श्रीरामजन्मभूमि के पश्चात हिन्दुओं की द्वितीय बड़ी विजय !
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ का महत्वपूर्ण निर्णय
मुसलमानों को अन्य स्थान पर भूमि प्राप्त होने हेतु सरकार से निवेदन करने का परामर्श
ब्रिटेन के संग्रहालय में स्थित श्री वाग्देवी की मूर्ति को प्रत्यावर्तित करने (वापस लाने) हेतु केंद्र सरकार को निर्देश
इंदौर (मध्य प्रदेश) – मध्य प्रदेश के धार स्थित प्रसिद्ध भोजशाला हिन्दुओं की श्री वाग्देवी अर्थात श्री सरस्वती देवी का मंदिर है, ऐसा निर्णय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने १५ मई को दिया । खंडपीठ ने कहा, ‘यद्यपि कालचक्र के प्रभाव में इस स्थान पर कुछ नियम आरोपित किए गए थे, तथापि इस स्थान पर पूजा का स्थान होने की निरंतरता दृष्टिगोचर हुई है । इस स्थल पर प्राप्त ऐतिहासिक सामग्रियां यह सिद्ध करती हैं कि यह राजा भोज से संबंधित संस्कृत शिक्षा का एक केंद्र था । वह धार में देवी श्री वाग्देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर के अस्तित्व को प्रदर्शित करती हैं । अतः इस क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर युक्त ‘भोजशाला’ ही स्वीकार किया जा रहा है ।’
BIG ❗️
Shri Vagdevi Temple of Bhojshala belongs to Hindus only…!
Major verdict by the Indore Bench of the Madhya Pradesh High Court
Judiciary suggests Muslims to request government for an alternative place elsewhere
Directions to the Central Government to bring back the… pic.twitter.com/md0Z9Mzlyr
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 15, 2026
मुसलमान इसे ‘कमाल मौला मस्जिद’ कह रहे थे । न्यायालय ने मुसलमान पक्ष को मस्जिद के लिए सरकार से पृथक भूमि की मांग करने का निर्देश दिया है । हिन्दू पक्ष की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने न्यायालय में पक्ष प्रस्तुत किया था । उन्होंने निर्णय के पश्चात ‘धर्म की विजय हो तथा अधर्म का नाश हो’ ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।
Today the Indore High Court has delivered a historic verdict, the Court has granted the Hindu side the right to worship and has recognised the Bhojshala complex as belonging to Raja Bhoj.
Dharm ki jay ho, Adharm ka Naash ho🚩
Jai Maa Vaag Devi🙏🏻— Vishnu Shankar Jain (@Vishnu_Jain1) May 15, 2026
इंदौर हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला राम मंदिर मामले के बाद दूसरा बड़ा निर्णय माना जा रहा है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष के इस तर्क को स्वीकार किया कि पूरा परिसर राजा भोज द्वारा निर्मित माँ सरस्वती को समर्पित मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा केंद्र था। pic.twitter.com/jobB6JuXSl
— Vishnu Shankar Jain (@Vishnu_Jain1) May 15, 2026
अब काशी एवं मथुरा शेष हैं – हिन्दू जनजागृति समिति
मुंबई – भोजशाला के संबंध में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक निर्णय केवल एक वास्तु की विजय नहीं है, अपितु शतकों से दबाए गए ऐतिहासिक सत्य की तथा विदेशी इस्लामी आक्रांताओं द्वारा अतिक्रमित किए गए मंदिरों के मुक्ति की लडाई की भव्य विजय है । भोजशाला की मुक्ति की लडाई आज भले ही सफल रही है , तब भी इस संघर्ष में सबसे बडा सहभाग भोजशाला मुक्ति आंदोलन के प्रमुख श्री. नवलकिशोर शर्मा एवं हिन्दू जनजागृति समिति का था । समिति इस निर्णय का सहर्ष स्वागत करती है तथा …अब काशी-मथुरा शेष हैं !’ (अब काशी एवं मथुरा मुक्त होने शेष हैं), यह संकल्प घोषणा कर रही है ।
🚩 The wait for Vagdevi ends!
After decades of struggle, the Madhya Pradesh High Court has affirmed that Bhojshala is the temple of Maa Vagdevi Saraswati, an ancient centre of Sanskrit learning linked to Raja Bhoj.
The Court relied on ASI surveys, archaeological evidence, and… pic.twitter.com/LaTGYeP7Sq
— HinduJagrutiOrg (@HinduJagrutiOrg) May 15, 2026
हिन्दू जनजागृति समिति का आंदोलन तथा हिन्दू अधिवेशन की फलश्रुति ।
धार की भोजशाला – यहां भोजशाला की मुक्ति के लिए हिन्दू जनजागृति समिति ने केवल सडक पर उतरकर ही आंदोलन नहीं किए, अपितु राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनजागृति की । गोवा में होनेवाले ‘वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव’ (अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन) के राष्ट्रीय व्यासपीठ से प्रतिवर्ष इस संदर्भ में कानूनी एवं नीतिजन्य प्रस्ताव पारित कर इस लडाई की दिशा सुनिश्चित की । पूरे देश के हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों ने मध्यप्रदेश सरकार एवं केंद्र सरकार से इस विषय में निरंतर सहायता मांगी थी । आज न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय के कारण करोडों हिन्दुओं की भावनाओं को तथा समिति के प्रदीर्घ आंदोलन को न्याय मिला है ।
आक्रांताओं का अतिक्रमण हटाकर काशी-मथुरा की लडाई निरंतर लडी जाएगी ।
इस अवसर पर समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. रमेश शिंदे ने स्पष्ट किया कि भारत के हिन्दुओं के केवल एक-दो मंदिर ही अतिक्रमित नहीं हुए हैं ।
🚩 The Bhojshala verdict is the result of years of relentless agitation, awareness campaigns, and Hindu unity led by @HinduJagrutiOrg – @Ramesh_hjs
From protests on the streets of Dhar to resolutions at the Vaishvik #HinduRashtraMahotsav_Goa in Goa, the movement kept the issue… pic.twitter.com/ZO71zFNvrU
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 15, 2026
विदेशी आक्रांताओं एवं धार्मिक कट्टरतावादियों ने हिन्दुओं की सहिष्णुता का लाभ उठाकर हिन्दुओं के सहस्रों मंदिर पर अतिक्रमण किए तथा उस पर स्वयं का अनैतिक अधिकार स्थापित किया । अयोध्या एवं धार (भोजशाला) के निर्णयों ने यह सिद्ध किया है कि असत्य का आवरण लंबे समय तक टिक नहीं सकता । अब यह समय आ चुका है कि काशी के ज्ञानवापी मंदिर से लेकर मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि तक के सभी आक्रमित क्षेत्र मुक्त होने चाहिए ।

हम निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे ! – मुसलमान पक्ष
निर्णय के पश्चात मुसलमान पक्ष के अधिवक्ता अर्शद वारसी ने कहा कि इस निर्णय से हम संतुष्ट नहीं हैं । इसके विरुद्ध हम सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे । हम निर्णय की पूर्ण प्रति प्राप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं । न्यायालय ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तथ्यों को स्वीकार करके ही यह निर्णय दिया है, ऐसा भी उन्होंने कहा ।
(और इनकी सुनिए…) ‘बाबरी प्रकरण के निर्णय से साम्यता, सर्वोच्च न्यायालय आदेश निरस्त करेगा !’ – असदुद्दीन ओवैसी
🚩 “The Supreme Court will overturn this order. Glaring
similarities with the Babri Masjid case” – says AIMIM MP Asaduddin OwaisiOwaisi reacted to the Bhojshala matter by expressing hope that the Supreme Court would reverse the order, claiming that it resembles the Babri case… pic.twitter.com/Pc7TtDeLO5
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 15, 2026
हमें आशा है कि सर्वोच्च न्यायालय इसमें सुधार करेगा तथा इस आदेश को निरस्त करेगा । बाबरी प्रकरण के निर्णय से इसमें स्पष्ट साम्यता परिलक्षित हो रही है, ऐसी प्रतिक्रिया ए.आई.एम.आई.एम. के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ‘एक्स’ पर व्यक्त की । (सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीरामजन्मभूमि प्रकरण में हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय दिया था, यह सर्वविदित है । अतः यद्यपि मुसलमान इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय जाएं, तथापि न्यायालय हिन्दुओं के पक्ष में ही निर्णय देगा, यह पुरातत्वीय साक्ष्यों से स्पष्ट है ! – संपादक)
न्यायालय द्वारा प्रस्तुत सूत्र
मंदिर का प्रबंधन किस प्रकार किया जाए ? यह केंद्र सरकार सुनिश्चित करे !
यह ऐतिहासिक एवं संरक्षित स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है । भोजशाला मंदिर का प्रबंधन किस प्रकार किया जाए, यह केंद्र सरकार तथा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग सुनिश्चित करें । वर्ष १९५८ के अधिनियम के अनुसार इस संपत्ति का संपूर्ण प्रबंधन पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन रहेगा ।
धार-भोजशाला मामले में माननीय इंदौर हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया, ए.एस.आई. के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को आंशिक रूप से रद्द किया और यह भी माना कि भोजशाला परिसर राजा भोज का है। pic.twitter.com/Irwm5Fiopi
— Vishnu Shankar Jain (@Vishnu_Jain1) May 15, 2026
नमाज पढने का अधिकार निरस्त
न्यायालय ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के वर्ष २००३ के आदेश को भी निरस्त कर दिया । इस नियम के कारण हिन्दुओं को भोजशाला में पूजा करने के अधिकार से वंचित किया गया था । साथ ही मुसलमानों को प्रार्थना करने का अधिकार देने वाले आदेश को भी न्यायालय ने निरस्त कर दिया ।
धार में वृहत सुरक्षा व्यवस्था !
निर्णय की पृष्ठभूमि में इंदौर तथा धार जिला प्रशासन द्वारा वहां व्यापक पुलिस बल तैनात किया गया था । निर्णय का दिन शुक्रवार होने के कारण भोजशाला में दोपहर के समय मुसलमान सदैव की भांति नमाज पढने आए थे । इस समय प्रशासन की ओर से लोगों से शांति बनाए रखने का आह्वान किया गया था । पुलिस अधीक्षक ने सूचित किया कि धार नगर की सुरक्षा १२ स्तरों पर की गई है । आरक्षित पुलिस बल और द्रुत कार्य बल (रैपिड एक्शन फोर्स) को सतर्क रखा गया है ।
हिन्दुओं को थी मंगलवार को पूजा करने की अनुमति
वर्ष २००३ से यहां प्रत्येक मंगलवार एवं वसंत पंचमी को हिन्दुओं को पूजा करने की, तथा शुक्रवार को मुसलमानों को यहां नमाज पढने की अनुमति प्रदान की गई थी । अन्य दिनों में यह परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता है । वर्ष २०१३ तथा २०१६ में वसंत पंचमी एवं शुक्रवार एक ही दिन आने के कारण यहां तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी ।
न्यायालय में हुआ वाद-विवाद (युक्तिवाद)
१. हिन्दू पक्ष की ओर से कहा गया था कि भोजशाला पर ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट १९९१’ (उपासना स्थल अधिनियम) लागू नहीं होता । यह पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है । प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम १९५१ की सूची में भोजशाला का नाम अंकित है । वर्ष २०२४ में अधिवक्ता श्री. अश्विनी उपाध्याय के प्रकरण में दिए गए निर्णय को भोजशाला प्रकरण में लागू नहीं किया जा सकता ।
२. ७ अप्रैल २००३ के दिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रसारित आदेश को निरस्त करने की मांग की गई थी । न्यायालय से प्रार्थना की गई कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निश्चित करके इसे पूर्णतः हिन्दू समाज को सौंप दिया जाए । इससे देवी सरस्वती की पूजा तथा हवन वर्षभर निर्बाध रूप से संपन्न हो सकेगा ।
३. मुसलमान पक्ष की अधिवक्ता शोभा मेनन ने न्यायालय में कहा कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है अथवा जैनशाला है ? यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है । विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप निश्चित करने का अधिकार दीवानी न्यायालय को है । उच्च न्यायालय अनुच्छेद २२६ के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार में सुनवाई कर रहा है ।
४. जैन समाज ने कहा कि जिस प्रतिमा को श्री वाग्देवी का बताया जा रहा है, वह जैन समाज की आराध्य देवी अंबिका की है । सिहोर स्थित देवी अंबिका के मंदिर में भोजशाला में प्राप्त मूर्ति के सदृश ही मूर्ति है । इसे जैन तीर्थस्थल घोषित किया जाना चाहिए ।
न्यायिक संघर्ष का घटनाक्रम
वर्ष २०२२ में रंजना अग्निहोत्री एवं अन्यों ने ‘हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की ओर से उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निश्चित करने तथा हिन्दू समाज को पूर्ण अधिकार देने की मांग की ।
याचिका में नियमित पूजा-अर्चना करने का अधिकार, परिसर में नमाज पढने पर प्रतिबंध, न्यास (ट्रस्ट) की स्थापना तथा ब्रिटिश संग्रहालय में रखी श्री वाग्देवी की मूर्ति को वापस लाने जैसी मांगें सम्मिलित हैं ।
न्यायालय के आदेशोपरांत पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वेक्षण
वर्ष २०२४ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भोजशाला परिसर का ९८ दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था । तत्पश्चात २३ जनवरी २०२६ को वसंत पंचमी के दिन सर्वोच्च न्यायालय ने दिनभर पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी थी । उच्च न्यायालय में ६ अप्रैल से नियमित सुनवाई प्रारंभ हुई, जो १२ मई तक चली ।
हिन्दू पक्ष द्वारा प्रस्तुत तर्क
हिन्दू पक्ष की ओर से अधिवक्ताओं ने भोजशाला को श्री सरस्वती माता का मंदिर एवं प्राचीन विद्या का केंद्र बताते हुए ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण, शिलालेखों, स्थापत्य अवशेषों तथा वसंत पंचमी को पूजा करने की परंपरा का संदर्भ दिया ।
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने परमार राजा भोज के ‘समरांगण सूत्रधार’ ग्रंथ का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजशाला की संरचना उसमें वर्णित मंदिर निर्माण के मानकों के अनुरूप है ।
मुसलमान पक्ष ने सर्वेक्षण प्रतिवेदन पर उठाए प्रश्नचिह्न
मुसलमान पक्ष ने न्यायालय में तर्क प्रस्तुत किया कि यह परिसर दीर्घकाल से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में है तथा धार्मिक स्वरूप निश्चित करने का अधिकार दीवानी न्यायालय को है ।
अधिवक्ता एवं कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण प्रतिवेदन (रिपोर्ट) पर प्रश्नचिह्न उपस्थित करते हुए कहा कि सर्वेक्षण के समय उपलब्ध कराई गई छायाचित्र (फोटोग्राफ्स) तथा वीडियोग्राफी स्पष्ट नहीं थी । अयोध्या प्रकरण के विपरीत भोजशाला में कोई स्थापित मूर्ति वर्तमान में विद्यमान नहीं है ।
भोजशाला का इतिहास![]() इस संरचना का मूल ११ वीं शताब्दी में परमार वंश के महान राजा सम्राट भोज (वर्ष १०००-१०५५) के शासनकाल में है । राजा भोज विद्या के महान आश्रयदाता थे । उन्होंने धार में एक भव्य महाविद्यालय (संस्कृत विद्यालय) तथा सरस्वती मंदिर की स्थापना की थी, जहां सुदूर क्षेत्रों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे । १४ वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी तथा उसके पश्चात मालवा के मुसलमान सुल्तानों ने इस परिसर को अपने नियंत्रण में ले लिया । वर्ष १४०१ में दिलावर खान गौरी ने एवं तत्पश्चात वर्ष १५१४ में महमूद शाह खिलजी ने यहां के मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया तथा मंदिर के स्तंभों एवं सामग्रियों का उपयोग करके इसकी संरचना को परिवर्तित कर दिया । |






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