बेंगलुरू (कर्नाटक) के डॉ. प्रा. एस.एल. भैरप्पा का जन्म २० जुलाई १९३१ को हासन जिले के चन्नरायपट्टण तहसील के संतशिवर नामक गांव में हुआ । अपने बचपन में ही ‘बुबोनिक प्लेग’ के कारण उन्होंने उनकी माता एवं भाई को खो दिया । उन्होंने शिक्षा का खर्चा उठाने हेतु छोटे-बडे काम किए तथा भिक्षा भी मांगी । बचपन में उन पर लेखक गोरूरु रामस्वामी अय्यंगार का प्रभाव था ।
श्री. भैरप्पा ने १३ वर्ष की आयु में देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था । श्री. भैरप्पा ने उनकी प्राथमिक शिक्षा चन्नरायपट्टण तहसील में पूरी की तथा उसके पश्चात वे मैसुरू चले गए, जहां उन्होंने उनकी आगे की शिक्षा पूरी की । श्री. भैरप्पा ने विद्यालयीन शिक्षा लेते समय अकस्मात ही उनके चचेरे भाई की सलाह पर विद्यालय छोडकर उसके साथ एक वर्ष तक भ्रमण किया । उन्होंने मुंबई में ‘रेल्वे पोर्टर’ (कुली) का काम किया । मुंबई में साधुओं के एक समूह से भेंट हुई तथा आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने हेतु वे उनमें सम्मिलित हो गए । ‘भारतीय संस्कृति एवं परंपरा के प्रति प्रेम, ऐतिहासिक एवं सामाजिक विषयों में रुचि, सत्य एवं वास्तविकता की खोज, साहित्यिक दृष्टिकोण तथा यात्रा का अनुभव’ इन सभी कारणों से डॉ. एस.एल. भैरप्पा को इतिहास पर शोध करने की, साथ ही उसके आधार पर प्रभावशाली उपन्यासों की रचना की प्रेरणा मिली ।
डॉ. भैरप्पा ने ‘तत्त्वज्ञान’ विषय में ‘एम.ए.’ (स्नातकोत्तर कला शाखा) तथा ‘सौंदर्यशास्त्र’ में पी.एच.डी. (विद्यावाचस्पति) की उपाधि प्राप्त की है । डॉ. एस.एल. भैरप्पा ‘तत्त्वज्ञान’ के प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए । वर्तमान में वे ‘राष्ट्रीय प्राध्यापक’ के रूप में भी कार्यरत हैं । उन्होंने ‘एन.सी.ई.आर.टी.’ में (‘राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) में ३ दशक से भी अधिक समय तक ‘तत्त्वज्ञान के प्राध्यापक’ के रूप में काम किया है । उनके उपन्यासों पर आधारित हिन्दी, कन्नड एवं तेलुग इन भाषाओं में नाटक, फिल्में एवं दूरचित्रवाणी धारावाहिक प्रसारित हुए हैं । आज हम उनके विषय में जानकारी लेते हैं ।

विशेष स्तंभ

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज हेतु उनके वीर योद्धाओं ने जो त्याग किया था, वह सर्वोच्च है, उसी प्रकार से वर्तमान समय में भी अनेक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक धर्म-राष्ट्र की रक्षा हेतु ‘वीर योद्धा’ के रूप में कार्य कर रहे हैं । उनकी तथा उनके हिन्दू धर्मरक्षा हेतु के संघर्ष की जानकारी करानेवाले ‘हिन्दुत्व के वीरयोद्धा’, इस स्तंभ के द्वारा अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी तथा इन उदाहरणों से आपके मन की चिंता दूर होकर उत्साह उत्पन्न होगा ! – संपादक
१. जिनके उपन्यास सबसे अधिक बिके, ऐसे उपन्यासकार !
डॉ. एस.एल. भैरप्पा एक उत्कृष्ट साहित्यकार हैं । वे कन्नड भाषा में लिखते हैं तथा विगत २५ वर्ष से अधिक समय से जो उपन्यास सबसे अधिक बिके हैं, ऐसे उपन्यासों के उपन्यासकार हैं । देश की विभिन्न भाषाओं में उनके उपन्यासों का भाषांतर हुआ है । पिछले दशक में मराठी भाषा में उनके उपन्यास सबसे अधिक बिके हैं तथा हिन्दी भाषा में जिनके सबसे अधिक उपन्यास बिके हैं, ऐसे पहले ५ लेखकों में से वे एक हैं । वे एक जागरूक साहित्यकार हैं, जो उनके उपन्यासों में मूलभूत मानवीय भावनाएं व्यक्त करते हैं । भारतीय सैद्धांतिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के गहन ज्ञान के अतिरिक्त डॉ. प्रा. भैरप्पा को उनके बचपन से ही ग्रामीण एवं शहरी इन दोनों क्षेत्रों के गहन व्यक्तिगत अनुभव प्राप्त हैं । इसके परिणामस्वरूप उनकी व्यक्तिरेखाओं की जडें भारतीय भूमि में गहराई तक पहुंच गई हैं । उनके उपन्यासों पर आधारित अनेक परिचर्चाएं हुई हैं तथा हो रही हैं । उनके कार्य पर आधारित साहित्य समीक्षाओं के खंड भी प्रकाशित हुए हैं ।
सत्य इतिहास रखने के लिए आग्रही डॉ. भैरप्पा को ‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पुनरावृत्ति समिति’ से हटाया गया !

‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पुनरावृत्ति समिति’ के अध्यक्ष पार्थसारथी (पार्थसारथी इंदिरा गांधी के नीति सलाहकार तथा उनके विश्वसनीय थे, साथ ही वे नेहरू परिवार के भी निकटवर्ती थे ।) से पूछा, ‘वाराणसी की मस्जिद की ओर निरंतर देखनेवाले नंदीजी की ओर देखकर क्या निष्कर्ष लगाया जा सकता है ? भविष्य में यदि छात्रों ने शिक्षकों से यह प्रश्न पूछा, तो शिक्षक इसका क्या उत्तर देंगे ?’ पार्थसारथी के पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं थे ।
पार्थसारथी मुझे उनके कक्ष में लेकर गए तथा कहा, ‘आप कर्नाटक के तथा मैं तमिलनाडू का हूं । हमें एक-दूसरे के साथ भाईचारे का व्यवहार करना चाहिए । हमें झगडना नहीं चाहिए । ’ पार्थसारथी का यह कहना सुनकर मैं बाहर निकल आया । उसके १५ दिन उपरांत हुई अगली बैठक में मैंने पुनः वही प्रश्न पूछे । पार्थसारथी ने क्षुब्ध होकर वहीं बैठक समाप्त की । कुछ दिन उपरांत ‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम पुनरावृत्ति समिति’ की पुनर्रचना की सरकारी अधिसूचना प्रकाशित हुई, जिसमें मेरा नाम गायब था । मेरे स्थान पर एक साम्यवादी विचारधारावाले इतिहासकार को नियुक्त किया गया था । इस समिति ने इतिहास एवं सामाजिक अध्ययन की पुस्तकें बदलकर छात्रों से सच्चा इतिहास छिपाया । इन पुस्तकों में समाहित सभी पाठ साम्यवादी विचारधारा के लिए अनुकूल बनाए गए थे । इस पाठ्यक्रम में विदेशी आक्रांताओं को ‘नायक’ के रूप में दिखाया गया था । इसके विपरीत भारत की सच्ची संपत्ति, इतिहास एवं ज्ञान को कोई स्थान नहीं था ।’’
– डॉ. एस.एल. भैरप्पा
२. डॉ. एस.एल. भैरप्पा की पुस्तकों का पाठ्यक्रम में समावेश
कर्नाटक राज्य के विश्वविद्यालयों के स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में डॉ. एस.एल. भैरप्पा की पुस्तकों का समावेश है, साथ ही उनकी पुस्तकें लगभग २० ‘पी.एच्.डी.’ पुस्तकों का विषय बन चुकी हैं । उन्होंने २४ उपन्यास, साहित्य की समीक्षा के ४ खंड एवं सौंदर्यशास्त्र, सामाजिक समस्याएं तथा संस्कृति पर आधारित पुस्तकों का लेखन किया है । उनके ६ उपन्यासों का अंग्रेजी भाषा में भाषांतरण हुआ है ।
३. डॉ. एस.एल. भैरप्पा को प्राप्त विभिन्न पुरस्कार

अ. भारत सरकार की ओर से ‘पद्मश्री’ एवं ‘पद्मभूषण’ इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित
आ. वर्ष २०१६ में ‘असम साहित्य सभा’ की ओर से मामोनी राइसोम गोस्वामी राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित
इ. मैसुरू विश्वविद्यालय की ओर से वर्ष २०१६ में ‘मानद डॉक्टरेट’
ई. भारत सरकार की ओर से वर्ष २०१५ में ‘साहित्य अकादमी छात्रवृत्ति’
उ. दीनानाथ मेमोरियल फाऊंडेशन, मुंबई की ओर से वर्ष २०१२ में ‘वागविलासिनी पुरस्कार’
ऊ. कोलकाता में वर्ष २००७ में ‘हेडगेवार पुरस्कार’
ए. वर्ष २००७ में आंध्रप्रदेश का ‘एन.टी.आर.’ पुरस्कार
४. शोधकार्य एवं छात्रवृत्ति
अ. राष्ट्रीय शोधकार्य प्राध्यापक, भारत सरकार
आ. चीन सरकार के निमंत्रण पर चीन की यात्रा करनेवाले भारतीय साहित्य प्रतिनिधि समूह के ५ सदस्यों में से एक
इ. अमेरिका के भारतीय शरणार्थियों की सांस्कृतिक समस्याओं के अध्ययन के लिए ‘फोर्ड फाऊंडेशन पुरस्कार’
ई. वर्ष १९७७ में लंदन विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ एज्युकेशन’ में ‘ब्रिटीश काऊंसिल फेलोशिप’ का कार्यकाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं डॉ. एस.एल. भैरप्पा की भेंट में हुआ संवाद
डॉ. प्रा. एस.एल. भैरप्पा (दाहिनी ओर) से संवाद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

डॉ. एस.एल. भैरप्पा को ‘पद्मभूषण’ पुरस्कार प्राप्त होने के उपरांत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाथ जोडकर कुछ कदम आगे चलते हैं तथा आदरपूर्वक उनसे कहते हैं, ‘‘नमस्कार भैरप्पाजी, कैसे हैं आप ?’’ उस पर भैरप्पाजी ‘मैं कर्नाटक का कन्नड उपन्यासकार एस.एल. भैरप्पा !’, (नमस्कार के हावभाव के साथ शिष्टाचार का पालन करते हुए), ऐसा उत्तर देते हैं ! ‘‘सर, आपको कौन नहीं पहचानता ?’’, ऐसा बोलते हुए मोदी डॉ. भैरप्पा का हाथ अपने हाथ लेकर उनसे पूछते हैं, ‘‘अब आप कौनसी पुस्तक लिख रहे हैं ?’’ डॉ. भैरप्पा संकोच करते हुए उत्तर देते हैं, ‘‘वास्तव में देखा जाए, तो कोई नई पुस्तक नहीं है ।’’ इस पर मोदी पुनः कहते हैं, ‘‘सर, आप कृपया उपन्यास लिखना बंद न कीजिए; क्योंकि भारत को, आपके पाठकों को आपकी पुस्तकों तथा बुद्धिमत्ता की आवश्यकता है ।’’ इस पर डॉ. भैरप्पा हंसते हैं ।
५. विश्वभ्रमण
डॉ. भैरप्पा भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं पाश्चिमात्य संगीत के उत्तम श्रोता हैं तथा कला के अध्येतता है । भ्रमण करना बचपन से उनकी रूचि रही है । उन्होंने हिमनदियों, एमेजॉन के वन, आफ्रिका के रेगिस्तानों, यूरोप एवं अमेरिका के बडे शहरों के साथ अन्य अनेक स्थानों के अवलोकन हेतु विश्वभ्रमण किया है । उन्होंने आल्प्स, रॉकीज, एंडीज एवं फुजियामा में पदभ्रमण किया है; परंतु तब भी हिमालय में भ्रमण करने में उनकी सबसे अधिक रूचि रही है ।
६. डॉ. एस.एल. भैरप्पा के अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित शैक्षणिक प्रकाशन
‘Values in Modern Indian Educational Thought’, 1968 (आधुनिक भारतीय शैक्षणिक विचारों में समाहित मूल्य १९६८) (नई देहली: राष्ट्रीय शैक्षणिक शोध एवं प्रशिक्षण परिषद); ‘Truth & Beauty: A Study in Correlations, 1964 (सत्य एवं सौंदर्य: एक-दूसरे के संबंधों का अध्ययन १९६४) (वडोदरा : एम.एस. युनिवर्सिटी प्रेस); ‘इंडियन फिलॉसॉफिकल क्वार्टरली’, ‘दर्शना इंटरनैशनल’, ‘जर्नल ऑफ युनिवर्सिटी ऑफ वडोदरा’ जैसे विभिन्न नियतकालिकों में प्रकाशित शोधजन्य २० लेख
डॉ. एस.एल. भैरप्पा के महत्त्वपूर्ण विचार
१. कोई भी इतिहास नारा, आदर्श अथवा सुधार के आंदोलनों से बंधा हुआ नहीं है । घटनाएं जैसे घटित हुई हैं, उसी प्रकार से उसकी ओर देखा जाना चाहिए । इसे साधने हेतु हमें वर्तमान की भ्रामक कल्पनाओं से स्वयं का मन मुक्त करना चाहिए ।
२. व्यक्ति के कारण पुरस्कारों का महत्त्व है, अपितु पुरस्कार के कारण व्यक्ति महान नहीं हो जाता । मेरे काम की चिरस्थायिता ही मेरे लिए सच्चा पुरस्कार है ।
३. डॉ. एस.एल. भैरप्पा द्वारा लिखित ‘आवरण’ इस पुस्तक में समाहित कुछ वाक्य :
अ. सत्य को छिपाने की कृति को ‘आवरण’ कहा जाता है तथा असत्य को प्रक्षेपित किए जाने को ‘विक्षेप’ कहा जाता है । जब यह किसी व्यक्ति के स्तर पर घटित होता है, उस समय उसे ‘अविद्या’ कहा जाता है, जबकि जब वह किसी समूह अथवा विश्वस्तर पर घटित होता है, उस समय उसे ‘माया’ कहा जाता है ।
आ. इतिहास पढने का उद्देश्य किसी को तुच्छ समझना अथवा कलंकित करना नहीं होता, नहीं है तथा होना भी नहीं चाहिए । अधिक से अधिक इतिहास के अध्ययन का उपयोग हमें अपने पूर्वजों के उचित एवं अनुचित कार्य का प्रामाणिकता के साथ तथा उसे निष्पक्षता से समझ लेने में होता है तथा उन पाठों का उपयोग हमें अपने वर्तमान तथा भविष्य को बनाने में करना चाहिए ।
इ. इतिहास का ध्येय अर्थात मानवता को प्रगति की ओर ले जानेवाली यात्रा को सक्षम बनाना !
७. अन्य राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय उपक्रमों में सहभाग
अ. अंतरराष्ट्रीय परिषद, उदाइन विश्वविद्यालय, इटली (वर्ष २००७)
आ. अध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ कन्नडगास मिटींग, दुबई (वर्ष २००७)
इ. एसोसिएशन ऑफ कन्नड कूटा अमेरिका, वॉशिंग्टन डी.सी., अमेरिका (वर्ष २००६)
ई. उद्घाटन का भाषण, अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद, गोवा (वर्ष १९९४)
उ. पूर्व-पश्चिम लेखकों की बैठक, ब्लेड, स्लोवेनिया (वर्ष १९९१)
ऊ. भारत के प्रतिनिधि, ‘युनेस्को’ में नैतिक शिक्षा के विषय पर परिचर्चा, टोकियो, जपान (वर्ष १९७५)
ए. भारत में संपन्न २५ से अधिक साहित्य परिषदों के अध्यक्ष एवं अध्यक्षीय पुरस्कार
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(और इनकी सुनिए…) “हिन्दी तथा उर्दू भारत की भाषाएं हैं, जबकि संस्कृत बाहर से आई है ।” – Congress MP Mohammad Javed
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