
‘मैंने जब साधना आरंभ की, उस समय मैं सूक्ष्म से मिलनेवाले ज्ञान पर अधिक बल देता था । उस ज्ञान के आधार पर मेरे कुछ ग्रंथ भी प्रकाशित हुए । अब मैं अध्यात्मशास्त्र के संदर्भ में अन्यों द्वारा लिखे ग्रंथों का लेखन चुनने को प्रधानता दे रहा हूं; क्योंकि उसमें स्वयं को मिलनेवाले ज्ञान की तुलना में अधिक मात्रा में ज्ञान मिल रहा है । ईश्वर से मिलनेवाले ज्ञान का माध्यम भले ही बदला हो, तब भी दोनों माध्यमों से ज्ञान ही मिलता है; इसलिए उसमें किसी प्रकार की हीनता की भावना प्रतीत नहीं होती, अपितु उसके विपरीत कुछ नया सीखने का आनंद अधिक मिल रहा है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
|
‘साधना में होकर आप हंसमुख नहीं हैं, तो ‘आपकी साधना उचित ढंग से नहीं हो रही है’, ऐसा मान लें तथा प्रयास बढाएं ! – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी |
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
मुंबापुरी में सहस्रों के समष्टि संकल्प से राष्ट्ररक्षा हेतु प्राप्त हुआ आध्यात्मिक बल !
Bangladesh Hindus : पिछले ४ महीनों में १०० हत्याएं, २८ बलात्कार एवं ९५ मंदिरों में तोडफोड
संपादकीय : राष्ट्र के लिए त्याग करें !
मथुरा (उत्तर प्रदेश) में रामराज्य की स्थापना हेतु की गई सामूहिक प्रार्थना !
नोएडा (उत्तर प्रदेश) के विद्यालय में ‘लव जिहाद’ विषय पर व्याख्यान