ग्रंथवाचन एवं ग्रंथों के लिए चिन्हित कतरनों से सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ध्यान में आया ईश्वरत्व !

सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ८४वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में…

अनेक लोगों को उनके द्वारा पढे गए लेखन से महत्त्वपूर्ण सूत्रों को अलग निकालकर रखने की तथा कतरनों को संदर्भ के रूप में संजोकर रखने की आदत होती है । उससे उनके गुण भी प्रकट होते हैं; परंतु इससे केवल ईश्वर ही अन्यों को अनुभूति दे सकते हैं । इस सेवा के माध्यम से अन्यों में गुणवृद्धि करनेवाले तथा उन्हें चैतन्य प्रदान करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमात्र हैं ।

१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा पढे हुए सैकडों ग्रंथ !

अध्यात्मशास्त्र के प्रति जिज्ञासा के कारण सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने आज तक सैकडों आध्यात्मिक ग्रंथ पढे । उसके साथ ही ‘यह ज्ञान सभी साधकों को भी मिले, इन ग्रंथों को पढने में साधकों का समय व्यर्थ न जाए तथा साधकों को प्रत्येक विषय का ज्ञान एक ही स्थान पर उपलब्ध हो’; इस उद्देश्य से उन्होंने उनके द्वारा पढे गए प्रत्येक ग्रंथ के लेखन को चिन्हित कर चयन कर रखा तथा उसे सनातन के ग्रंथों में प्रकाशित किया । अभी भी उनका यह कार्य चल रहा है । उनके द्वारा पढे गए ग्रंथों का विस्तृत विवरण आगे दिए अनुसार है ।

पढे हुए मासिक (पाक्षिक + मासिक + त्रैमासिक) : ५३५६

समाचार-पत्र (दैनिक + साप्ताहिक) : २९०

पुस्तकें : ९७० (इसमें छोटे, मध्यम, बडे एवं विशेषांकों की संख्या समाविष्ट की गई है ।)

२. साधकों का विचार करना

२ अ. सभी का समय बचाना : अन्य ग्रंथ पढते समय उन्होंने सदैव मासिकों को प्रधानता दी । उनका कहना था कि मासिक के लिए लेख लिखते समय लेखक अनेक संदर्भाें का उपयोग कर तथा स्थान की सीमा के कारण उसके पास उपलब्ध ज्ञान को न्यूतनम शब्दों में प्रस्तुत करता है, जिससे हमें अनेक बडे ग्रंथ पढने नहीं पडते । उस मासिक से आवश्यक एवं सूत्रबद्ध लेखन हमें मिलता है ।

२ आ. चिन्हित करने की पद्धति में भी अन्यों का विचार : लेखन को चिन्हित करते समय भी वे आगे जाकर उसका टंकण करनेवाले, संकलन करनेवाले तथा संकेतांक (कोडिंग) देनेवालों का समय बचे, इसका विचार करते हैं ।

१. पूरे लेखन में उन्हें जो लेखन आवश्यक लगता है, वे केवल उस पर ही कोष्टक बनाते हैं । बीच के कुछ शब्द अथवा पंक्तियां अनावश्यक लगने पर वे उन पर काट मार देते हैं ।

२. छपे हुए लेखन में व्याकरण की चूकें हों, तो उन पर भी उचित क्या है, यह चिन्हित किया होता है; जिससे टंकण करनेवाले को ‘क्या उचित है’, यह देखने की आवश्यकता न पडे ।

३. लेखन को शीर्षक भी दिया होता है । उससे संकलनकर्ता को यह ध्यान में आता है कि ‘हमारे नियतकालिकों की अथवा ग्रंथों की दृष्टि से उस लेखन की दिशा कैसी होनी चाहिए ?’

४. लेखन को दैनिक में लेना है, ग्रंथ में लेना है अथवा केवल संग्रह के लिए रखना है’, इसकी भी प्रविष्टि होती है । उससे भी संकलनकर्ता के यह ध्यान में आता है कि ‘लेखन का संकलन कैसे करना है ।’

५. संबंधित लेखन को कौन-से विषय के संबंध में लेना है, इसका संकेतांक भी वे उस पर लिख देते हैं । उससे संकेतांक देनेवाले साधकों को उसका वर्गीकरण करना सुलभ होता है ।

‘आचारधर्म’ विषय पर आधारित ग्रंथ के मुखपृष्ठ की संकल्पना के रूप में परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा बनाया गया चित्र (वर्ष २००६’

३. साधकों में गुणवृद्धि करना

टंकण करना, चिन्हित किए अनुसार सब लेखन आया है न, इसकी जांच करना, संकलन करना जैसे अनेक स्तर होते हैं । उन्होंने प्रत्येक चरण के साधक द्वारा किया लेखन पहले वह सेवा करनेवाले साधक को अध्ययन के लिए देने की पद्धति बनाई है । इसके कारण साधकों को स्वयं की चूकें ढूंढने और आगे के लेखन को और अच्छा करने की आदत पड जाती है । इससे पहले केवल टंकण करनेवाला साधक आगे जाकर संकलन करने के स्तर तक पहुंच जाता है ।

४. सेवा करनेवाले साधकों को हुई अनुभूतियां

४ अ. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी साक्षात ईश्वर ही हैं, इसलिए उनके द्वारा स्पर्श की गई वस्तुओं को दैवीय सुगंध आता है । इस लेखन के माध्यम से साधकों को उनका अस्तित्व अनुभव होता है तथा भाव जागृत होता है ।

४ आ. गुरुदेवजी द्वारा चिन्हित लेखन हाथ में लेने पर एक साधिका को सुगंध की अनुभूति होना, भावजागृति होना, परात्पर गुरुदेवजी का अस्तित्व अनुभव होना जैसी अनुभूतियां होती थीं । उससे साधिका को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती थी ।

४ इ. साधिका के आस-पास सुरक्षा-कवच तैयार करना : एक ग्रंथ के लेखक द्वारा ग्रंथ में लिखे एक धर्मद्रोही लेखन के संदर्भ में सूक्ष्म का प्रयोग लिया गया । उस ग्रंथ में नकारात्मक एवं कष्टदायक स्पंदन होने से साधकों को उसे हाथ में लेने पर कष्ट हुआ । उस अनुचित लेखन का खंडन करने की दृष्टि से उन्होंने एक साधिका को उस लेखन का टंकण करने के लिए कहा; परंतु उस संपूर्ण ग्रंथ का टंकण पूर्ण होने तक उस साधिका को किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ ।

५. अध्यात्म के अति उच्च स्थान पर तथा स्वयं ज्ञानी होते हुए भी अन्य लेखकों की प्रशंसा करना

कोई ग्रंथ पढते समय उन्हें कोई वाक्य अच्छा लगता है, तो वे उनके साथ उपस्थित साधक को वह वाक्य पढकर सुनाते हैं तथा कहते हैं, ‘हमें ऐसा नहीं सूझेगा न ?’

इन ग्रंथों को पढने के उपरांत, उससे आवश्यक उतना ज्ञान लेने के पश्चात, वे ज्ञान देनेवाले लेखकों को पत्र लिखकर सूचित करते हैं कि ‘आपका लेख बहुत अच्छा लगा ।’ चाहे वह किसी लेखक का मासिक में प्रकाशित लेख हो अथवा संतों का मार्गदर्शन हो; उन्होंने प्रत्येक लेखक को उतनी ही आत्मीयता से पत्र भेजा है । उनके द्वारा प्रशंसित कुछ उदाहरण आगे दिए हैं –

अ. आपके द्वारा लिखे गए ग्रंथ का केवल प्रत्येक वाक्य ही नहीं, अपितु प्रत्येक शब्द भी महत्त्वपूर्ण है । इस ग्रंथ में दिया गया सारा ज्ञान अद्वितीय है ।

आ. शिक्षाक्षेत्र में किया गया आपका कार्य देखकर आपसे यह अनुरोध है कि आप आगामी हिन्दू राष्ट्र में शिक्षाक्षेत्र का दायित्व निभाएं ।

लेखकों का यह ज्ञान अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, इसके लिए वे उस लेखन को ‘सनातन प्रभात’ के नियतकालिकों एवं सनातन के ग्रंथों में प्रकाशित करने के लिए, संबंधित लेखक की अनुमति लेने के लिए भी कहते हैं । उस पत्र में लेखन प्रकाशित करते समय क्या उन लेखक को ‘मानदेय की अथवा प्रकाशित दैनिक की प्रतियां चाहिए ?’ तथा उस संबंध में उनकी क्या अपेक्षाएं हैं ?, यह भी

पूछने के लिए कहते हैं तथा उनके विचारों को समाजमानस तक पहुंचाने हेतु सनातन प्रभात एवं सनातन के ग्रंथों के माध्यम से व्यासपीठ भी उपलब्ध कराकर देते हैं ।

  • सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।
  • इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । - संपादक