सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव देहली २०२५

‘रॉ’के पूर्व अधिकारी आर्.एस्.एन्. सिंह (सेवानिवृत्त) का आवाहन
‘गजवा-ए-हिन्द’ के जवाब के रूप में वैचारिक ‘गजवा-ए-इस्लाम’का आरंभ कीजिए !

हम सदैव यह मानकर चलते हैं कि पाकिस्तान एक भौगोलिक क्षेत्र है; परंतु हमें यह ध्यान में लेना चाहिए कि पाकिस्तान एक विचार है । मुसलमानों के २ प्रकार हैं, उनमें से एक हैं उपमहाद्वीपीय (सबकाँटिनेंटल) मुसलमान तथा अन्य हैं शेष मुसलमान ! उपमहाद्वीपीय मुसलमानों में से ९९ प्रतिशत मुसलमान नवधर्मांतरित हैं । विगत १ सहस्र ४०० वर्षाें से ‘गजवा-ए-हिन्द’ (भारत के इस्लामीकरण के लिए घोषित युद्ध) के नारे लगाए जा रहे हैं । गजवा-ए-ब्रिटेन, गजवा-ए-जर्मनी जैसे नारे कभी भी लगाए नहीं जाते । क्या हम ये धमकियां सुनकर मिट जाएंगे ? हम में प्रतिकार करने की क्षमता है; उसके कारण ही पहले वैचारिक स्तर पर ‘गजवा-ए-इस्लाम’ आरंभ होना चाहिए । ‘गजवा-ए-हिन्द’ के जवाब के रूप में वैचारिक ‘गजवा-ए-इस्लाम’का आरंभ कीजिए, ऐसा आवाहन ‘रॉ’ एवं भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल आर्.एन्.सिंह (सेवानिवृत्त) ने किया । १३ एवं १४ दिसंबर की अवधि में देहली में चल रहे सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव में आयोजित ‘रणसंवाद – भारत की सामरिक नीति’, इस विचारगोष्ठी में वे ऐसा बोल रहे थे । इस अवसर पर व्यासपीठ पर ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) संजय अगरवाल, विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) विनायक डावरे, ‘नैशनल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च एंड कंपैरिटिव स्टडीज’के अध्यक्ष श्री. नीरज अत्री, हिन्दू विधिज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, ‘डीडी न्यूज’के संपादक अशोक श्रीवास्तव एवं ‘यूथ फॉर पनून कश्मीर’के अध्यक्ष श्री. राहुल कौल आदि मान्यवर उपस्थित थे । सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस ने इस रणसंवादन का संचालन किया ।
इस अवसर पर ‘पाकिस्तान, चीन एवं तुर्की के विषय में भारत की नीति’, इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कर्नल आर्.एन्.सिंह ने देश के आंतरिक बडे संकट का भान कराते हुए कहा, ‘‘हमारे देश के अंदर भी एक पाकिस्तान है । हम प्रत्यक्षरूप से पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चला सकते हैं; परंतु हम देश के अंदर के पाकिस्तान का क्या करेंगे ? हममें इस कट्टरतावाद का सामना करने की क्षमता है । उनके विचार एवं आदर्शवाद से हमें खतरा है । भारत-पाकिस्तान सीमा पर हमने घेरा डाला है । पाकिस्तानियों को ऐसा घेरा बनाने की आवश्यकता नहीं पडी; क्योंकि हमारे विचारों से उन्हें कोई खतरा नहीं है । अब देहली के रामलीला मैदान में ‘एस्.आई.आर्.’ के विरुद्ध आंदोलन चलानेवालों को इन अंदर के पाकिस्तानियों का समर्थन प्राप्त है । जब हम भारतीय राजनीति का विचार करते हैं, तब यह दिखाई देता है यहां के देशद्रोहियों की तथा अंदर के पाकिस्तानियों की सहायता ली, तो सत्ता में रहा जा सकता है । हमारे अंदर के पाकिस्तानी ‘ऑपरेशन सिंदूर’के कारण दुखी थे; इसलिए अब इनके विरोध में वैचारिक स्तर पर ‘गजवा-ए-इस्लाम’का नारा लगाने की आवश्यकता है ।
हिन्दूफोबिया के (हिन्दूद्वेष) आंकडों की ओर ध्यान देना आवश्यक ! – अशोक श्रीवास्तव, संपादक, डीडी न्यूज

मैं माध्यमों में काम करता हूं; परंतु तब भी मैं यह बता सकता हूं कि प्रसारमाध्यम हमारे सबसे बडे शत्रु हैं । ‘ऑपरेशन सिंदूर’के समय भारत के लडाकू राफेल विमान पाकिस्तान ने नहीं, अपितु भारतीय माध्यमों ने गिराए । उस समय ‘द हिन्दू’ ने यह समाचार दिया था कि पाकिस्तान ने भारत के ५ राफेल विमान गिराए । यह षड्यंत्र पहले से चला आ रहा है । मोहनदास गांधी की हत्या के समय भी ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’के समाचार का शीर्षक था ‘गांधी इज किल्ड बाइ हिन्दू:’ क्या ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ अन्य धर्म के विषय में ऐसी स्वतंत्रता ले सकता है ? ’ क्या कभी ‘अमुक नेता की हत्या मुसलमान ने की ’, ‘अमुक नेता की हत्या ईसाई ने की’ ऐसे शीर्षक कभी दिए जाते हैं ? आधुनिकतावादी अभी भी आतंकवाद का रंग देख नहीं सकते । कुछ वर्ष पूर्व ४-५ विश्वविद्यालयों ने एकत्रित आकर एक कार्यक्रम किया, जिसका नाम था ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिन्दुत्व !’ ऐसे कार्यक्रमों से झूठा नैरेटिव (कहानी) बनाई जाती है । विगत अनेक वर्षाें से हमारी फिल्मों में भगवाधारी साधुओं को चोर, बलात्कारी, डाकू आदि के रूप में दिखाया जाता है । इस झूठे नैरेटिव को ध्वस्त करने की आवश्यकता है ।
राजनेता जब हिन्दुत्व को ‘डेंग्यू’, ‘मलेरिया’, ‘एड्स’ आदि बोलते हैं, उस समय प्रसारमाध्यम मौन रहते हैं । क्या ये प्रसारमाध्यम उन्हीं राजनेताओं को अन्य धर्माें के विषय में ऐसा पूछते हैं ? वर्तमान समय में इस्लामोफोबिया की (हिन्दूद्वेष) की चर्चा चल रही है । वास्तव में हिन्दूफोबिया ही प्रचंड मात्रा में है । हिन्दूफोबिया के विषय में एक ब्योरा है । भारत में दिसंबर २०२५ के पहले ११ दिन मे;ं वे केवल हिन्दू हैं; इसके कारण उन्हें कष्ट पहुंचाए जाने की १०४ घटनाएं हुई हैं । ‘धुरंधर’ फिल्म आने पर कहा जाता है कि यह इस्लामोफोबिया है । वास्तव में हिन्दूफोबिया के आंकडों की ओर ध्यान देना आवश्यक है ।
क्या हम घुसपैठियों के लिए लाल कालीन बिछाएं ? – अशोक श्रीवास्तव, संपादक, ‘डीडी न्यूज’
यदि मतदातासूची की विशेष गहन पुनरीक्षक की प्रक्रिया की जा रही हो, तो उसका स्वागत है । ‘हमारे नागरिक कौन हैं ?’, यह हमें ही ज्ञात नहीं है । सईदा हमीद नाम की महिला सोनिया गांधी की निकटवर्ती थी । उन्होंने एक बार कहा, ‘‘यदि अन्य देशों के मुसलमान यहां आते हों, तो उन्हें आने देना चा हिए । यह भूमि अल्लाह की भूमि है । यहां कोई आते हैं, तो हमें उन्हें यहां रहने देना चाहिए ।’’ अब उन्हें यह बताना पडेगा, ‘‘मुसलमान वर्ष १९४७ में अल्लाह की धरती लेकर चले गए । अब यह भूमि श्रीराम की है ।’’
क्या हमें घुसपैठियों के लिए लाल कालीन बिछानी चाहिए ? घुसपैठ रोकने के लिए यदि मतदातासूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया हो रही हो, तो उसमें क्या समस्या है ? देश के न्यायालयों में परिवर्तन आ रहे हैं, तो यह अच्छी बात है । अब प्रसारमाध्यम तमिलनाडू के कार्तिकेय दीपम् का सूत्र उठा रहे हैं । यह बहुत प्राचीन परंपरा है । जिस पहाडी पर दीप प्रज्वलित किया जाता है, तो क्या उसकी बाजू में दर्गाह बनाई गई, तो क्या हम दीप प्रज्वलित करना बंद करें ? इस विषय में न्यायाधीश ने हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय दिया, तो उनके विरुद्ध महाभियोग चलाने की भाषा बोली जा रही है । न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग चलाने की भाषा बोलनेवाले पाकिस्तान के नहीं हैं, अपितु वे हिन्दुओं के मतों से चुनाव जीतकर आए हैं । उन्हें उनकी गलती का भान कराना आवश्यक है ।
प्रत्येक सैनिक सनातन राष्ट्र के लिए लडता है ! – विंग कमांडर विनायक डावरे (सेवानिवृत्त)

ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि समझ लेना आवश्यक है । पहलगाम में धर्म पूछकर २६ पर्यटकों की हत्या की गई । उसकी जड हिन्दूद्वेष है । सर्जिकल स्ट्राईक तथा उससे पूर्व किए गए १-२ प्रतिकारों को छोड दिया जाए, तो जहां पाकिस्तान की ओर से निरंतर उपद्रव करते हुए भी विगत अनेक वर्षाें में भारत की ओर से प्रतिकार ही नहीं किया गया है । वर्ष २०१४ से हमारी मानसिकता में परिवर्तन आया है । हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति बढी है । पहलगा में आतंकी आक्रमण होने के उपरांत हमारे प्रधानमंत्री ने तीनों सेनादलों के प्रमुखों को पाकिस्तान पर कार्रवाई करने की खूली छूट दी । राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा सेना को खुली छूट मिलना बहुत आवश्यक है, सशथ ही सेना का नियोजन बहुत महत्त्वपूर्ण है ।
हमारी सेना के अतुलनीय शौर्य के साथ ही इस्रो एवं डी.आर्.डी.ओ. ने युद्ध की तकनीक में इतनी प्रचंड प्रगति की है कि उसका कोई तोड नहीं है । नई युद्धसामग्री उपलब्ध कराना अनवरत चलनेवाला काम है । पिछले ११ वर्षाें में यह काम हुआ है । ऑपरेशन सिंदूर के समय लक्ष्यित आक्रमण कैसे किए जाते हैं, इसे पूरे विश्व ने देखा । यह संपूर्ण कौशल प्राप्त करने हेतु सेना ने बहुत परिश्रम उठाए हैं । इन सभी प्रयासों का फल ऑपरेशन सिंदूर है ।
सीमा पर देश के लिए लडनेवाले सैनिक की आस्था क्या होती है ? प्रत्येक प्रशिक्षण के समय भारतीय सैनिक में राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रभक्ति जगाई जाती है । प्रत्येक सैनिक पहले राष्ट्र के लिए लडता है, उसके पश्चात वह अपनी पलटन के लिए लडता है तथा उसके उपरांत वह स्वयं के लिळ लडता है । प्रत्येक पलटन के कुछ घोषवाक्य हैं । उससे उनकी प्रेरणा क्या है ?, यह ध्यान में आता है ।
युद्ध के कुछ घोषवाक्य !
- मराठा लाईट इंफेंट्री : छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !
- राजपूताना राइफल्स : बजरंग बली हनुमान की जय !
- राजस्थान रेजिमेंट : राजा रामचंद्र की जय !
- जम्मू – कश्मीर राइफल्स : भारतमाता की जय !
- डोगरा रेजिमेंट : ज्वालामाता की जय !
- गढवाल राइफल्स : बद्रीविशाल की जय !
ये नारे सैनिकों को प्रेरणा देते हैं । इन नारों से ही यह ध्यान में आता है कि प्रत्येक सैनिक राष्ट्र के लिए लडता है ।
शत्रुराष्ट्रों का आक्रामक प्रतिकार करना आवश्यक ! – ब्रिगेडियर संजय अग्रवाल (सेवानिवृत्त)

वर्ष १९६२ में चीन के साथ हुए युद्ध में हमारी पराजय हुई थी, ऐसा बताया जाता है; परंतु उसके ५ वर्ष उपरांत ही अर्थात वर्ष १९६७ में हमने चीन को पराजित किया था; परंतु इन वास्तविकताओं की बहुत-कुछ चर्चा नहीं होती ।

हम अपने बलस्थान भूल चुके हैं । ‘किसी भी शत्रुदेश के विषय में हमारी नीति क्या होनी चाहिए ?’, यह कभी भी स्पष्ट नहीं करना चाहिए । उससे हमारे पास अनेक विकल्प उपलब्ध रहते हैं । ऑपरेशन सिंदूर से पूर्व हमारे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने यह चेतावनी दी थी कि आवश्यकता पडी, तो हमारे परमाणु नीति में भी परिवर्तन किया जा सकता है । इस वक्तव्य के कारण अमेरिका, पाकिस्तानसहित अनेक देशों के मुंह का पानी निकल गया था । हम प्रचंड शक्तिशाली हैं । हमारी सैन्यशक्ति एक महत्त्वपूर्ण अंग है । सामूहिक शक्ति से ही देश विजयी होता है । हम प्रचंड शक्तिशाली हैं । हम अपनी शक्ति भूल गए हैं । हमें अपनी शक्ति का भान हो; इसके लिए सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सवास जैसे महोत्सवों की आवश्यकता है । शक्ति का जागरण करने हेतु हमें तात्कालिक ध्येय, मध्यम ध्येय तथा दीर्घकालीन ध्येय रखना चाहिए । क्रिकेट के खेल में भी ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ नहीं होता । कोई भी संघ केवल क्षेत्ररक्षण (फिल्डिंग) कर मैच जीत नहीं सकता । उसके लिए रन भी बनाने पडते हैं । अब यह हम युद्ध के संदर्भ में कर रहे हैं । तिब्बत एवं ताइवान चीन की रेड लाईंस हैं । वे चेकमेट का कारण हैं । युद्ध में उनका समावेश अंत में ही किया जाना चाहिए ।
कश्मीरी हिन्दुओं का घाटी में लौटना ही कश्मीर में भारत की घरवापसी है ! – राहुल कौल, अध्यक्ष, ‘यूथ फॉर पनून कश्मीर’

अनेक लोगों को ऐसा लगता है कि कश्मीरी हिन्दुओं की व्यथाएं वर्ष १९४७ में हुए देश के विभाजन के उपरांत की हैं; परंतु वास्तव में यह एक बडा भ्रम है । वर्ष १९९० का कश्मीरी हिन्दुओं का पलायन हिन्दुओं का सातवां पलायन था । वर्ष १९४७ तक धर्म के सूत्र पर कश्मीरी हिन्दुओं का ५ बार पलायन हुआ था । हम जिहाद को ‘जिहाद’ बोलने के लिए डरते हैं । हम उसे ‘आतंकवाद’ बोलते हैं । आज हमारी ही सरकार कश्मीरी हिन्दुओं के उत्पीडन को ‘वंशविच्छेद’ बोलने से मना करती है । कश्मीर में जिहाद के जडों को पाला-पोसा गया, तो उसकी शाखाएं पूरे देश में फैलने ही वाली हैं । कश्मीर के हिन्दुओं का कश्मीर घाटी में लौटना ही कश्मीर में भारत की घरवापसी है । जब कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं की घरवापसी हुई, तभी भारत में हिन्दुओं की संस्कृति पुनर्जिवित होगी, इसे ध्यान में लेना महत्त्वपूर्ण है ।

वर्ष १९९० से पूर्व जो हिन्दू कश्मीर में रह रहे थे, वे भिन्न-भिन्न जिलो में रहते थे । वहां इस्लाम का वर्चस्व बढ रहा था । कश्मीर में हिन्दू राजनीतिकदृष्टि से कभी भी सक्षम नहीं हो पाए; क्योंकि भौगोलिकदृष्टि से वे बिखरे हुए थे । यह पुनः होने के लिए कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाना चाहिए । देशनिष्ठ कश्मीरी हिन्दू यहां आकर रह सकें, इसप्रकार का वातावरण यहां तैयार होना चाहिए । अब प्रतिकार का समय आ गया है । १६ जनवरी २०२६ को हम अष्टभैरव एवं माता जगदंबा का आवाहन कर जम्मू में आंदोलन आरंभ करनेवाले हैं । जब तक कश्मीरी हिन्दुओं ने यह नहीं पूछा जाता कि वहां जाने में आपको क्या समस्या है ? तब तक यह आंदोलन नहीं रूकेगा ।
अनुच्छेद ३७० हटाना एक बडा निर्णय था; परंतु उसके उपरांत कश्मीरी हिन्दुओं की कश्मीर घाटी में वापसी कराने के प्रयास नहीं हुए । उसके लिए अब हम प्रयास करनेवाले हैं तथा इसमें देशवासी हमारे साथ रहें, यह हमारा आवाहन है ।
अपनी क्षमता के अनुरूप धर्म के लिए कार्य करते रहिए ! – निरज अत्री, अध्यक्ष, ‘नैशनल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च एंड कंपैरिटिव स्टडीज’

आज के सभी युवक एक जैसा ही विचार करते हैं, ऐसा नहीं है । आंदोलन में आगे कुछ युवक भी होते हैं । उनके पीछे की शक्तियां भिन्न होती हैं । आज ही मैं बेंगलुरू से आ रहा था । हवाई अड्डे पर २५-३० युवक भजन गा रहे थे । यह हमारी युवा पीढी है । शिक्षाव्यवस्था एवं माध्यमों में अब परिवर्तन आ रहे हैं । युवकों को भडकानेवालों को यथासंभव उत्तर दिया जाएगा ।

२६/११ के मुंबई आक्रमण के समय पुलिसकर्मी तुकाराम ओंबाळे के हाथ में केवल लाठी थी । उसकी सहायता से उन्होंने कसाब को पकडा तथा उस समय तत्कालिन कांग्रेस सरकार द्वारा रचे गए भगवा आतंकवाद का षड्यंत्र नष्ट हुआ तथा कांग्रेस की सत्ता ध्वस्त हुई । इस कृति ने इतिहास की दिशा बदल गई । उसके कारण आप अपनी क्षमता के अनुरूप धर्म के लिए कार्य करते रहिए ।
हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र की मांग लगाई रखनी चाहिए ! – अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, अध्यक्ष, हिन्दू विधिज्ञ परिषद

दाभोलकर, कलबुर्गी, पानसरे एवं गौरी लंकेश इन आधुनिकतावादियों की हत्याओं का हौवा बनाय गया । उसका अध्ययन करते हुए यह दिखाई दिया कि उनके जीवन में कभी न कभी उनका नक्सलियों के साथ संबंध आया है । ‘इन सभी आधुनिकतावादियों को हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताओं ने मारा’, यह उनकी थियरी है ।

अर्बन नक्सलियों ने कितने भारतीयों को मारा है, यह कितने लोगों को ज्ञात है ? यह आंकडश १४ सहस्र है । इसमें सामान्य नागरिकोंसहित विधायक, सरपंच, आदिवासी इन सभी का समावेश है । किसी ने कहा, ‘बडी संख्या में नक्सली सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं । तो क्या इससे अर्बन नक्सलवाद समाप्त होगा ?’ साम्यवाद एवं अर्बन नक्सलवाद एक ही हैं । उइके कारण अर्बन नक्सलवाद सहजता से समाप्त नहीं होगा । उसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को सीमा पर कार्यरत सैनिक की भूमिका निभानी चाहिए । जब इजरायल नहीं बना था, उस समय ज्यू लोक प्रतिवर्ष एकत्रित आकर कहते थे, ‘अगले वर्ष हम इजरायल में मिलेंगे ।’ वे सपना देख रहे थे । हमें भी हिन्दू राष्ट्र की मांग लगाई रखनी चाहिए ।
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