‘हिन्दू एवं राष्ट्र हितैषी’ लेखन !
१. जम्मू-कश्मीर ऋषि-मुनियों एवं योद्धाओं की भूमि
‘कश्मीर में ‘रामराधन’ नामक एक स्थान है । वहां भगवान परशुराम ने साधना की थी । वहां से उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं को गोमंतक में बसाया । यह १० सहस्र वर्षाें से अधिक काल का इतिहास रहा होगा, जिसे महर्षि व्यास ने सर्वप्रथम लिखा । ऋग्वेद में भी उसका वर्णन है । कश्मीर की वितस्ता नदी का वर्णन है । उसमें कहा है, ‘भारत में कुल मिलाकर जितने तीर्थस्थल होंगे; उतने तीर्थस्थल कश्मीर में हैं तथा उतने ही वितस्ता में एकत्रित हैं ।’ कश्मीर में महामेश्वाचार्य, अभिनव गुप्त जैसे अनेक महर्षि हुए । कश्मीर में केवल महर्षियों ने ही नहीं, अपितु योद्धाओं ने भी जन्म लिया है ।
२. कश्मीर में हिन्दू राजाओं द्वारा इस्लामी आक्रांताओं की पराजय
कश्मीर पर जब धर्मांध आक्रांताओं का आक्रमण हुआ, उस समय वर्ष ७१२ में महाराजा ललितादित्य मुक्तपीर ने सर्वप्रथम उन्हें पराजित किया । मोहम्मद गजनी जब भारत में आक्रमण करने आया, तब वह पहले कश्मीर के महाराज संग्राम के राज्य में आया । मोहम्मद गजनी ने भारत पर १७ बार आक्रमण किया, उन सभी में उसकी बार-बार पराजय हुई । वह सर्वप्रथम कश्मीर में ही पराजित हुआ था; परंतु दुर्भाग्यवश ऐसी पराक्रमी भूमि पर आज एक भी कश्मीरी हिन्दू नहीं है । जब-जब इस्लाम ने भारत पर पर आक्रमण किया, तब-तब उन्होंने पहले भारतीय संस्कृति पर आक्रमण किया । वे हमारे सामने अप्रत्यक्ष रूप से सूफी एवं फकीर के रूप में आए । जम्मू-कश्मीर के राजा ने उन्हें वहां शरण दी तथा उन्होंने उनका इस्लाम यहां फैलाया । १५वीं शताब्दी में पंडित जौनराज ने उनके ‘राज्यतरंगनी’ ग्रंथ में लिखा है कि जिस समय मुसलमानों ने कश्मीर पर आक्रमण किया, तब उन्होंने बडे स्तर पर कृषि को हानि पहुंचाई तथा मंदिरों को नष्ट किया ।
परिचय

देहली के श्री. विठ्ठल चौधरी ‘यूथ फॉर पनून काश्मीर’ के अध्यक्ष हैं । वे एक व्यावसायिक हैं तथा एक सूचना-प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रबंध निदेशक हैं । वे स्वयं कश्मीरी हिन्दू हैं । उन्होंने स्वयं अपनी जन्मभूमि से दूर रहकर जीवन का कटु अनुभव लिया है
३. दल सरोवर के ‘बटमजार’ में प्रतिदिन १० सहस्र हिन्दुओं का किया गया नरसंहार
दल सरोवर (डल लेक) पर्यटकों में लोकप्रिय स्थान माना जाता है । दल सरोवर का पहले ‘सुरेश्वरी’ नाम था । इस दल सरोवर के स्थान पर ‘बटमजार’ (जहां कश्मीरी हिन्दुओं को मारा जाता है) नामक स्थान है । उस स्थान पर एक दिन में १० सहस्र से अधिक कश्मीरी पंडितों की हत्या की जाती थी । अब तक कश्मीरी हिन्दुओं को वहां से ७ बार पलायन करना पडा है । वर्ष १३७९, १५०६, १५८५ तथा उसके उपरांत विगत १०० वर्षाें में उन्हें यहां से ३ बार विस्थापित होना पडा । वर्ष १९८६ में हुए विस्थापन का मैं स्वयं एक पीडित हूं ।
निरंतर ७०० वर्षाें तक नरसंहार होने पर भी वर्ष १९४१ की जनगणना के अनुसार कश्मीर में हिन्दुओं की जनसंख्या १४.१ प्रतिशत थी; परंतु आज वह केवल ०.००१ प्रतिशत ही रह गई है । शेष १४ प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या का क्या हुआ ? यह प्रश्न है । कश्मीर से हिन्दुओं का निष्कासन होना भारत में इस्लाम को स्थापित करने का एक प्रयोग था तथा दुर्भाग्यवश उनका यह प्रयोग सफल रहा । १०० प्रतिशत इस्लामीकरण हो चुका कश्मीर भारत का पहला राज्य बन गया है ।
४. मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृहमंत्री पद के कार्यकाल में कश्मीर में सैकडों मंदिरों का विध्वंस
अफ्रीका में एक सुवचन है, ‘कुछ सत्य इतने सत्य होते हैं कि वे हमें झूठ लगने लगते हैं । (सम ट्रुथ आर सो ट्रू, दे अपियर टू बी लाई)’ । कश्मीर के नरसंहार की भी यही स्थिति है । इसका कुछ अनुमान ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखने पर होता है । वर्ष १९८६ में मुफ्ती मोहम्मद सईद ने हिन्दुओं के सैकडों मंदिर तोडे । उसके उपरांत वर्ष १९९० में उन्हें भारत का गृहमंत्री बनाया गया । उनके कार्यकाल में कश्मीर के अनंतनाग में ३०० से अधिक मंदिर जला दिए गए । उसके उपरांत सईद की पुत्री रूबिया सईद का अपहरण किया गया । उसे आतंकियों के चंगुल से छुडाने के लिए उन्होंने अलगाववादियों को छोडा । उसके उपरांत अलगाववाद बढता गया । वास्तव में उसके लिए ही अपहरण का झूठा नाटक
किया गया । भारत का राजतंत्र आज भी कश्मीर के नरसंहार को नरसंहार नहीं मानता; क्योंकि देश में ऐसा कोई भी कानून नहीं है, जिसके आधार पर इस नरसंहार के विषय में अभियोग प्रविष्ट किया जा सके ।’
– श्री. विठ्ठल चौधरी, अध्यक्ष, ‘यूथ फॉर पनून कश्मीर’, देहली
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