संपादकीय : आर्थिक अनुशासन

मई २०२६ ! विश्व एक नए आर्थिक एवं भूराजनीतिक मोड पर खडा है । अमेरिका-ईरान, इजरायल-हमास, पाकिस्तान-अफगानिस्तान एवं रूस-यूक्रेन के युद्ध की दाहकता अभी बनी हुई है । एक छोटी-सी चिंगारी से तीसरे विश्वयुद्ध का कभी भी आरंभ हो सकता है, इतनी अनिश्चितता है । विगत कुछ दशकों में वैश्विकीकरण, मुक्त व्यापार, तकनीक एवं गतिमान आर्थिक वृद्धि के बल पर विश्व ने अभूतपूर्व प्रगति का अनुभव किया; परंतु इस प्रगति के साथ एक बडी वास्तविकता भी सामने आई, वह है विश्व का प्रत्येक देश अब एक-दूसरे से इतना जुड गया है कि किसी एक प्रदेश में उत्पन्न संकट सहस्रों किलोमीटर दूर सामान्य नागरिक के जीवन को भी हिला सकता है । चाहे वह कोई युद्ध हो अथवा कोई महामारी !

अमेरिका-ईरान के मध्य तनाव के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर उत्पन्न संकट तथा वैश्विक तेलबाजार की अस्थिरता का परिणाम भारत की अर्थव्यवस्था पर हो रहा है । कूटनीति के बल पर थोडे-बहुत ईंधन का आयात भले ही हो रहा है; परंतु वह कभी भी रुक सकता है तथा उसका सीधा परिणाम भारतीयों के नित्य जीवन पर हो सकता है, यह जानकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों को ईंधन की बचत करना, सोने की खरीद न करना तथा ‘वर्क फ्रॉम होम’ (कार्यालयीन काम घर से ऑनलाइन पद्धति से करना) पद्धति पुनः अपनाने का किया गया आवाहन विशेष महत्त्वपूर्ण है । ऊपर से देखा जाए, तो यह आवाहन सामान्य लग सकता है; परंतु वास्तव में वह एक बडे आर्थिक संकट की पूर्वतैयारी है । ‘कोरोना’ महामारी के कारण लगी यातायात बंदी के समय भारत ने अनुशासन एवं संयम अपनाया था । आज पुनः उन्हीं मूल्यों को अपनाना पड सकता है । कोरोना महामारी का संकट ‘प्राणों’ का संकट था; परंतु आज का यह संकट ‘जेब पर’ आया संकट है ।

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सुविधाओं पर निर्भरता

विगत २-३ दशकों में भारत में उपभोगवाद बढ गया है । बडे-बडे अलिशान वाहन, बडे विवाह समारोह, बढता ईंधन का उपयोग, विलासितापूर्ण जीवनशैली तथा निरंतर बढनेवाली ग्राहक संस्कृति आधुनिक भारत की पहचान बनती जा रही है; परंतु युद्ध जैसे वैश्विक संकटों ने यह दिखा दिया कि किसी भी राष्ट्र के लिए असीमित उपभोग की आदत दीर्घकाल तक जारी रखना हानिकारक है । मनुष्य की सुविधा के लिए बनीं सुविधाओं का रूपांतरण अब विलासिता में हुआ है । पहले जो बातें विलासिता की मानी जाती थीं, वह आज आवश्यक लगने लगी हैं । निजी वाहन, वातानुकूलित जीवनशैली, पर्यटन के रूप में विदेश यात्राएं, बडे विवाह समारोह एवं ‘ब्रैंडेड’ वस्तुओं का उपयोग, ये बातें अब प्रतिष्ठा के मापदंड में बदल चुकी हैं ।

आज प्रश्न केवल पेट्रोल-डीजल के महंगे होने तक सीमित नहीं है । तेल महंगा होने से यातायात महंगा होता है; यातायात महंगा होने से अनाज, औषधियां, निर्माणसामग्री, उद्योग उत्पादन तथा नित्य जीवन में आवश्यक प्रत्येक वस्तु महंगी होती है । महंगाई बढने से मध्यमवर्ग का अर्थशास्त्र डगमगा जाता है । उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता अल्प होती है । सरकार पर वित्तीय बोझ बढ जाता है । रुपया दबाव में आता है तथा आगे जाकर विदेशी मुद्रा भंडार पर तनाव आता है; इसीलिए प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए संदेश को समझना आवश्यक है ।

तो हम ऊर्जा के लिए अन्य देशों पर इतने निर्भर क्यों हैं ? हमने वैकल्पिक ऊर्जासाधनों का विचार क्यों नहीं किया ? अथवा क्या हमने भारत में पूर्व से चले आ रहे पारंपरिक ऊर्जास्रोंतों की उपेक्षा की ?, इस पर भी हमें विचार करना पडेगा । भारत विकास के शिखर पर पहुंच रहा है, इस पर प्रत्येक नागरिक को गर्व है; परंतु हमारा देश पहले से ही कृषिप्रधान देश है । भारत का प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर था तथा वहां आवश्यक सभी सुविधाएं उपलब्ध थीं । पाश्चात्य देशों की औद्यौगिक क्रांति तथा हरित क्रांति अपनाते समय, ‘क्या यह भारत के लिए आवश्यक हैं ?’, इसका उस समय विचार होना आवश्यक था । चलो, ठीक है । उसे छोड देते हैं; परंतु वैश्विक अनिश्चितता के वर्तमान काल में प्रधानमंत्री के ‘प्राकृतिक कृषि की ओर चलें, रासायनिक ऊर्वरकों पर निर्भर न रहें, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करें’, इस आवाहन को आत्मसात कर, पुनः भारतीय परंपरा की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता ध्यान में रखनी चाहिए ।

मानसिक तैयारी करें !

इस संपूर्ण चर्चा में एक और बात महत्त्वपूर्ण है, भारतीय समाज की मानसिक तैयारी ! क्या हम इस संकट का सामना करने के लिए तैयार हैं ? क्या हम ‘आवश्यकता’ एवं ‘विलासिता’ के मध्य की सीमारेखा पहचान सकते हैं ? भारत का मध्यम वर्ग विगत कुछ वर्षाें में बडे स्तर पर ऋण आधारित जीवनशैली की ओर मुड गया है । गृहऋण, व्यक्तिगत ऋण एवं ‘क्रेडिट कार्ड’ संस्कृति के कारण लोगों की आय एवं व्यय के मध्य का संतुलन बिगडता जा रहा है । ऐसी स्थिति में ईंधन के मूल्य एवं महंगाई बढी, तो उससे सामान्य नागरिकों पर प्रचंड आर्थिक तनाव आ सकता है । इसी कारण सरकार नागरिकों को पहले ही सतर्क कर रही है । ईंधन बचत का अर्थ केवल पैसा बचाना नहीं है, अपितु राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता संजोना है । सोने की खरीद टालने का अर्थ केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं है, अपितु वह विदेशी मुद्रा बचाने का प्रयास है । ‘वर्क फ्रॉम होम’ अपनाना केवल सुविधा नहीं है, अपितु राष्ट्रीय ऊर्जा का उपयोग न्यून करने का मार्ग है ।

महंगाई बढने का सबसे अधिक दंश गरीब वर्ग एवं मध्यम वर्ग को झेलना पडता है । धनवान वर्ग कुछ मात्रा में बढता व्यय सहन कर सकता है । उसके कारण ‘मितव्ययिता’ का यह मंत्र सामान्य लोगों के घर के समान धनी वर्ग, साथ ही जनप्रतिनिधि, सरकारी तंत्र, सरकारी कार्यालय, ऐसे सभी स्थानों पर लागू होना चाहिए । राष्ट्रीय अनुशासन सभी के लिए समान होना चाहिए ।

भारतीय समाज की एक बडी शक्ति है संकटकाल में संगठित होने की क्षमता ! युद्धकाल, प्राकृतिक आपदा, महामारी हो अथवा आर्थिक संकट; प्रत्येक बार भारतीय समाज ने संयम का परिचय दिया है । प्रधानमंत्री का यह आवाहन कुछ लोगों को कठोर लगेगा, कुछ लोगों को अतिसतर्कता लगेगी; परंतु उसके पीछे की वास्तविकता अस्वीकार नहीं की जा सकती । ऐसी स्थिति में प्रत्येक नागरिक को स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए, ‘मैं देश की ऊर्जा एवं आर्थिक सुरक्षा में क्या योगदान दे सकता हूं ?’ इसका उत्तर कदाचित बडा नहीं होगा । टाली गई एकाध यात्रा या टाला हुआ अनावश्यक व्यय, इतना ही उसका उत्तर होगा; परंतु देश को इस संकट में उतने से भी आधार मिल सकता है । अनिश्चितता के वैश्विक वातावरण में ‘अनुशासन’ ही सबसे बडी शक्ति सिद्ध होनेवाली है !

आज का आर्थिक अनुशासन एवं संयमित जीवनशैली, भविष्य की महंगाई एवं आर्थिक संकट का प्रभावी उत्तर है !