
इस प्रसंग में ने कहा, ‘‘कर्नाटक राज्य से आरंभ हुआ ‘हिजाबविरोधी आंदोलन’ कुछ दिन उपरांत राष्ट्रीय विषय बना । इसमें कुछ मुसलमान छात्राओं ने ‘हम हिजाब पहनेंगे ही’, इस मांग को लेकर कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । इस याचिका के पक्ष में लडने के लिए अनेक अधिवक्ता खडे रहे, तो सरकार के पक्ष में और विरोध में लडने के लिए अत्यंत अल्प संख्या में अधिवक्ता थे । मेरे अनेक अधिवक्ता मित्रों के अनुरोध पर मैने यह अभियोग लडने का निर्णय लिया । इस संदर्भ में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय अत्यंत अभ्यासपूर्ण था । ऐसा होते हुए भी मुसलमान याचिकाकर्ताओं ने उसे नहीं माना और वे उस निर्णय के विरोध में सर्वाेच्च न्यायालय चले गए । सर्वाेच्च न्यायालय में अभियोग लडने के लिए बडी मात्रा में पैसों की आवश्यकता होती है । इतना खर्चा करने की मुसलमान याचिकाकर्ताओं की तैयारी थी, इससे इसके पीछे का षड्यंत्र ध्यान में आता है । उसके उपरांत कर्नाटक के हिन्दुओं ने अभूतपूर्व संगठन दिखाकर उसका उत्तर दिया । हिन्दुओं ने उनके उत्सवों के समय में देवालयों के परिसर में अन्य धर्मियों को दुकानें न लगाने देने का निर्णय लिया । न्यायालय का निर्णय न माननेवालों को कर्नाटक राज्य के हिन्दुओं ने अच्छा पाठ पढाया है ।’’
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