WW1 Indian Soldiers : प्रथम विश्व युद्ध में प्राण न्योछावर वाले ३३ हजार भारतीय सैनिकों को ‘हुतात्मा’ की श्रेणी भी नहीं दी गई !

ब्रिटेन ने एक शताब्दी उपरांत सुधारी त्रूटि !

प्रथम विश्व युद्ध सैनिक (संग्रहित छायाचित्र)

लंदन (ब्रिटेन) – ब्रिटेन ने १०० वर्ष पुरानी ऐतिहासिक त्रूटिको सुधारते हुए प्रथम विश्व युद्ध में उसके पक्ष में लड़ने वाले ३३ सहस्त्र भारतीय सैनिकों के बलिदान का सम्मान किया है । इन वीर सैनिकों के नाम इराक के ‘बसरा मेमोरियल’ में डिजिटल रूप से प्रदर्शित किए गए हैं । एक शदाब्दी उपरांत ही सही, किन्तु विश्व ने भारत के वीर सैनिकों के शौर्य को स्वीकार किया है ।

१. प्रथम विश्व युद्ध के समयभारत पर ब्रिटिश शासन था । जब युद्ध में सैनिकों की कमी होने लगी, तब ब्रिटेन ने सहस्त्रों भारतीय युवाओं को अपनी सेना में नियुक्त कर एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न मोर्चों पर लडने के लिए भेजा ।

२. इन सैनिकों ने अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में अद्भुत साहस दिखाते हुए शत्रुआें को पराजित किया । इस भीषण युद्ध में हजारों भारतीय सैनिकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए; किन्तु उस समय ब्रिटेन ने उनके बलिदान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी और उन्हें ‘हुतात्मा’ की श्रेणी भी नहीं दी । अब ब्रिटेन ने उन्हें ‘हुतात्मा’ की श्रेणी प्रदान की है ।

३. ब्रिटेन की ‘कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन’ संस्था दोनों विश्व युद्धों में शहीद हुए सैनिकों की स्मृतियों को संरक्षित करने एवं उनके आंकडे रखने का कार्य करती है । इस संस्था ने ‘बसरा मेमोरियल’ के डिजिटल रिकॉर्ड में ४६ सहस्त्र हुतात्माओ के नाम जोडे हैं, जिनमें से ३३ सहस्त्र भारतीय सैनिक हैं । इस डिजिटल रिकॉर्ड में सैनिकों के नाम, पद एवं रेजिमेंट की विस्तृत जानकारी दी गई है ।

४. इराक के बसरा में ब्रिटेन ने अपने हुतात्मा सैनिकों की स्मृति में एक स्मारक बनाया है; किन्तु वर्तमान में इराक एक स्वतंत्र देश होने के कारण वहां नए पत्थर के शिलालेख बनाना संभव नहीं है । इसलिए इस संस्था ने डिजिटल विकल्प चुना है । जब तक इराक की स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक यह डिजिटल प्रणाली कार्यरत रहेगी, ऐसा संस्था ने कहा है ।

 सम्मान मिलने में इतनी देरी क्यों हुई ?

इतिहासकारों के अनुसार, भारत को २०० वर्षों तक दास बनाए रखने वाले ब्रिटिशों ने युद्ध के समय भी भारतीय सैनिकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया । भारतीय सैनिकों को सेना में नियुक्त किया जाता था, किन्तु उन्हें कभी भी अधिकारी बनने का अवसर नहीं दिया जाता था । यह भेदभाव प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत भी चलता रहा; इसलिए उनके नाम प्रदर्शित करने के स्थान पर केवल संख्या लिखी जाती थी ।