कांग्रेसविरोधी अनेक राजनीतिक दलों को बंदी बनाना तथा बिना किसी पूछताछ के उन्हें कारागृह में डाल देना, कारागृह में राष्ट्रप्रेमियों का बडे स्तर पर उत्पीडन करना आदि दुष्कृत्य किए गए । इस कार्यवाही में अनेक लोगों की मृत्यु भी हुई । संघ जैसे संगठन के पदाधिकारियों को भी कारागृह में डाल दिया गया । इन दो वर्षाें की अवधि में इंदिरा गांधी ने मनमानी कर सत्ता चलाई तथा अनेक लोगों के अधिकारों का हनन कर तानाशाही थोप दी । इसी अवधि में उन्होंने एक और गंभीर अपराध यह किया कि उन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ एवं ‘समाजवाद’, ये दो शब्द घुसाकर भारत को अनेक वर्ष पीछे ले गए ।

संविधान में किया गया यह संशोधन संपूर्णतया असंवैधानिक !

३ दिसंबर १९४६ एवं २२ जनवरी १९४७ में संविधान की प्रस्तावना के संदर्भ में चर्चा हुई थी, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था । १५ नवंबर १९४८ तथा ३ दिसंबर १९४८ इस प्रकार दो बार प्रा. के.टी. शाह ने संविधान सभा में मूल प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘सांघिक’, ये तीन शब्द अंतर्भूत करने का आवाहन किया । दोनों बार ‘संविधान सभा’ ने सर्वसम्मति से इसे खारिज किया । ६ दिसंबर १९४८ को पुनः उक्त सूत्र पर चर्चा हुई । उसमें सभा में उपस्थित पंडित लोकनाथ मिश्रा ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना भारत की नहीं है, अपितु वह विदेश की है । हमने यह शब्द यदि संविधान में अंतर्भूत किया, तो उससे भारतीय संस्कृति रसातल में पहुंचेगी । उसके कारण अंततः इन शब्दों के बिना ही भारतीय संविधान तैयार हुआ । मार्च १९७६ में लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर इंदिरा गांधी ने लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष से बढाया । आगे जाकर दिसंबर १९७६ में उन्होंने संविधान में ४२वां संशोधन कर संविधान के मूल ढांचे में ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘समाजवाद’, ये दो शब्द घुसा दिए । सर्वाेच्च न्यायालय के प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि तकनीकी दृष्टि से पूर्णरूप से प्रधानमंत्री न होते हुए भी, साथ ही ‘संविधान सभा’ अस्तित्व में न होते हुए भी, लोकसभा उचित प्रकार से कार्यान्वित न होते हुए संविधान में किया गया यह संशोधन संपूर्णतया असंवैधानिक है, अर्थात ही वह अनुचित है । विगत ४ दशकों से हमने इस चूक में सुधार नहीं किया है, यह भी एक बडी चूक है ।

हिन्दुओं के साथ अन्याय !

संविधान के ‘अनुच्छेद २८’ में कहा गया है कि सरकार अथवा सरकार के द्वारा अनुदानित किसी भी शिक्षा संस्थान में किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकेगी । यदि इस प्रकार से कोई भी शिक्षासंस्थान धर्म की शिक्षा दे रही है, तो उसकी शैक्षणिक अनुमति निरस्त की जाएगी । इसीलिए विद्यालयों-महाविद्यालयों से गीता, रामायण, महाभारत इत्यादि पढाया नहीं जा सकता । जब हम ‘अनुच्छेद ३०’ पढते हैं, उस समय ‘अनुच्छेद २८’ केवल बहुसंख्य हिन्दुओं पर लागू है, यह ध्यान में आता है । ‘अनुच्छेद ३०’ में कहा गया है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को विद्यालय खोलने का, उनके संचालन का तथा उनमें उनकी ‘मजहबी’ शिक्षा देने का अधिकार है, साथ ही आवश्यकता के अनुसार सरकार इन शिक्षासंस्थानों को अनुदान देगी । इसका अर्थ वह मदरसा हो सकता है, जिसमें कुरान एवं हदीस की शिक्षा दी जा सकती है । चर्च के ‘कॉन्वेंट’ विद्यालय हो सकते हैं, जिनमें बाइबल पढाया जा सकता है । यही वह ‘सेक्युलर’ अर्थात धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था है । ‘सेक्युलरिजम’ के नाम पर ‘सच्चर आयोग’, ‘अल्पसंख्यक आयोग’, साथ ही ‘वक्फ एक्ट’ तथा ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ जैसे हिन्दूविरोधी कानून बनाए गए । अर्थात ही संविधान के शिल्पकार भारतरत्न डॉ. आंबेडकर भी यह नहीं चाहते थे कि ऐसा हो, उन्हें आपातकाल की अवधि में संविधान में अंतर्भूत किया गया । यह एक प्रकार से डॉ. आंबेडकर का भी अनादर है । प्रकाश आंबेडकर आदि आंबेडकर विचारधारा के लोग इसके विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाते ? जिस कांग्रेस के वर्तमान नेता राहुल गांधी ‘आपातकाल चूक थी’, ऐसा बोलते हैं, तो वे इस चूक को सुधारने के लिए कुछ करते नहीं क्यों ? इससे इंदिरा गांधीसहित कांग्रेस के नेताओं को हिन्दुओं का दमन करना था तथा अल्पसंख्यकों को विशेषकर मुसलमानों का तुष्टीकरण करना था, यह स्पष्टता से दिखाई देता है । स्वतंत्रता के उपरांत ७७ वर्ष तक कांग्रेस उसे करती ही आई है । इसलिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ एवं ‘समाजवाद’, इन शब्दों को भारतीय संविधान से हटाने के लिए और किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं है, केवल इच्छाशक्ति दिखाकर इन शब्दों को हटाकर संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता है । केंद्र सरकार संविधान को अनुचित संशोधनों से मुक्त करे तथा संविधान में ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द अंतर्भूत कर बहुसंख्यक हिन्दूबहुल भारतीयों को आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार प्रदान करे, यही अपेक्षा !

हिन्दू संस्कृति पर आघात करनेवाले ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘समाजवाद’, इन शब्दों को संविधान से हटाने में ही राष्ट्रहित समाया हुआ है !