‘ज्ञान एवं भक्ति’ के अद्वितीय संगम से युक्त श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी

‘संगीतकला, ग्रंथों के लिए लेखन करना, चित्रीकरण करना, भेंटवार्ताएं करना, सूक्ष्म जगत का विश्लेषण करना इत्यादि विभिन्न सेवाओं के माध्यम से श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने सेवा का आरंभ किया । ‘प्रगल्भ बुद्धि, सूक्ष्म स्तर का जानने की अतिउच्च क्षमता तथा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण सेवा की लगन’ आदि अनेक गुणों के साथ उन्होंने सभी सेवाएं कुशलतापूर्ण एवं तीव्र गति से कीं ।

वर्ष २०११ से वे धूप-वर्षा, भूख-प्यास की चिंता किए बिना लाखों किलोमीटर भ्रमण कर अध्यात्मप्रसार कर रही हैं । भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने हेतु वे तीर्थस्थल, मंदिर, मठ, ऐतिहासिक स्थान इत्यादि स्थानों पर जाकर चित्रीकरण कर रही हैं, साथ ही वहां की जानकारी एवं दुर्लभ वस्तुएं संग्रहित भी कर रही हैं । देवस्थानों का चित्रीकरण, संतों एवं भक्तों से मिलना आदि सेवाओं के उपलक्ष्य में उनका अविरत भ्रमण जारी है । पिछले कुछ वर्षाें से वे महर्षियों की आज्ञा के अनुसार भारत में, साथ ही विदेशों में भी भ्रमण कर रही हैं । सनातन में एकाध-दूसरा ही ऐसा कोई होगा, जिसने इतनी विभिन्न प्रकार की सेवाएं इतनी कुशलता के साथ तथा अतिअल्प समय में की हों ! इससे ही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का एकमेवद्वितीयत्व ध्यान में आता है ।
‘प्रीति’ यह गुण श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का स्थायी भाव है तथा वे बहुत सहजता से तथा अपनी चैतन्यमय वाणी से सभी को अपना बना लेती हैं । उनकी पहली भेंट में अपरिचित व्यक्ति भी उनकी ओर आकर्षित होते हैं तथा उन्हें श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी में विद्यमान दैवीय शक्ति एवं सामर्थ्य की अनुभूति होती है । उन्होंने समाज के अनेक जिज्ञासुओं, संतों एवं धर्माभिमानियों को सनातन के कार्य से जोड रखा है । स्थूल एवं सूक्ष्म, इन दोनों स्तरों पर श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी का कार्य अविरत जारी है । उसके कारण उनका कार्य केवल ‘साधक एवं सनातन’ इतने तक ही सीमित न रहकर वह विश्व्यापी बन गया है । अब तो उनके अस्तित्व से तथा संकल्प से ही कार्य सिद्धि तक पहुंच रहा है ।
‘उत्साहित, आनंदित, धर्मकार्य की लगन, प्रीति, ईश्वर के प्रति भाव’ इत्यादि अनेक गुणों से अलंकृत श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने ‘भक्ति कैसी होनी चाहिए ?’, इसका आदर्श उदाहरण सभी के सामने रखा है । ‘उनके द्वारा इसी प्रकार उत्तरोत्तर कार्य होता रहे’, यह उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में शुभकामना !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
| सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । |
(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
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