‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (गुरुदेवजी) के कक्ष में लकडी का पूजाघर है । गुरुदेवजी ने उनके पूजाघर में स्थित देवताओं की अनेक वर्षाें तक भक्तिभाव से पूजा की । अब बढती आयु के कारण तथा प्राणशक्ति अल्प होने से देवतापूजन करना उन्हें संभव नहीं होता । इसलिए सनातन के साधक उनके पूजाघर में स्थित देवताओं का पूजन करते हैं । वर्ष २०१४ से गुरुदेवजी के कक्ष में स्थित पूजाघर के विभिन्न अवसरों पर छायाचित्र खींचे गए । ‘लोलक’ के उपकरण से इन छायाचित्रों का परीक्षण किया गया । इस ‘लोलक’ उपकरण से वस्तु, वास्तु एवं व्यक्ति में विद्यमान नकारात्मक एवं सकारात्मक ऊर्जा की गणना की जाती है । यह विशेषतापूर्ण शोध आगे दिया गया है

१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पूजाघर में रखे छायाचित्रों में उत्तरोत्तर अधिकाधिक स्तर पर सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होना

पूजाघर के किसी भी छायाचित्र में नकारात्मक ऊर्जा नहीं दिखाई दी । इन सभी छायाचित्रों में सकारात्मक ऊर्जा है । वर्ष २०१४ के छायाचित्रों में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल ४ मीटर था । वर्ष २०२० में वह ९३ मीटर था । जुलाई २०२१ में पूजाघर के चित्रों तथा मूर्तियों की रचना में परिवर्तन किया गया । उसके उपरांत पूजाघर की सकारात्मक ऊर्जा ९७५ मीटर थी । फरवरी २०२२ में इस पूजाघर में सनातन-निर्मित देवताओं के सात्त्विक चित्र भी रखे गए । उसके २ वर्ष उपरांत पूजाघर की सकारात्मक ऊर्जा में बडे स्तर पर वृद्धि होकर वह ९७०० मीटर हुई । इससे ध्यान में आता है कि ‘गुरुदेवजी के पूजाघर से कितने बडे स्तर पर सकारात्मक ऊर्जा प्रक्षेपित हो रही है ।’ इन वर्षाें में पूजाघर के छायाचित्रों की सकारात्मक ऊर्जा की प्रविष्टियां आगे दी गई हैं ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पूजाघर में देवताओं की वर्ष २०२० में की गई रचना

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पूजाघर में देवताओं की वर्ष २०२१ में की गई रचना

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पूजाघर में देवताओं की वर्ष २०२२ में की गई रचना

टिप्पणी १ – जुलाई २०२१ में पूजाघरों के चित्रों एवं मूर्तियों की रचना में परिवर्तन किया गया ।
टिप्पणी २ – जनवरी २०२२ में महर्षि की आज्ञा से पूजाघर में गरुडजी की लकडी की मूर्ति लगाई गई ।
टिप्पणी ३ – फरवरी २०२२ में पूजाघर में सनातन-निर्मित देवताओं के सात्त्विक चित्र भी रखे गए ।
१ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के पूजाघर के छायाचित्रों से उत्तरोत्तर अधिकाधिक सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होने का कारण : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का (ईश्वरीय राज्य की स्थापना का) महान कार्य कर रहे हैं । महर्षियों ने तथा कुछ संतों ने सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को देवताओं की कुछ मूर्तियां दी हैं । गुरुदेवजी ने उन मूर्तियों को अत्यंत भक्तिभाव से अपने पूजाघर में रखा है । वे प्रतिदिन पूजाघर में स्थित देवताओं से भक्तिपूर्ण प्रार्थना करते हैं । उनकी अनन्य भक्ति से देवता प्रसन्न होते हैं । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के महान कार्य में देवता गुरुदेवजी की सहायता करते हैं । इस कार्य के लिए कालानुरूप देवताओं के तत्त्व (अर्थात संबंधित देवता में विद्यमान शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद एवं शांति के स्पंदन) जितनी मात्रा में कार्यरत होते हैं, उसके अनुसार देवताओं की मूर्तियों में अथवा चित्रों में वे प्रतिबिंबित होते हैं । गुरुदेवजी की अनन्य भक्ति के कारण उनके पूजाघर में स्थित प्रत्येक मूर्ति एवं चित्र में विद्यमान बडे स्तर में वृद्धि होकर बडे स्तर पर चैतन्य प्रक्षेपित हो रहा है तथा उसका स्तर प्रतिदिन बढ ही रहा है । गुरुदेवजी का चैतन्यमय पूजाघर मानो समस्त सृष्टि को चैतन्य प्रदान करता है ।
१ आ. पूजाघर के देवताओं की रचना सात्त्विक करने से, पूजाघर से अधिक मात्रा में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होना : पृष्ठ ८ पर दिए गए पूजाघर के छायाचित्र क्र. १ एवं छायाचित्र क्र.२, इन देवताओं की रचना अधिक सात्त्विक है । उन छायाचित्रों में सभी देवताओं के मुखमंडल दर्शनार्थियों के सामने हैं । पूजाघर में स्थित उन छायाचित्रों की ओर देखकर हमें भी और अच्छा एवं हल्का प्रतीत होता है । यही बात पूजाघर के सकारात्मक ऊर्जा के प्रभामंडल से ध्यान में आता है । पूजाघर के ‘छायाचित्र क्र. १’ का सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल ९३ मीटर
था । उन देवताओं की सात्त्विक रचना करने से ‘छायाचित्र क्र. २’ में वह १०० गुना बढकर ९७५ मीटर हुआ है, ऐसा दिखाई दिया ।
१ इ. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के समष्टि कार्य हेतु सभी उच्च देवताओं के आशीर्वाद प्राप्त हों, इसलिए उन देवताओं के चित्र पूजाघर में रखने पर पूजाघर से अधिक मात्रा में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होना : सनातन ने उच्च देवताओं के (श्री गणेश, श्री दुर्गादेवी, श्री महालक्ष्मी, श्री सरस्वती, श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान शिव, श्री हनुमान एवं दत्तात्रेय देवता) ९ सात्त्विक चित्र तैयार किए हैं । उनमें संबंधित देवताओं का २९ से ३१ प्रतिशत तत्त्व आया है । कलियुग के अनुसार यह तत्त्व सर्वाेच्च है । (वर्तमान में दुकानों में उपलब्ध चित्रों में देवता का तत्त्व मात्र ८ से १५ प्रतिशत ही होता है । ‘देवता जैसे हैं, उस प्रकार चित्र बनाने से उस चित्र में १०० प्रतिशत देवतातत्त्व आ सकता है । इस कलियुग में मनुष्य में देवता का चित्र साकार करने हेतु उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पंदन ग्रहण करने की क्षमता नहीं है । अतः इस युग में देवता के चित्र में उस देवता का अधिक से अधिक ३० प्रतिशत तत्त्व आ सकता है ।’ – संकलनकर्ता) देवताओं के ऐसे सात्त्विक चित्र पूजाघर में रखने से तथा भक्तिभाव से उनकी पूजा एवं प्रार्थना करने से उनके कृपाशीर्वाद प्राप्त होते हैं । इसी उद्देश्य से, साथ ही ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना’, इस समष्टि उद्देश्य को ध्यान में रखकर सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने वर्ष २०२२ में उनके पूजाघर में सनातन-निर्मित सभी देवताओं के चित्र पूजा में रखे । ‘उनका यह उद्देश्य साध्य हुआ है’, यह पूजाघर के ‘छायाचित्र क्र. २’ एवं ‘छायाचित्र क्र. ३’ में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा के प्रभामंडल की तुलना करने पर समझ में आता है । पूजाघर के ‘छायाचित्र क्र. २’ की सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल ९७५ मीटर था । पूजाघर में सभी उच्च देवताओं के चित्र रखे जाने पर (छायाचित्र क्र. ३) पूजाघर की सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल चौगुना होकर वह ४००० मीटर हो गया । इससे यह समझ में आता है कि व्यष्टि साधना के लिए अध्यात्मशास्त्र में ‘अनेक से एक में’ का सिद्धांत है, जबकि समष्टि साधना हेतु ‘एक से अनेक में’ (एक देवता की पूजा से अनेक देवताओं की पूजा की ओर जाना) अर्थात ‘व्यापक बनने’ का सिद्धांत है ।
– श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा.
(२८.३.२०२५)
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