संपादकीय : …केवल ‘सिंदूर’ अपर्याप्त !

डॉ. मुजम्मिल शकील, डॉ. अहमद राठर और डॉ. अहमद सय्यद

अनंतनाग से ‘एके 47’ के साथ गिरफ्तार किए गए डॉ. अहमद राठर और डॉ. आदिल समेत जम्मू-कश्मीर के ५ अन्य व्यक्ति; चीन में शिक्षा प्राप्त किया हुआ, मूल रूप से भाग्यनगर का और वर्तमान में कर्णावती में रह रहा प्रसिद्ध डॉ. अहमद सय्यद; फरीदाबाद निवासी डॉ. शाहीन शाहिद तथा ३६० किलो बम बनाने में प्रयुक्त होनेवाले अमोनियम नाइट्रेट रखनेवाला डॉ. मुजम्मिल – इन सबकी एक के बाद एक हुई गिरफ्तारी और इस पृष्ठभूमि में १० नवंबर को देश की राजधानी दिल्ली के लाल किले के सामने हुआ रासायनिक बम विस्फोट, इन सबका जुडाव स्वाभाविक ही हो

गया । फरीदाबाद से २,९०० किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट और २,५६३ किलोग्राम विस्फोटक तथा कर्णावती से भी विस्फोटक सामग्री जब्त होना और अंततः इन सभी का संबंध जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठन से निकलना, यह सब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का प्रतिशोध है, यह स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है । ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने जैश-ए-मोहम्मद को लक्ष्य बनाया था ।

कुछ प्रमुख सूत्र

डॉ. मुजम्मिल के घर से हथियारों के ढेर में चीनी पिस्तौलें मिली हैं । यह इस बात का एक और प्रमाण है कि आतंकवादियों को चीन सहित अन्य देशों का सहयोग प्राप्त है । वे ‘एन्क्रिप्टेड चैनल’ (केवल प्राप्तकर्ता को जानकारी मिलने की व्यवस्था) के माध्यम से संवाद स्थापित कर रहे थे । अहमद सय्यद अरंडी के बीजों से ‘राइसिन’ नामक अत्यंत विषैला जहर बना रहा था । समाजसेवा के नाम पर ये सभी डॉक्टर यह काम कर रहे थे । हथियार आपूर्ति, धन आपूर्ति और जिहादी विचारधारा फैलाना – यह सभी कार्य ये सफेदपोश डॉक्टर कर रहे थे । ‘बेरोजगारी युवाओं को आतंकवाद की ओर मोडती है’, कहनेवाले धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) लोगों के लिए यह एक करारा तमाचा है । ‘क्या आपके आस-पास रहनेवाला धर्मांध व्यक्ति घुसपैठिया है ? क्या उसका व्यवहार संदिग्ध है ? इस विषय में सदैव जागरूक रहना और देखना, बल्कि उनकी ओर संदेह की दृष्टि से देखना, क्यों आवश्यक है ?’ यह आतंकवादी संगठन के ‘स्लीपर सेल’ (स्थानीय सहायक) के विशाल जाल को देखकर समझ में आता है । भारतीय नागरिकों द्वारा भी अत्यंत सतर्क रहकर सुरक्षा एजेंसियों की सहायता करना आवश्यक है; इसके बिना भारत माता के पूरे शरीर में फैले हुए इस ‘स्लीपर सेल’ के विष को समाप्त करना कठिन है । सुदर्शन वाहिनी द्वारा ‘इस विस्फोट के स्थल से निकट स्थित गौरी-शंकर मंदिर सुरक्षित कैसे रहा ?’ इस विषय पर एक पोस्ट प्रसारित करने पर, कई देश-विरोधी शक्तियों ने उस पर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं । देश के अंतर्गत जो नागरिक रूपी सेना है, उसे इस विषैली पीढी को सुधारने का काम करना होगा ।

आपातकाल की तैयारी

पुलिस विशेषज्ञ और सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ९० प्रतिशत घटनाओं में आतंकवादी घटना होने से पहले ही आतंकवादियों के षड्यंत्र को सरकारी तंत्र विफल कर देते हैं । हमारी गुप्तचर एजेंसियों सहित विभिन्न एजेंसियों की इस सफलता को नकारा नहीं जा सकता; परंतु हमलों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, अब फिर से कमियों और आत्मनिरीक्षण की ओर जाने का समय आ रहा है । कांग्रेस सरकार के समय भारत पर हुए विभिन्न हमलों और बम विस्फोटों पर विचार करते हुए, इस घटना में जिस गति से कार्य हुआ और सभी एजेंसियों के समन्वय से जिस तेजी से जड तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है, वह अच्छा है । तकनीक भी आगे बढी है, इसलिए उसका भी सहयोग मिला; परंतु यह सब करते समय मीडिया को भी अपने दायित्व का ध्यान रखना चाहिए । कुछ मीडिया ऐसा कर भी रहे थे; परंतु इस आपातकाल में अधिकारियों के पीछे लगकर उनकी प्रतिक्रियाएं लेने का भी कार्य हो रहा था; जबकि पीडितों की जान बचाना उनकी प्राथमिकता थी । जब देश पर इस प्रकार का बडा आक्रमण होता है, तब एक ही समय में कई मोर्चों पर, वह भी तत्परता से और उतना ही विचारपूर्वक काम शुरू करना पडता है । इसमें पीडितों को अस्पताल भेजना, सबूत इकट्ठा करनेवाली विभिन्न एजेंसियों को सक्रिय करना, उसके लिए क्षेत्र को बंद करना, अग्निशमन तंत्र को चालू करना, प्रत्यक्षदर्शी सबूत इकट्ठा करना, उसी समय विभिन्न स्थानों पर गश्त बढाना, सी.सी.टी.वी. की जांच करना, जो सबूत मिल रहे हैं उनके पीछे-पीछे जाकर जड तक पहुंचने की क्रियाएं कार्यान्वित करना, उसमें विभिन्न एजेंसियों का उचित समन्वय स्थापित करना, मीडिया और नागरिकों को दिलासा देना, कहीं अन्यत्र इस प्रकार के आक्रमणों की संभावना तो नहीं है ? उसकी जांच करना, ऐसी एक नहीं अनेक बातें इसके अंतर्गत आती हैं । ये सभी बातें इस घटना के २ घंटे के भीतर कार्यान्वित हो गईं, जिससे इसका परिणाम भी अच्छा मिलता गया । विशेष रूप से, गृह मंत्री अमित शाह के स्वयं कुछ ही देर में तत्काल घटनास्थल पर पहुंचने से जनता को यह सुनिश्चित हो गया कि ‘सरकार ने इस बात को अत्यंत गंभीरता से लिया है ।’ ‘सरकार अपराधियों को दण्ड देगी’, यह विश्वास जनता को होना एक महत्त्वपूर्ण बात है ।

आर या पार !

मोदी सरकार द्वारा सदैव आतंकवादियों का प्रतिशोध लिए जाने को देखते हुए, जनता को यह निश्चित है कि इस घटना के बाद भी सरकार कुछ न कुछ प्रतिशोध अवश्य लेगी; परंतु ‘अब यह मार-पीट का खेल कितने दिन जारी रखना है ?’ यह प्रश्न भी समझदार और देशप्रेमी जनता को सता रहा है । जिहादियों के प्रत्येक हमले में कुछ लोगों की मृत्यु होने पर उन्हें उसके दुगने-तिगुने दंड देना; फिर कुछ दिनों बाद उनके द्वारा अलग स्वरूप का आक्रमण करने का साहस करना, यही सदैव चल रहा है । गुरदासपुर, पठानकोट, उरी, जम्मू स्थित सैन्य छावनी, अमरनाथ, पुलवामा और अब दिल्ली – आक्रमणों का यह चक्र थमने का नाम नहीं ले रहा है । जिस ध्येय से सरकार ने नक्सलवाद को समाप्त करने की स्थिति में ला दिया है, उसी ध्येय से अब भारत में होनेवाले अंतर्बाह्य आतंकवादी आक्रमणों को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रण करना चाहिए; अन्यथा ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशक्ति), ‘देश की जनता सुरक्षित है’ – ये सभी कोरी डींगें सिद्ध हो सकती हैं । भारत का हर दृष्टि से अधिकाधिक सक्षम होते जाना और दूसरी ओर पाकिस्तान का अधिकाधिक गरीब और कंगाल होते जाना – इस स्थिति में भी इस प्रकार का आक्रमण होना खेदजनक है । यदि इसके बाद भी और अधिक तीव्रता से प्रतिशोध लिया जाए, तो भी पाकिस्तान रूपी कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हो सकती । विशेषज्ञों के साथ-साथ सामान्य नागरिकों को भी ऐसा लगता है कि अब भारत को सदैव स्थायी विकल्पों का उपयोग करने की ओर कदम उठाने चाहिए । कितने दिनों तक ये आतंकवादी आक्रमण सहन करने हैं ? और कितने दिनों तक ‘स्ट्राइक’ और ‘ऑपरेशन’ करते रहना है ? अब तक हम सहस्रों सैनिकों और लाखों नागरिकों को इन जिहादियों के कारण गंवा चुके हैं । अब केंद्र सरकार को इस अवसर का लाभ उठाकर पाकिस्तान की कमर पूरी तरह से तोड देनी चाहिए । भारत के सिर पर बैठा यह पाप नष्ट हुए बिना भारत को शांति नहीं मिलेगी । ‘हिन्दू राष्ट्र’ इस एक नाम में इस पापस्थान को नष्ट करने की सूक्ष्म क्षमता है, यह सदैव निश्चित है !

अब सरकार को सदैव बार-बार हमले करनेवाले आतंकवादियों का प्राण बने इस पापस्थान को नष्ट करने का ही ध्येय रखना चाहिए !