वर्ष १९९६ में गुरुदेव ने लिखा था,

इस वचन के माध्यम से गुरुदेवजी ने ३० वर्ष पूर्व ही साधकों को अपने भीतर के निर्गुण तत्त्व की अनुभूति करा दी थी । आज विश्व के किसी भी कोने में रहनेवाला साधक जब अत्यंत लगन और आर्तता से गुरुदेव को पुकारता है, तब वे क्षणमात्र की भी देर किए बिना उसकी सहायता के लिए दौडे चले आते हैं । यह अनुभूति सहस्रों साधकों ने ली है और आज भी ले रहे हैं । उदाहरणार्थ, ‘अध्यात्मप्रसार की सेवा करते समय गुरुदेवजी सूक्ष्म रूप से साथ में हैं’, ‘सत्संग लेते समय गुरुदेवजी ही हमारे मुख से बोल रहे हैं’, ऐसी अनुभूतियां साधकों को होती हैं । शारीरिक कष्ट होने पर अथवा शल्यक्रिया के समय शल्यकक्ष में भी श्री गुरु के सूक्ष्म अस्तित्व की अनुभूति होने से साधकों को धैर्य मिलता है । जिस-जिस समय साधक संकट में होता है, उस समय उसे संभालनेवाले हाथ गुरु के ही होते हैं और जब साधक आनंदी होता है, तब उस आनंद का मूल भी गुरु ही होते हैं । इस प्रकार सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी साधकों को दिए गए अपने आशीर्वचन का क्षण-क्षण पालन कर रहे हैं ।
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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