स्वस्थ जीवन के लिए व्यायाम
‘हम अनेक बार सुबह जागने पर गर्दन अथवा कमर के अकडने का अनुभव करते हैं । ‘नींद शरीर को पुनर्बल प्राप्त कराने की तथा मन के विश्राम की एक अति आवश्यक प्रक्रिया है ।’, ऐसा हम मानते हैं । ‘पूरे दिन की भागदौड के उपरांत शरीर को आराम मिलकर तनाव अल्प हो’, यह हमारी अपेक्षा होती है । नींद से जागने पर हमें यदि शरीर में पीडा होती हो अथवा मांसपेशियों में अकडन हो, तो यह कष्ट हमारी नींद की पद्धति पर निश्चितरूप से प्रश्नचिन्ह उठाती है । सोने की उचित पद्धति के कारण पीडा अल्प होती है । नींद की अवधि एवं गुणवत्ता में सुधार आता है तथा नींद से जागने पर पीडा अल्प होती है ।
हम अपने जीवन का लगभग एक तिहाई भाग नींद में व्यतीत करते हैं । इस समय नींद की गुणवत्ता शारीरिक (फिजिओलॉजिकल) एवं मानसिक घटकों पर निर्भर होती है । सोने के लिए उपयोग की जानेवाली सामग्री, उदा. गद्दा, सिरहाना इत्यादि अनुचित पद्धति के हों अथवा हमारी सोने की पद्धति (पोश्चर) अनुचित हो, तो उससे शरीर को, विशेषकर रीढ की हड्डी को उचित आधार नहीं मिलता; जिसके परिणामस्वरूप कमर में अथवा गर्दन में पीडा होती है । औद्योगिक क्षेत्र में यह समस्या गंभीर बनती जा रही है ।
इस लेख में हम ‘नींद का एर्गाेनॉमिक्स, अर्थात सोते समय शरीर की उचित स्थिति, गद्दी, सिरहाना, पलंग तथा सोने की आदतों का अध्ययन एवं उपयोग; जिसके कारण शरीर पर तनाव आए बिना आरामदायक, स्वास्थ्यकर एवं शांत नींद मिलती है’, इस विषय में समझ लेते हैं ।

१. नींद की उचित पद्धति का महत्त्व
१ अ. नींद के लिए उचित गद्दा एवं सिरहाना आवश्यक : अच्छी नींद के लिए केवल आंखें बंद कर सोना पर्याप्त नहीं है, अपितु हमारे शरीर को, विशेषकर रीढ की हड्डी को उचित आधार मिलना महत्त्वपूर्ण होता है । जब हम सोते हैं, तब हमारी मांसपेशियों को विश्राम मिलता है तथा उससे रीढ की हड्डी पर आया तनाव अल्प होता है । यदि सिरहाना एवं गद्दा उचित न हो, तो रीढ की हड्डी प्राकृतिक स्थिति में नहीं रहती । उसके कारण सवेरे जागने पर पीठदर्द अथवा जोडों का दर्द हो सकता है ।
१ आ. प्राकृतिक नींद के कारण पीठ के दर्द पर उपचारात्मक परिणाम होना : पीठ का दर्द अनेक बार रीढ की हड्डी पर अधिक भार आने से होता है, उदा. भारी वस्तुएं उठाना, अकस्मात की जानेवाली गतिविधियां, लंबे समय तक अनुचित स्थिति में बैठना अथवा खडे रहना इत्यादि । प्राकृतिक नींद के कारण पीठदर्द पर उपचारात्मक परिणाम हो सकता है । रात को सोते समय रीढ की हड्डी पर भार अल्प होकर उसे प्राकृतिक एवं शारीरिक आकार में आधार मिले, तो वह दिनभर के कार्याें के कारण आए तनाव से उभर सकता है तथा सामान्य स्थिति में आ सकता है ।
१ इ. पीठ के बल अथवा करवट पर सोने से रीढ की हड्डियों के प्राकृतिक मोडों को आधार मिलना आवश्यक ! : सोते समय शरीर का दबाव संतुलित रूप से बंट जाने पर किसी भी एक भाग पर अधिक तनाव नहीं आएगा । सोने की उचित पद्धति के कारण (एर्गोनॉमिक्स के कारण) रक्त प्रवाह में सुधार आता है, मांसपेशियों को विश्राम मिलता है तथा रीढ की हड्डी प्राकृतिक ‘एस’ (S) के आकार में बनी रहती है । हमारे मेरुदंड को (स्पाइन को) ३ प्राकृतिक मोड होते हैं । चित्र क्र. १ में दिखाए अनुसार गर्दन में आगे झुका हुआ हल्का अंतर्वक्रीय मोड (Cervical Lordosis), छाती के पीछे स्थित बाह्यवक्र मोड (Thoracic Kyphosis), कमर के अगले भाग में स्थित अंतर्वक्रीय मोड तथा पीछे से देखने पर रीढ की हड्डी सीधी दिखाई देती है । जब हम पीठ अथवा करवट पर सोते हैं, तब रीढ की हड्डियों के प्राकृतिक मोडों को आधार मिले, तभी मांसपेशियों के हल्के होने पर रीढ की हड्डियों पर तनाव नहीं आता ।

२. नींद की स्थिति अथवा ढांचा (पोश्चर)
अ. सोने की स्थिति यदि उचित हो, तो हम नींद में भी रीढ की हड्डी की रक्षा कर सकते हैं । सोने पर शरीर की स्थिति में परिवर्तन होना आवश्यक है; क्योंकि एक ही स्थिति में लंबे समय तक सोने से कोमल भागों पर दबाव आता है तथा उससे मांसपेशियां अकड जाती हैं । जब शरीर का कुछ भाग गद्दे से सटा होता है, उस समय वहां रक्त की आपूर्ति अल्प होती है । इस अवस्था को ‘इस्केमिया’ कहते हैं । इसके कारण रात को नींद में हमारे शरीर की स्थिति में अपनेआप ही परिवर्तन होते रहते हैं । एक प्रकार से यह शरीर की रक्षाप्रणाली होती है ।
आ. अधिकांश लोग सोने के उपरांत लगभग २० बार शरीर की स्थिति में परिवर्तन करते हैं तथा अनेक लोग एक ही करवट पर सोना अधिक पसंद करते हैं ।
इ. वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार ६५ प्रतिशत लोग करवट पर (Side lying) सोते हैं, ३० प्रतिशत लोग पीठ के बल (Supine position) सोते हैं, जबकि ५ प्रतिशत लोग पेट के बल (Prone position) सोते हैं ।
ई. आयु के अनुसार नींद की आदतों में परिवर्तन होता है । वृद्ध लोक एक विशिष्ट करवट पर (अधिकांश दाहिनी करवट पर) सोते हैं । वे अल्प समय तक सोते हैं तथा सोने की स्थिति में संभवतः परिवर्तन नहीं करते ।
– श्रीमती अक्षता रूपेश रेडकर, भौतिकोपचार विशेषज्ञ (फिजियोथेरपिस्ट), फोंडा, गोवा (२६.८.२०२५)
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