आज हम कुम्भ क्षेत्र में होनेवाली अयोग्य बातें और उस विषय में श्रद्धालुओं का कर्तव्य, इस विषय में जानकारी लेंगे ।

१. कुम्भ में गंगास्नान करते समय गंगामाता की पवित्रता कैसे बनाएं रखें ?
गंगाजी में स्नान करनेवाले का मन तीर्थक्षेत्र की पवित्रता तथा सात्त्विकता का अनुभव न कर रहा हो, तो उसके पापकर्म नष्ट होना असम्भव है; इसलिए पर्वस्नान का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ में गंगाजी से आगे दी हुई प्रार्थनाएं करें –
अ. हे गंगामाता, आपकी कृपा से मुझे यह पर्वस्नान करने का अवसर मिला है । इसलिए मैं आपके चरणों में कृतज्ञ हूं । हे माता, आपके इस पवित्र तीर्थ में मैं श्रद्धायुक्त अंतःकरण से पर्वस्नान कर पाऊं, ऐसी कृपा कीजिए ।
आ. हे पापविनाशिनी गंगादेवी, आप मेरे सर्व पापों का हरण कीजिए ।
इ. हे मोक्षदायिनी देवी, आप मुझसे आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक साधना करवा लीजिए व मुझे मोक्ष की दिशा में ले चलिए ।
इसके उपरान्त उपास्यदेवता का नामजप करते हुए स्नान करें !
२. कुम्भ क्षेत्र के देवालयों की पवित्रता कैसे बनाए रखें ?
देवालय सात्त्विकता का स्रोत है । उनकी पवित्रता न रखना गंभीर अपराध है; परंतु पर्यटन का उद्देश्य से आनेवाले लोगों से अनेक बार यह पावित्र्य नही रखा जाता ।
अ. तीर्थ पर स्नान के उपरान्त, नंगे पैर लौटनेवाले श्रद्धालुओं के पैरों पर मिट्टी अथवा कीचड लग जाता है । उसी स्थिति में देवालय में प्रवेश करने पर वहां कीचडयुक्त पानी फैल जाता है । इसलिए देवालय में प्रवेश करने से पूर्व पैर धोकर और पोंछकर ही जाएं ।
आ. जूते-चप्पल का उपयोग करनेवाले भी उन्हें एक पंक्ति में रखें तथा पैर धोकर, पोंछकर देवालय में प्रवेश करें ।
इ. दर्शन हेतु भीड न करें । पंक्ति में लगें और शान्ति से दर्शन करें ।
ई. देवालय के परिसर में ऊंची आवाज में बातें, उच्च स्वर में स्तोत्रपाठ, शोर आदि करने से अन्यों की उपासना में बाधा उत्पन्न होती है । अतः ऐसा न करें ।
उ. देवालय का परिसर स्वच्छ रखें । निर्माल्य को निर्माल्य के डिब्बे में और अगरबत्ती, माचिस आदि के आच्छादन कचरे के डिब्बे में डालें ।

३. देवता का दर्शन शीघ्र हो, इसलिए अवैध रूप से पैसे देना क्या उचित है ?
नहीं । देवता का दर्शन शीघ्रता से होने के लिए श्रद्धालू अवैध रूप से पैसे न दें । कुम्भ पर्व के समय वहां के देवता का (उदा. त्र्यंबकेश्वर के ज्योतिर्लिंग का) दर्शन करने के लिए कुछ घंटे पंक्ति में खडे रहना पडता है । पंक्ति में खडे न होना पडे, इसलिए कुछ श्रद्धालु अवैध रूप से प्रतिव्यक्ति १०० – २०० रुपये देकर पंक्ति में खडे रहे बिना दर्शन करते हैं । ऐसा करना अनुचित है; क्योंकि पंक्ति में खडे न होते हुए घूस देकर देवता के दर्शन करना भ्रष्टाचार ही
है । तीर्थयात्रा एक प्रकार की तपस्या ही है । देवता के दर्शन करने के लिए कुछ घण्टे पंक्ति में खडा रहना, तपस्या का ही एक भाग है । उसमें छूट लेना उचित नहीं है । देवता के दर्शन के लिए जब पंक्ति में खडे हों, तब अनावश्यक बातें न कर नामजप करना चाहिए ।
४. साधु-संत आदि के मंडपों में बडी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं; परंतु वहां भी कैसे आचरण करना चाहिए इसकी सूझबूझ उन्हें नहीं होती ।
जी । साधु-संतों के मंडप में श्रद्धालु तथा भक्तों को आदर्श आचरण करने का प्रयास करना चाहिए । कुम्भ क्षेत्र में साधु-सन्तों के लिए मंडप बनाए जाते हैं । इन मंडपों में सत्संग (प्रवचन) चलते हैं । उस समय कुछ श्रद्धालु वहां सोए हुए मिलते हैं । सत्संग स्थल पर देवता उपस्थित रहते हैं, इसलिए श्रद्धालु उस स्थान पर न सोएं । यदि आवश्यक हो, तो थके हुए यात्री मंडप के किसी कोने में तथा एक पंक्ति में सोएं । उस समय वे अपनी सामग्री व्यवस्थित रखें ।
अ. साधु-सन्तों के मंडपों में चलाए जा रहे अन्नछत्रों में भोजन करनेवाले कुछ लोग जूठन थाली में छोड देते हैं । अन्न ‘पूर्णब्रह्म’ है तथा उसे व्यर्थ करना पाप है । इसलिए श्रद्धालु जितना आवश्यक है, उतना ही भोजन थाली में लें । अन्नछत्रों में पेयजल का अपव्यय भी नहीं करना चाहिए ।
आ. मंडप और अन्नछत्र स्वच्छ रखें ! : भोजन के पश्चात द्रोण, पत्तल, जूठन तथा अन्य कचरा अन्यत्र न फेंकें । वह कचरापेटी में ही डालें । इससे हम कुम्भ क्षेत्र की पवित्रता बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं ।
५. कुम्भ में आए श्रद्धालुओं को धर्मशिक्षा न होने के कारण देवता या साधुओं का अपमान भी उनसे होता है । इस विषय में आप क्या कहेंगे ?
जी । श्रद्धालुओं से देवता या साधुओं का जाने-अनजाने अपमान होता है, यह अयोग्य है । साधु-सन्त और श्रद्धालुओं का उपहास नहीं करना चाहिए । कुछ यात्री जटाधारी, हठयोगी, नग्न आदि साधुओं तथा मुण्डन कराए श्रद्धालुओं का उपहास अथवा निंदा करते हैं । ऐसा करना निम्न कारणों से अनुचित है । धर्मशास्त्र कहता है कि साधु की निंदा करना महापाप एवं अपराध है । तीर्थक्षेत्र में मुण्डन करना एक विधि है । यह विधि करनेवाले की निंदा करना, धर्मशास्त्र की ही निंदा है, जो पाप है । अनेक माध्यमों से देवताओं का भी अनादर हो रहा है । देवताओं का अनादर रोकने का प्रयास करना एक प्रकार का धर्मपालन ही है । इसके लिए हम क्या कर सकते हैं, यह भी समझ लेंगे ।
अ. देवताओं के चित्रयुक्त उत्पाद (उदा. देवता के चित्रयुक्त मिठाई का डिब्बा, अगरबत्ती आदि) न खरीदें । ऐसे उत्पादों का उपयोग समाप्त हो जाने पर उसके आच्छादन अधिकतर पैरोंतले आते हैं अथवा कचरे के डिब्बे में डाले जाते हैं । साथ ही ऐसे उत्पाद बेचनेवाले का भी इस विषय में प्रबोधन करें ।
आ. देवताओं के चित्र अथवा ‘ॐ’ जैसे धर्मचिन्हयुक्त कपडे न पहनें। अनेक लोग फैशन या भक्ति के नाम पर ऐसे कपडे पहनते हैं; परंतु देवता हमारी आस्था का स्थान है, वे पूजने योग्य हैं । पूजाघर अथवा मंदिर उनका स्थान है । यह छोडकर हम कपडों पर यदि देवताओं के चिन्ह, धर्मचिन्ह का उपयोग करेंगे, तो क्या उसकी पवित्रता रखना हमें संभव है ? इन सभी का विचार कर ऐसे वस्त्र न पहनें और अन्यों का भी प्रबोधन करें ।
इ. आज अनेक जगह देवताओं की वेशभूषा में भीख मांगनेवाले दिखते है । कुम्भ मेले में भी ऐसे पाया जाता है । क्षणभर आप विचार करें, यदि बहुरूपिये ने किसी राजनेता की वेशभूषा कर भीख मांगना शुरू किया, तो उसे कोई भीख मांगने देगा ? तुरंत लोग और पक्ष के कार्यकर्ता भी उसे टोकेंगे, रोकेंगे । फिर देवताओं के विषय में इस प्रकार का अनादर क्यों सहन करते हैं ? ऐसे बहुरूपियों का हमें उद्बोधन करना चाहिए तथा उन्हें वैसा करने से परावृत्त भी करना चाहिए । उद्बोधन करने पर भी देवताओं का अनादर जारी रखनेवालों के विरुद्ध, धार्मिक भावनाएं आहत होने के कारण, पुलिस में शिकायत भी करनी चाहिए । (शेष पृष्ठ १५ पर)
६. हमने अभी तक कुम्भ मेले की पवित्रता न बनाए रखने में श्रद्धालुओं से होनेवाली गलतियां देखी । कर्मफल सिद्धांतानुसार तीर्थस्थलों का पावित्र्य भंग करने से पाप लगता है । इसके संदर्भ मे शास्त्र क्या कहता है ?
१. ‘कुम्भ पर्व के समय पुण्यक्षेत्र में यात्रियों द्वारा कुकर्म होने पर पांचवें नरक का दण्ड मिलता है; क्योंकि जिस क्षेत्र में अधिकतम चैतन्य होता है, वहां किए किसी भी कुकर्म का बडा दण्ड भोगना पडता है ।
२. कुम्भ मेले में यात्रियों द्वारा पवित्रता नष्ट करनेवाले कृत्य करने के कारण, वहां सूक्ष्म रूपी आसुरी शक्तियां बढती हैं तथा जीवों की साधना में बाधाएं आने लगती हैं ।
३. हिन्दू बडी संख्या में कुम्भ पर्व के लिए जाते हैं । कुम्भ पर्व के समान ही देश के विविध तीर्थक्षेत्रों में भी हिन्दू जाते हैं; परन्तु ऐसे पवित्र स्थानों पर जाकर, ‘हम उनकी पवित्रता घटा तो नहीं रहे’, इस ओर कोई ध्यान नहीं देता । ब्रह्मांड पुराण में बताया है कि कुम्भ पर्व के समय नदी में कपडे धोना, बरतन स्वच्छ करना, कचरा फेंकना तथा मल-मूत्र विसर्जन करना आदि १४ प्रकार
के कर्म निषिद्ध हैं । आजकल नदी में लोग साबुन लगाकर भी नहाते हैं । ऐसे कर्म करनेवाले को महापापी माना जाता है तथा उन्हें गोहत्या का पाप लगता है । हम इतनी दूर से कुम्भ पर्व हेतु जाते हैं, तो अधिकाधिक नामजप, ईश्वर का स्मरण, सेवा आदि कृत्य करने चाहिए तथा अनुचित कृत्यों से बचना चाहिए । अन्य कोई ऐसा कर रहा हो, तो उसे भी परावृत्त करने का प्रयास करना चाहिए ।’
कुम्भ क्षेत्र अथवा तीर्थक्षेत्रों में विविध धार्मिक कृत्य किए जाते हैं । वह करनेवाले पुरोहित कई बार अयोग्य पद्धति से विधि करते हैं । सामान्य श्रद्धालु की अपेक्षा होती है कि उनकी विधियां ठीक से हों । तो हम क्या कर सकते हैं ?
कई बार हम देखते हैं पुरोहित विधि करते समय अयोग्य आचरण करते हैं । उन्हें उसके संदर्भ में बताना हमारा कर्तव्य बनता है ।
पुरोहितों को प्रत्येक कृति धर्मशास्त्रीय पद्धति से करने हेतु निवेदन करें । कुम्भ मेले में यात्राविधि, श्राद्ध आदि कर्म करने के लिए पुरोहित आवश्यकता होते हैं । उनकी न्यूनता व श्रद्धालुओं की लक्षणीय उपस्थिति के कारण अपूर्ण ज्ञान रखनेवाले कुछ पुरोहित अपेक्षित विधि कुछ मिनट में ही निपटा देते हैं । फलस्वरूप यजमान को उस धार्मिक कृत्य का परिपूर्ण लाभ नहीं मिलता । इसलिए हम क्या कर सकते हैं, यह भी समझ लेंगे ।
१. विधि के प्रारम्भ से पूर्व पुरोहित से उसे परिपूर्ण करने की विनती करें ।
२. जो पुरोहित उचित ढंग से धार्मिक विधि नहीं करते, उनके संबंध में स्थानीय ‘पुरोहित संघ’ में परिवाद प्रविष्ट करें ।
३. धार्मिक विधि करने से पूर्व पुरोहित से दक्षिणा के संबंध में चर्चा कर लें । साधारणतः धार्मिक विधि पूर्ण होने के पश्चात दक्षिणा बताई जाती है । कुछ यजमानों के पास उतनी राशि न हो, तो अडचन उत्पन्न हो सकती है । अन्य प्रांत में ऐसे प्रसंगों से बचने के लिए धार्मिक विधि करने से पूर्व संबंधित पुरोहित से यह निश्चित कर लें कि उन्हें दक्षिणा कितनी देनी है । ऐसे कुछ प्रयास कर हम धर्महानि रोकने का प्रयास कर सकते हैं ।
कुम्भ पर्व में पुलिस भी होती है । यदि कुछ अयोग्य बर्ताव ध्यान में आए, तो श्रद्धालुओं को क्या करना चाहिए ?
कुम्भ क्षेत्र में कर्तव्य का पालन न करनेवाले पुलिसकर्मियों को उनके कर्तव्य का भान करवाएं । कुम्भ क्षेत्र में बाहर से आए साधु-संतों और श्रद्धालुओं को उचित मार्ग न दिखाना, गुण्डाप्रवृत्तियों को न रोकना, जुआ खेलनेवालों को न रोकना आदि प्रकार की कर्तव्यहीनता कुछ पुलिसकर्मी दिखाते हैं । श्रद्धालु ऐसे कर्तव्यहीन पुलिसकर्मियों को उनके कर्तव्य का भान कराएं । इसके उपरान्त भी पुलिसकर्मी कर्तव्यपालन न कर रहे हों, तो उनके वरिष्ठ अधिकारियों से उनका परिवाद (शिकायत) करें ।
कुल मिलाकर तीर्थक्षेत्र की पवित्रता, वहां की गरिमा, सात्त्विकता बनाकर रखने के लिए हर संभव प्रयास हमें करना चाहिए । अन्यों से भी कुम्भ क्षेत्र में गलत कृत्य न हो, इसलिए भी हमें प्रबोधन और आवश्यक प्रयास करने चाहिए । यह करने हेतु हम सभी को बुद्धि और बल मिले, यही ईश्वर के चरणों प्रार्थना है ।
– सद्गुरु नीलेश सिंगबाळजी, धर्मप्रचारक, हिन्दू जनजागृति समिति
कुम्भ क्षेत्र की सात्त्विकता, चैतन्य, साधु-संतों के साधना-वास्तव्य से बढा तपोबल, इनके कारण ही वहां कुम्भ का आयोजन होता है । यह सात्त्विकता वैसी ही रहे, इसका दायित्व सभी पर है । इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगे ?
जी हां, तीर्थक्षेत्र की सात्त्विकता बनाए रखने का दायित्व प्रशासन सहित कुंभ हेतु आनेवाले श्रद्धालुओं पर भी है । उन्हें कुंभ क्षेत्रों की पवित्रता की रक्षा कर, वहां की सात्त्विकता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए । कुंभ क्षेत्र की पवित्रता और सात्त्विकता की रक्षा हेतु प्रयास करना, स्थानीय पुरोहित, देवालयों के न्यासी व प्रशासन के साथ ही वहां आए प्रत्येक यात्री का भी कर्तव्य है । १. कुम्भ क्षेत्र में आए अनेक लोगों का आचरण ऐसा होता है, जैसे वे किसी पर्यटनस्थल पर पर्यटन करने आए हों । वे आपस में हास-परिहास करना, पश्चिमी वेशभूषा करना, चलचित्र संगीत सुनना, अभक्ष्य भक्षण करना आदि कृत्य करते हैं । ऐसा व्यवहार करने से हम कुम्भ का लाभ कैसे ले पाऐंगे ? लाभ तो होगा नही; परंतु साथ ही तीर्थक्षेत्र की सात्त्विकता कम करने के पाप के भागीदार अवश्य बन सकते हैं । इसलिए हमें अपना आचरण धर्मानुकूल रखना आवश्यक है । तीर्थक्षेत्र जाना भी एक ‘साधना’ है । वह पूर्ण होने के लिए तीर्थक्षेत्र में भावपूर्ण गंगास्नान, देवताओं का दर्शन, दान-धर्म, उपास्यदेवता का नामजप आदि कर अधिकाधिक समय तक ईश्वर से आन्तरिक सान्निध्य बनाए रखना अपेक्षित है । ऐसा करने से गंगास्नान और यात्रा करने का आध्यात्मिक लाभ मिलता है । २. कुम्भ क्षेत्र के पवित्र तीर्थ में स्नान करनेवाले यात्रियों के कुछ कृत्यों से वह तीर्थ प्रदूषित हो जाता है । कुछ लोग प्लास्टिक की थैलियां, सिगरेट के पॅकेट, पुराने अन्तर्वस्त्र आदि वस्तुएं तीर्थस्थान में (नदी या कुण्ड में) डालते हैं । इससे तीर्थ की पवित्रता घटती है । ऐसे कृत्य हमसे न हों, इसलिए तीर्थयात्रियों ने सतर्क रहना चाहिए तथा अन्यों से भी ऐसे कृत्य न हो, इसके लिए सचेत रहना चाहिए । ३. धर्मशास्त्र कहता है कि गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा जैसी पवित्र नदियां प्रदूषित करना एक बडा अपराध है । इसलिए हमें स्नान के समय तीर्थक्षेत्र की पवित्रता की रक्षा के लिए सावधानी बरतना आवश्यक है । पर्वस्नान के समय यात्री ऊंची आवाज में बातें करना, चिल्लाना, एक-दूसरे पर पानी उडाना आदि अयोग्य कृत्य करते है । ऐसे कृत्य न होें, इसलिए भी हमें जागरूक रहना चाहिए । |

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?