… मुझे ध्यान में आए सूत्र !

सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी पर जिनकी श्रद्धा है, वे उन्हें ‘अवतारी पुरुष’ मानते हैं । सनातन के साधक उन्हें गुरुस्थान पर मानते हैं तथा ‘उनके समान गुरु कहीं नहीं देखे’, ऐसा उनका भाव है । इन दोनों बातों का कारण है, सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. ज़यंत आठवलेजी द्वारा सिखाई गई ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ एवं उनके द्वारा साधकों के लिए उपलब्ध कराई गई अपार गुरुसेवा ! इन दोनों ही बातों का मुझे जो महत्त्व समझ में आया, उसे मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है । (इस लेख में जहां ‘प.पू. डॉक्टरजी’ उल्लेख किया गया है, वह सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के विषय में है ।
१. गुरुकृपायोग

एक बार प.पू. डॉक्टरजी के गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी ने पूछा, ‘सबसे श्रेष्ठ योग कौनसा है ?’ इस पर शिष्य के श्रेष्ठतम गुणों से युक्त प.पू. डॉक्टरजी ने प्रचलित ध्यानयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग आदि में से किसी का नाम नहीं लिया । उनका उत्तर था – ‘गुरुकृपायोग’ । यह सुनकर प.पू. भक्तराज महाराजजी ने भी कहा, ‘बिल्कुल सही !’ तो कहां से आया यह योग ?
‘गुरुकृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है’, जिन्हें इसकी अनुभूति हुई थी, ऐसे शिष्य प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी को ही यह उत्तर सूझ सकता है । अतः चाहे किसी भी योग के अनुसार साधना करें, तब भी संबंधित योग के गुरु के मार्गदर्शन में साधना कर गुरुकृपा साध्य की, तभी जाकर वह फलीभूत होती है । इसलिए ‘गुरुकृपायोग’ ही श्रेष्ठ है ! स्वामी विवेकानंदजी ने भी विश्व को बताया है कि ‘गुरु-शिष्य परंपरा ही भारत की विशेषता है ।’
२. ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियां तथा उतने साधनामार्ग’ के अनुसार विस्तारित कार्य !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का अध्यात्म के क्षेत्र का कार्य देखने पर उसकी व्यापकता ध्यान में आती है । आरंभ में केवल प्रवचन एवं साप्ताहिक सत्संगों के माध्यम से आरंभ हुए इस कार्य का वटवृक्ष वर्तमान में केवल विस्तृत ही नहीं हुआ है; अपितु उसकी जटाओं ने भी भूमि तक पहुंचकर सुदृढ पकड बना ली है ।
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अध्यात्म की विशेषता बताई, ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियां तथा उतने ही साधनामार्ग ।’ वे केवल इतना ही बताकर रुके नहीं, अपितु उन्होंने उसके अनुसार साधकों को उनकी प्रकृति के अनुरूप साधना उपलब्ध कराई । जिसकी जैसी प्रकृति एवं कौशल, उसके अनुसार उसे गुरुसेवा (साधना) उपलब्ध हुई । अध्यात्मप्रसार करना तथा साधकों को तैयार करना, उनके कार्य की नींव थी ।
कला के माध्यम से साधना
गुरुदेवजी ने कला की शिक्षा प्राप्त साधकों से देवताओं के सात्त्विक चित्र एवं श्री गणेश की सात्त्विक मूर्ति बनवाई । जिनके पास रंगोली बनाने की कला है, उन्हें सात्त्विक रंगोली की पहचान करना सिखाया, उनसे देवताओं का तत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोलियां बनवाकर लीं तथा समाज में उसका प्रसार किया । देवताओं की नामजप-पट्टियां व सात्त्विक उत्पाद (कर्पूर, इत्र, अगरबत्ती आदि) के द्वारा समाज में सात्त्विकता उत्पन्न करने हेतु प्रसार की सेवा करनेवाले साधकों को सेवा का अवसर प्रदान किया ।
संगीत एवं नृत्य
संगीत एवं नृत्य की शिक्षा प्राप्त साधकों को उसी माध्यम से साधना कर ईश्वरप्राप्ति करना संभव हो, इसके लिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ की स्थापना की । समाज के कलाकार इसके साथ जुड गए तथा वे भी साधना करने लगे ।
आध्यात्मिक शोधकार्य
कुछ उच्चशिक्षित साधक तथा ऐसे संत एवं साधक जिन्हें साधना से छठी इंद्रिय जागृत होने के कारण सूक्ष्म का ज्ञान है, वे वस्तु एवं वास्तु के संदर्भ में वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से शोधकार्य करने की सेवा कर रहे हैं । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिन्दू धर्म की अनेक बातें व्यक्ति में सकारात्मकता बढाने के लिए सहायक सिद्ध होती हैं, इसे सिद्ध करनेवाला शोधकार्य भी किया जाता है ।
ग्रंथ-निर्मिति
अनेक साधक सैकडों विषयों पर आधारित विभिन्न भाषाओं के ग्रंथनिर्मिति की सेवा कर रहे हैं । यह सेवा अगले अनेक वर्षों तक चलती रहनेवाली है । अध्यात्म को वैज्ञानिक परिभाषा में, प्रायोगिक स्तर पर एवं सुलभ भाषा में विशद करनेवाले ये ग्रंथ अगले सैकडों वर्षों तक समाज के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगे । कुछ लोगों ने इन ग्रंथों का वर्णन ‘कलियुग के वेद’, ऐसा किया है । ग्रंथनिर्मिति की सेवा में ग्रंथों के लिए किए गए लेखन का वर्गीकरण, संकलन, संरचना, चित्र, मुखपृष्ठ एवं मलपृष्ठ बनाना, छपाई, बिक्री तथा उनका लेखाजोखा आदि विभिन्न सेवाएं अंतर्भूत हैं ।
‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक
गुरुदेवजी द्वारा आरंभ किए गए ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक केवल अध्यात्म, राष्ट्र एवं धर्म के विषय में नियमित एवं निरंतर प्रसार करनेवाले माध्यम ही नहीं हैं; अपितु हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए हिन्दुत्वनिष्ठों के लिए वे वैचारिक व्यासपीठ ही बन गए हैं । साधकों के लिए तो वह ‘गुरुदेवजी का संदेशवाहक’ ही बन गया । इसके लिए प्रतिदिन समाचार प्राप्त करना, उनका मुद्रितशोधन, पृष्ठों की संरचना, छपाई, वितरण एवं लेखा-जोखा जैसी विभिन्न सेवाएं अंतर्भूत हैं !
ध्वनिचित्रीकरण एवं संरक्षण
आश्रम में अथवा बाहर होनेवाले कार्यक्रमों के छायाचित्र खींचना, चित्रीकरण करना, उनका संकलन, दृश्य श्रव्य-चक्रिकाएं (ऑडियो-वीडियो सीडी) बनाना, दुर्लभ वस्तुओं का संरक्षण, उनकी प्रदर्शनी लगाना आदि सेवाएं साधक कर रहे हैं ।
पौरोहित्य एवं ज्योतिषशास्त्र
ज्योतिषशास्त्र जाननेवाले भी सेवा कर सकें, इसके लिए उनका दिशादर्शन कर उसके द्वारा उनसे साधना करवा ली । पौरोहित्य में रुचि रखनेवालों को उसमें समाहित यज्ञयाग की प्रासंगिक सेवाएं, साथ ही साधक-पुरोहित बनने के लिए मार्गदर्शन किया जाता है ।
हिन्दू जनजागृति समिति का कार्य
अध्यात्म के जिज्ञासु साधना करने लगे; परंतु उनमें से कुछ लोगों के यह ध्यान में आया कि समाज में धर्म के प्रति घोर अज्ञान है । धर्म से दूर जाने से समाज की हो रही हानि को देखकर समाज में धर्मशिक्षा का प्रसार, धर्म एवं राष्ट्र की रक्षा करना आवश्यक हो गया है । इसके लिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की प्रेरणा से हिन्दू जनजागृति समिति की स्थापना हुई तथा उसका कार्य आरंभ हुआ । आगे जाकर विभिन्न संगठन समिति के साथ जुड गए ।
३. साधकों को मिली सेवाएं, सिद्ध हुई स्वर्णिम अवसर

इन विभिन्न सेवाओं का यहां उल्लेख करने का कारण यही है कि ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियां’, उसके अनुसार साधकों को उनकी साधना के लिए ये सेवाएं उपलब्ध हुईं । अक्षरशः शून्य से खडा किया गया सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का यह प्रचंड कार्य प.पू. भक्तराज महाराजजी के वचन ‘दुखी बनें जिज्ञासु । जिज्ञासु बनें मुमुक्षु ! मुमुक्षु बनें साधक । तथा साधक प्राप्त करें मोक्ष !’ के लिए ही है । हमें प्राप्त हुई सेवाएं साधना के रूप में करना तथा उन्हें करते समय उसे गुरुकृपायोग के अनुसार अष्टांग साधना से जोडकर उससे आनंद प्राप्त करना, साधकों के लिए स्वर्णिम अवसर ही सिद्ध हुआ है । उसके द्वारा अनेक साधकों की आध्यात्मिक उन्नति हुई है ।अनेक लोगों का पूर्वजन्म का प्रारब्ध समाप्त हुआ, जबकि अनेक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हुए । कुछ साधक संत बन गए, तो अनेक साधक संतत्व की दिशा में अग्रसर हैं ।
गुरुदेवजी के आश्रम एवं सेवाकेंद्र साधना तथा तीव्र गति से होनेवाली आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम ही हैं । आश्रम में कौशलपूर्ण सेवाएं होती हैं, जिनमें प्रतिदिन सभी के लिए सवेरे का तथा दोपहर का अल्पाहार बनाना, दोपहर तथा रात में महाप्रसाद बनाना, विभिन्न सेवाओं का नियोजन करना, आश्रम की नित्य स्वच्छता, वस्तुसंग्रह, वस्तुओं का संरक्षण आदि सेवाएं न जाने कितने साधकों की साधना करवा लेती हैं ।
४. सभी प्राणियों के कल्याण की लगन !
वास्तव में देखा जाए, तो सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने यह जो प्रचंड कार्यविश्व खडा किया है, वह उन्होंने पूरे विश्व में उनकी ख्याति हो, उन्हें सम्मान मिले तथा समाज उन्हें गौरवान्वित करे; इसके लिए नहीं किया है । वैसा कोई विचार सूक्ष्म स्तर पर भी गुरुदेवजी के मन में नहीं आया, यह निश्चित है !
उनकी तीव्र जिज्ञासु वृत्ति, साधकों के प्रति उनकी प्रीति तथा सभी प्राणिमात्र के कल्याण की लगन के कारण ही यह प्रचंड कार्यविश्व खडा हुआ है । उक्त सभी कार्य उन्हीं के मार्गदर्शन से आरंभ हुए तथा उसके अनुसार ही जारी हैैं; परंतु वे उससे अलिप्त हैं । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का कार्य संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर महाराजजी द्वारा कहे अनुसार, ‘हें मजचिस्तव जाहलें । परि म्यां नाहीं केलें ।’ (यह मेरे कारण हुआ; परंतु मैंने नहीं किया), इस स्वरूप का है । उन्होंने सेवाएं उपलब्ध कराई तथा साधक इन सेवाओं को परिपूर्ण रूप से संपन्न करें, इसके लिए स्वयं अथक प्रयास किए । उन्होंने साधकों को आत्मनिर्भर बनाया तथा उनसे साधना भी करवा ली ।
इसीलिए सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष हैं । उनके इस कार्य को सक्षमता से जारी रखना, कालानुसार कार्य का विस्तार करना, उसके लिए समर्पित होकर निर्गुण तत्त्व की सेवा के रूप में सबकुछ करना तथा अंत में उनकी भांति ही इन सबसे अलिप्त रहना ही उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता सिद्ध होगी !
– श्री. वीरेंद्र मराठे, प्रबंधकीय न्यासी, सनातन संस्था (१.५.२०२६)
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