
‘भक्तियोग के अनुसार साधना करनेवाला साधक नामजप के माध्यम से अखंड साधना कर सकता है; क्योंकि ईश्वर का नामजप करने के लिए उस पर स्थल, काल जैसे घटकों की मर्यादाएं नहीं होती । ज्ञानयोगी पढे हुए ज्ञान का चिंतन कर सकता है, कर्मयोगी हो, तो वह प्राप्त परिस्थिति में भी अपेक्षारहित रह सकता है तथा हठयोगी केवल सांस पर ध्यान केंद्रित कर अखंड साधनारत रह सकता है । इस प्रकार चाहे हम किसी भी साधनामार्ग से साधना करते हों, तब भी हमें अखंड साधनारत रहना संभव है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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