१७ मई से ‘अधिक मास’ का आरंभ हो रहा है । उस उपलक्ष्य में…

१. ‘अधिक मास’ अथवा ‘पुरुषोत्तम मास’ क्या होता है ?

‘ज्योतिषशास्त्र में सौर पंचांग के अनुसार एक वर्ष में ३६५ दिन, १५ घटी, ३१ पल एवं ३० विपल होते हैं, जबकि चंद्रमान के अनुसार एक वर्ष में ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल एवं २३ विपल होते हैं । इस प्रकार हमें यह दिखाई देता है कि एक वर्षचक्र के सौर एवं चंद्र वर्ष में अनुमानित ११ दिन का अंतर होता है । इसलिए हिन्दू कालगणना में प्रत्येक ३ वर्ष से एक चंद्रमास की पुनरावृत्ति कर एक अतिरिक्त मास जोडा जाता है । इससे सौर एवं चंद्र वर्ष के मध्य का यह अंतर नष्ट होता है अथवा अल्प हो जाता है । इस अतिरिक्त मास को ‘अधिक मास’ अथवा ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है । इससे सौर वर्ष एवं चंद्र वर्ष के मध्य एक प्रकार का सुसंवाद बनाए रखा जाता है तथा उससे मानवीय समाज को समय के संदर्भ में सूर्यमान एवं चंद्रमान, इन दोनों कालखंडों का उचित लाभ मिलता रहता है ।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य हमारे आत्मा के तथा चंद्रमा हमारे मन के कारक होते हैं । इस प्रकार से आत्मा (परलोक अर्थात मृत्योपरांत का जीवन) एवं मन (इहलोक अर्थात वर्तमान विश्व) के मध्य सुसंवाद बना रहा है तथा मनुष्यजाति को जीवन में दोनों प्रकार की बातें प्राप्त होती रहती हैं ।
२. अधिक मास शुभ होता है अथवा अशुभ ?
अब प्रश्न यह उठता है कि अधिक मास शुभ होता है अथवा अशुभ ? इस संदर्भ में एक बात ध्यान में लेनेयोग्य है । सभी ४ युग, १२ मास, ६ ऋतुओं एवं सभी दिनों के कारण देवता हैं । जब कालगणना में अधिक मास का प्रयोजन किया गया, तब उसे ‘मल मास’ कहकर तुच्छ माना गया, जिसका अर्थ अस्वीकारणीय एवं अमान्य, यह होता है । इससे अधिक मास अत्यंत दुखी हुआ । उसने भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर प्रार्थनापूर्वक अपना दुःख व्यक्त किया । भगवान श्रीविष्णु ने अधिक मास को दुःखी न होने के लिए कहा । वे कहने लगे, ‘मनुष्यों में श्रेष्ठ होने के कारण मेरा एक नाम ‘पुरुषोत्तम’ है तथा आज से आप ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जाने जाओगे । इस पुरुषोत्तम मास में किए जानेवाले शांतिकर्म एवं आध्यात्मिक कर्म मुझसे संबंधित माने जाएंगे तथा वे अनंत पुण्यवान एवं श्रेष्ठ होंगे ।’
३. अधिक मास में क्या करना चाहिए ?
अ. व्यावहारिक दृष्टिकोण से कर्माें के २ प्रकार होते हैं,
१. ‘पौष्टिक कर्म’ अर्थात गृहस्थी के व्यवहार से संबंधित कर्म
२. शांति कर्म अर्थात पारलौकिक अथवा धार्मिक-आध्यात्मिक बातों से संबंधित कर्म । उसमें उपवास, ध्यान, उपासना एवं निष्कम यज्ञयाग का समावेश है ।
आ. अधिक मास में तीर्थयात्रा करें तथा गंगा में स्नान करें ।
इ. महापुरुषों एवं संतों के आंतरिक सान्निध्य में रहकर उनका सत्संग प्राप्त करें ।
ई. उपासना एवं साधना के विषय में अध्ययन करें ।
उ. अधिक मास में दान का विशेष महत्त्व माना गया है ।
ऊ. धर्मकार्य एवं मुमुक्षत्व (ईश्वर के प्रति लगन) में रुचि होनी चाहिए ।
ए. अधिक मास में दीपदान एवं ध्वजादान करें ।
ऐ. श्रीराम कथावाचन, भागवत कथावाचन, श्रीमद्भगवद्गीता में समाहित पुरुषोत्तम अध्याय नामक १४वें अध्याय का पाठ एवं सत्संग करना पुण्यकारी माना जाता है ।
ओ. अधिक मास में भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष पूजा करें तथा अधिक से अधिक ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ जप करें ।
४. अधिक मास में क्या नहीं करना चाहिए ?
अ. अधिक मास में गृहस्थी के कर्माें से संबंधित शुभकार्य अर्थात विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन, मुंडन इत्यादि मांगलिक कार्य न करें ।
आ. अशुद्ध आचरण टालें ।
इ. अनुचित खाद्यपदार्थ एवं पीने के लिए अयोग्य पदार्थाें का सेवन न करें ।
ई. अधिक मास में नए काम का आरंभ न करें । निष्काम भाव से समाजोपयोगी कार्य करने पर कोई बंधन नहीं है ।
उ. वस्त्र, आभूषण, घर, दुकान, वाहन इत्यादि न खरीदें । इस मास के मध्य में कोई शुभ मुहूर्त हो, तो ज्योतिष का सुझाव लेकर आभूषण खरीदें जा सकते हैं ।
५. इस वर्ष के अधिक मास के विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र
इस वर्ष अधिक मास के स्वरूप में क्रम के अनुसार ज्येष्ठ मास की (शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष + अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष + अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष + शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष) पुनरावृत्ति हो रही है । अधिक मास के माध्यम से भगवान श्रीविष्णु के विशेष आशीर्वाद होते हैं । इस ज्येष्ठ मास में ही भगवान श्रीविष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा करने से सुख-समृद्धि बढती है ।
६. ज्येष्ठ मास में किए जानेवाले प्रमुख उपवास एवं त्योहार
अ. गंगा दशहरा : इस दिन गंगामाता पृथ्वी पर अवतरित
हुईं । इसलिए माना जाता है इस दिन गंगास्नान एवं दान देने से पापों से मुक्ति मिलती है ।
आ. निर्जला एकादशी : इस तिथि को निराहार रहकर अथवा बिना पानी पिए व्रत करने की प्रथा है, जो पूरे वर्ष में आनेवाली सभी एकादशियों का फल प्रदान करती है ।
इ. वटसावित्री व्रत : इस दिन विवाहित स्त्रियां उनके पति को दीर्घायु प्राप्त हो, इसके लिए वटवृक्ष की पूजा करती हैं ।
ई. शनि जयंती : इसी ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन कर्म के अधिपति भगवान शनिदेव का जन्म हुआ था; इसलिए यह दिन ‘शनि जयंती’ के रूप में मनाया जाता है ।
उ. बडा मंगल : इस मास में आनेवाला मंगलवार ‘बडा मंगल’ के रूप में मनाया जाता है, जो हनुमानजी को समर्पित है । इस दिन प्रभु श्रीराम एवं हनुमानजी की पूजा करने से जीवन में सुख एवं शांति मिलती है ।
ऊ. जलसेवा एवं दान का पुण्य : इस मास में गर्मी तीव्र होती है । इसलिए पथिकों को ठंडा पानी देना अर्थात ‘प्याऊ’ चलाना, शर्बत का वितरण करना, पंखे एवं सत्तू का दान देना विशेष पुण्यकारक माना जाता है । इसके साथ ही इस मास में सूर्य को जल अर्पण करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है ।
अधिक मास आत्मशुद्धि एवं परोपकार के लिए विशेष काल होता है । इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि इस वर्ष का ज्येष्ठ अधिक मास आध्यात्मिक साधना, भक्ति, व्रत, उपवास, त्योहार, स्वास्थ्य एवं परोपकार इत्यादि के दृष्टिकोण से विशेष लाभकारी है ।
– आचार्य डॉ. अशोक कुमार मिश्र, सभापति, एशिया चैप्टर, विश्व ज्योतिष महासंघ, पाटलीपुत्र, बिहार.
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