
‘मैंने जब साधना आरंभ की, उस समय मैं सूक्ष्म से मिलनेवाले ज्ञान पर अधिक बल देता था । उस ज्ञान के आधार पर मेरे कुछ ग्रंथ भी प्रकाशित हुए । अब मैं अध्यात्मशास्त्र के संदर्भ में अन्यों द्वारा लिखे ग्रंथों का लेखन चुनने को प्रधानता दे रहा हूं; क्योंकि उसमें स्वयं को मिलनेवाले ज्ञान की तुलना में अधिक मात्रा में ज्ञान मिल रहा है । ईश्वर से मिलनेवाले ज्ञान का माध्यम भले ही बदला हो, तब भी दोनों माध्यमों से ज्ञान ही मिलता है; इसलिए उसमें किसी प्रकार की हीनता की भावना प्रतीत नहीं होती, अपितु उसके विपरीत कुछ नया सीखने का आनंद अधिक मिल रहा है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
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‘साधना में होकर आप हंसमुख नहीं हैं, तो ‘आपकी साधना उचित ढंग से नहीं हो रही है’, ऐसा मान लें तथा प्रयास बढाएं ! – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी |
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?