सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव से दिल्ली में परिवर्तन आरंभ !

नई दिल्ली में सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव संपन्न होने के कारण दिल्लीवासियों को एक अलग ही आध्यात्मिक-राष्ट्रीय स्वरूप का कार्यक्रम अनुभव करने को मिला । जिस ‘भारत मंडपम्’ में अधिकतर व्यवसाय, उद्योग एवं निवेश से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तथा कुछ सीमा तक धार्मिक स्तर के आयोजन भी होते हैं, वहां सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव जैसे धर्मतेज एवं क्षात्रतेज प्रक्षेपित करनेवाले कार्यक्रम के कारण विभिन्न स्तरों पर परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ हो गई है । महोत्सव की अवधि में ही इसके कुछ दृश्य परिणाम दृष्टिगत हुए, जबकि कुछ परिणाम आनेवाले समय में दिखाई देंगे ।

संकलक – श्री. यज्ञेश सावंत, इंद्रप्रस्थ (नई दिल्ली)

बाएंसे श्री. अभय वर्तक ,श्री. उदय माहुरकर वेदप्रचाररत्न वेदकुलपती श्री. जी.के. सीतारामन् इनके हाथ में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का भावपूर्ण दर्शन लेते हुए. साथ में  ‘सुदर्शन वृत्तवाहिनी’ के  संपादक श्री. सुरेश चव्हाणके

दिल्ली में पहली बार ऐसा धार्मिक और राष्ट्रहितकारी कार्यक्रम !

दिल्लीवासियों के लिए और विशेष रूप से उत्तर भारतीयों के लिए यह महोत्सव अद्भुत, आध्यात्मिक, सुंदर, अकल्पनीय एवं अवर्णनीय रहा । उत्तर भारत के प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ शंखनाद महोत्सव के रूप में एकत्र हुए, तो दिल्ली के सामान्य नागरिक तथा विद्यालयीन छात्र शस्त्र प्रदर्शनी के निमित्त शंखनाद महोत्सव में सहभागी हुए । ३ सहस्र से अधिक हिन्दुत्वनिष्ठ एवं ८०० से अधिक हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन इस महोत्सव में सहभागी हुए थे ।

इसी प्रकार केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्री श्री. गजेंद्र सिंह शेखावत, रक्षा राज्य मंत्री श्री. संजय सेठ, केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्री. श्रीपाद नाईक, ये ३ मंत्री-राज्यमंत्री तथा दिल्ली सरकार के संस्कृति मंत्री. श्री कपिल मिश्रा एवं कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी इस महोत्सव में सहभागी हुए थे । इनके साथ ही विश्व के सबसे बडे राजनीतिक दल भाजपा के मुख्य प्रवक्ता श्री. सुधांशु त्रिवेदी एवं श्री. प्रदीप भंडारी ने इस महोत्सव में उपस्थित रहकर उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन किया, साथ ही प्रदर्शनी का लाभ लिया । महोत्सव के दौरान राष्ट्र और धर्म से संबंधित सत्र सुनकर सभागार से बाहर निकलनेवाले हिन्दुत्वनिष्ठों के चेहरों पर समाधान था । उन्होंने सभागार से बाहर निकलकर ऊपरी मंजिल से नीचे आने तक जो स्वयं-स्फूर्त ‘जय श्रीराम’ के जयघोष किए, वे उसी के प्रमाण थे । शंखनाद महोत्सव के कारण जिस प्रकार हिन्दुत्वनिष्ठ ऊर्जावान हुए, संपूर्ण वातावरण भी वैसी ही ऊर्जा से भर गया था ।


इंद्रप्रस्थ से दिल्ली तक की यात्रा !

इंद्रप्रस्थ का नकाशा देखते हुए ‘एआय’निर्मित चित्र


इंद्रप्रस्थ पांडवों की राजधानी थी । वह यमुना नदी के तट पर बसा एक भव्य नगर था । ऐसा माना जाता है कि ‘आज का पुराना किला प्राचीन इंद्रप्रस्थ के अवशेषों पर अथवा उसके पास बनाया गया होगा’ । महाभारत युद्ध के पश्चात सदियों तक इस क्षेत्र में बडे शहर टिक नहीं पाए । इसलिए ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम दैनिक उपयोग से धीरे-धीरे लुप्त हो गया ।

११वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाकर वहां नई बस्ती बसाई । इस काल में इस शहर को ‘ढिल्ली’ या ‘ढिल्लिका’ नाम से जाना जाने लगा । राजा अनंगपाल ने महल की नींव रखते समय एक लौह स्तंभ खडा किया था । ज्योतिषियों ने बताया था कि वह शेषनाग के मस्तक पर स्थिर है । राजा ने शंका के कारण उस स्तंभ को उखाड दिया, जिससे शुभ मुहूर्त निकल गया और वह स्तंभ दोबारा ठीक से नहीं बैठाया जा सका, वह ‘ढिल्ला’ (ढीला) रह गया । इसी से इस शहर का नाम ‘ढिल्ली’ पडा । १३वीं शताब्दी से १६वीं शताब्दी तक मुगल काल में ‘दिल्ली’ नाम व्यापक रूप से प्रचलित हुआ । मुगलों ने इस स्थान पर शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) जैसे नए शहर बसाए; परंतु पूरे क्षेत्र के लिए स्थायी रूप से ‘दिल्ली’ नाम ही रहा ।

 

महोत्सव में सात्विकता एवं चैतन्य का दृश्य परिणाम !

प्रदर्शन का काम करते हुए श्री. वत्स इनके कर्मचारी

श्री. सुकृत वत्स ने महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न प्रदर्शनियों के लिए प्रारंभिक (बुनियादी) व्यवस्था की थी । प्रदर्शनी की व्यवस्था खडी करने के लिए उनका पहले से ही सहयोग था । कुछ अतिरिक्त काम आने पर हाथ जोडकर वे साधकों से कहते, ‘थोडा समय दें, मैं प्रयास करता हूं ।’ प्रदर्शनी स्थल पर बिजली का काम करने के लिए श्री. वत्स की कंपनी ने एक अन्य कंपनी (वेंडर) को नियुक्त कर दिया था । उस कंपनी के कर्मचारी कुछ स्थानों की व्यवस्था करने के लिए तैयार नहीं थे । तब श्री. वत्स ने उन्हें कहा, ‘आपके काम के पैसे तो हम देंगे ही ! यहां क्या काम चल रहा है, बोर्ड पर पढकर इसे समझ लें, ये सब हमारे लिए ही कर रहे हैं, इसलिए कुछ काम सेवा के रूप में भी करें’, ऐसा कहकर वे उन्हें काम के लिए प्रेरित कर रहे थे । प्रदर्शनी में आरंभ के दो दिन सभी संबंधित  कर्मचारी टी-शर्ट, जींस जैसे सामान्य वेशभूषा में थे; परंतु अंतिम दिन सभी महिलाएं एवं पुरुष पारंपरिक परिधान में आए थे ।

श्री. वत्स ने बताया कि सनातन धर्म को आगे ले जाने के लिए गोवा की सनातन संस्था ने बहुत महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है, ‘मैं इसमें भागीदार बन पाया, इसके लिए मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूं ! यहां मुझे सेवा करने का अवसर मिला, इसके लिए मैं कृतार्थ हूं । यहां मुझे ऐसे लोग मिले, जो अभी भी अपनी संस्कृति से जुडे हुए हैं । मैं कॉर्पोरेट स्तर पर काम करता हूं; परंतु आज से पहले कभी ऐसा भव्य आयोजन नहीं देखा था !’ (यह सब बताते समय श्री. वत्स का भाव जागृत हो गया था ।)


छत्रपति शिवाजी महाराज का परिचय !


बैंक से सेवानिवृत्त एक व्यक्ति ने बताया कि यहां की पुस्तकों में छत्रपति शिवाजी महाराज के विषय में केवल इतना ही बताया जाता है कि ‘वे आगरा में कैद थे तथा कुछ दिनों के पश्चात चतुराई से भाग निकले’ । पेशवा कौन हैं ? यह तो पता भी नहीं है । ‘आपकी प्रदर्शनियों के माध्यम से ही हमें जानकारी मिली कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने इतना महान कार्य किया है । उनके विषय में हमें कुछ पढाया नहीं जाता; अपितु पूरे भारत में कहीं भी उचित पद्धति से नहीं पढाया जाता ।’ इस व्यक्ति ने बताया कि वे कुछ दिन पूर्व ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुडे हैं तथा संघ के सोशल मीडिया समूहों में महोत्सव में आने की सूचना दी गई थी, उसी के अनुसार वे सम्मिलित हुए । गाजियाबाद के संघ से जुडी संस्थाओं से आए हिन्दुत्वनिष्ठों ने बताया कि वे और भी स्वयंसेवकों को लेकर आते, परंतु स्थान के अभाव की आशंका की कल्पना कर इस विषय में उनलोगों से  पूछा ही नहीं ।

 

वैचारिक क्रांति का आरंभ महाराष्ट्र से !

जब दिल्ली में क्रूर मुगल सत्ता थी, तब महाराष्ट्र से छत्रपति शिवाजी महाराज ने रणसिंघा फूंका एवं हिन्दवी स्वराज्य की सिंहगर्जना कर मुगल साम्राज्य को हिला दिया, तो पेशवाओं ने दिल्ली में मुगल सत्ता के सिंहासन को ध्वस्त कर तथा उससे भी आगे ‘सीमा के पार’ जाकर हिन्दवी स्वराज्य को साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया । शंखनाद महोत्सव के अवसर पर इसी इतिहास की पुनरावृत्ति होती दिखाई दे रही है । महोत्सव का मुख्य कार्य हिन्दुत्वनिष्ठों को एकजुट कर उन्हें धर्माधारित राष्ट्र निर्माण के लिए कार्यप्रवृत्त करना है । चूंकि यह भारत की राजधानी में ही हुआ, इसलिए इस वैचारिक परिवर्तन की गति बढने की संभावना है ।

श्री. यज्ञेश सावंत

‘आईटीसी कैटरिंग’ के मालिकों ने अनुभव की विशिष्टता !

‘आईटीसी कैटरिंग’ द्वारा ‘भारत मंडपम’ में भोजन की व्यवस्था की गई थी । उनके मालिकों ने बताया कि यह कार्यक्रम बिल्कुल अलग लगा ! सनातन के सभी कार्यकर्ता सबके साथ बहुत ही नम्रता से व्यवहार कर रहे थे । इसलिए हमें आपके लिए व्यवस्था करने में कोई कठिनाई नहीं हुई । हमने आपके साधकों के साथ पारिवारिक वातावरण का अनुभव किया !

महोत्सव स्थल पर सुरक्षा कर्मियों द्वारा ‘जय श्रीराम’ कहकर जिज्ञासुओं का स्वागत और मुख्य रूप से प्रवेश द्वार पर नियुक्त ‘बाउंसर’ (निजी सुरक्षा कर्मी) भी २ दिनों तक ‘वेलकम सर’, ‘यस सर’ कह रहे थे; परंतु अंतिम दिन वे प्रवेश द्वार पर आने वाले जिज्ञासुओं का अभिवादन ‘जय श्रीराम’ कहकर करने लगे ।

‘आईटीपीओ कन्वेंशन सेंटर’ के प्रमुख का उत्साहजनक प्रतिसाद !

‘आईटीपीओ कन्वेंशन सेंटर’ (भारत व्यापार संवर्धन संगठन, जो मुख्य रूप से ‘भारत मंडपम’ का दायित्व संभालता है) के प्रमुख श्री. भाटिया ने महोत्सव में लगाई गई प्रदर्शनी देखी । उन्होंने बताया कि प्रदर्शनी बहुत अच्छी लगी । उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में अंकित किया, ‘पूरी प्रदर्शनी बिलकुल दुर्लभ है ।’

मीडिया का उत्तम प्रतिसाद !

दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल तथा समाचार पत्रों के कार्यालय हैं । ‘एबीपी न्यूज’, ‘रिपब्लिक भारत’, ‘टाइम्स नाउ’, ‘जी न्यूज’, ‘न्यूज १८’ आदि महत्त्वपूर्ण चैनलों के संपादकों ने भेंट के समय महोत्सव के प्रति सकारात्मकता दिखाई । इस दौरान उनमें से कुछ ने कहा, वे ‘गोवा आकर और विस्तृत जानकारी लेंगे’ ।

ई-रिक्शापे लगाए फलक

महोत्सव की रिपोर्टिंग के लिए राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय तथा क्षेत्रीय, इस प्रकार कुल मिलाकर १२० से अधिक मीडिया प्रतिनिधि आए थे । ‘रिपब्लिक टीवी’ ने अपने डिजिटल चैनल पर प्रसारण किया, तो ‘एबीपी’ ने अपने सुबह के समाचार सत्र में महोत्सव के समाचार दिखाए । ‘एएनआई’ समाचार एजेंसी द्वारा की गई रिपोर्टिंग को अनेक मीडिया संस्थानों ने लिया । इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने कपिल मिश्रा का भाषण तथा शस्त्र प्रदर्शनी के उद्घाटन का समाचार दिखाया । इन समाचार चैनलों की दर्शक संख्या करोडों में है ।


महोत्सव को व्यापक एवं नई दिल्ली को ‘सनातनमय’ करने वाला प्रसार !

देहली में लगाया फलक

दिल्ली के ४० चौराहों पर कुल ८० से अधिक होर्डिंग, तो २० मेट्रो स्टेशनों पर विज्ञापन लगाए गए थे । दिल्ली के अत्यंत प्रसिद्ध राष्ट्रपति भवन, मंत्रियों, सांसदों एवं उच्च पदाधिकारियों के घरों वाले लुटियंस जोन में भी महोत्सव के विज्ञापन से संबंधित बोर्ड लगाए गए थे । इस कारण सनातन हिन्दू राष्ट्र महोत्सव के प्रचार से ‘दिल्ली सनातनमय हो गई’, ऐसा चित्र दिखाई दे रहा था ।

 

शंखनाद की प्रतिध्वनि पूरे भारत में प्रतिध्वनित होगी तथा शीघ्र ही सनातन राष्ट्र साकार होगा !

जिस इंद्रप्रस्थ में कुछ शताब्दी पूर्व हिन्दू धर्मी पांडव रहते थे, वह दिल्ली मुगल इस्लामी आक्रमणकारियों के अत्याचारों, नरसंहार, साथ ही अनाचार के कारण अशुद्ध हो गई थी । इस महान आध्यात्मिक शक्ति वाले महोत्सव से उसे शुद्ध करने का कार्य सिद्ध हुआ ! दिल्ली की भूमि एवं दिल्ली का राज्य अनेक शताब्दियों से देश के केंद्र में रहा है । दिल्ली में कुछ होता है, तो उसकी गूंज न केवल पूरे भारत में, अपितु पूरे विश्व में सुनाई देती है । इसलिए यह निश्चित है कि इस शंखनाद की प्रतिध्वनि पूरे भारत में गूंजेगी तथा शीघ्र ही सनातन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा ।

श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ।

– श्री. यज्ञेश सावंत, इंद्रप्रस्थ (नई दिल्ली) (१५.१२.२०२५)