साधको, साधनायात्रा भले ही संघर्षपूर्ण लगे, तब भी आश्वस्त रहें कि ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी जैसे गुरु पत्थर रूपी जीव से देवत्व से युक्त सुंदर मूर्ति अवश्य तराशेंगे !’

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी

१. शिल्पकार के घाव सहन न करनेवालेपत्थर का मंदिर के बाहर धूप में वैसे ही पडे रहना, जबकि घाव सहन करनेवाले पत्थर सेशिल्पकार द्वारा देवता की सुंदर मूर्ति बनाई जाना 

‘कुछ ही दिन पूर्व मैंने एक छोटी-सी; परंतु एक उद्बोधक कहानी पढी । उस कहानी में दो पत्थर होते हैं । शिल्पकार उन दोनों पत्थरों से शिल्प बनाना आरंभ करता है, उस समय उनमें से एक पत्थर कहता है, ‘मुझे ये घाव सहन नहीं होते । मुझे इससे कष्ट हो रहा है ।’; परंतु दूसरा पत्थर शिल्पकार के घाव सहन करता है तथा अंततः उस पत्थर से देवता की एक सुंदर मूर्ति बनती है । पहला पत्थर वैसे का वैसा बना रहता है तथा उसे मंदिर के बाहर धूप में पडा रहना पडता है; परंतु जो पत्थर घाव सहन करता है, वह मंदिर के गर्भगृह में ‘देवता’ के रूप में पूजा जाता है ।

श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ

२. सुंदर शिल्प बनाने हेतु ईश्वर के द्वारासनातन के प्रत्येक साधक को परात्पर गुरुदेवजी को सौंपा जाना; परंतु चूकों के भय के कारण साधकगुरुदेवजी को अपेक्षित साधना न कर पाना

साधनायात्रा भी संघर्षपूर्ण ही है । इस यात्रा में हम आरंभ में जीवन के सभी प्रकार के घाव (कष्ट, समस्याएं इत्यादि) झेलकर जब स्वयं को तैयार करते हैं, तब हमारा आगे का मार्ग प्रशस्त होता है । साधना अथवा सेवा करते समय चूकें तो होंगी ही; क्योंकि केवल ईश्वर ही एकमात्र परिपूर्ण हैं । ‘चूकों से डरना, उनका तनाव लेना, साथ ही चूकों के भय से नेतृत्व न लेकर जितनी संभव है, उतनी ही सेवा करना’, इसके कारण साधक गुरुदेवजी की अपेक्षा के अनुसार तैयार नहीं होता । ‘हम पत्थर हैं तथा हमारे शिल्पकार हमारे गुरुदेवजी हैं । सुंदर शिल्प बनाने हेतु ईश्वर ने सनातन के प्रत्येक साधक को गुरुदेवजी को सौंपा है’, ऐसा प्रत्येक साधक को लगना चाहिए ।

३. साधक उत्तम शिष्यों के उदाहरणों से सीखकर साधना के लिए अपार परिश्रम करें !

साधक चूकों से सीखने का आनंद लें । चूकों के भय से साधकों ने साधना नहीं की होती, तो आज हमें अनेक उत्तम शिष्य एवं संत देखने को नहीं मिलते । स्वामी समर्थ रामदासस्वामीजी के शिष्य कल्याणस्वामी, इसका एक उत्तम उदाहरण हैं । गुरुसेवा करते समय उन्होंने अपार परिश्रम उठाए तथा मनोभाव से गुरुसेवा की । वर्तमान का एक उदाहरण है श्री अनंतानंद साईशजी के सर्वाेत्तम शिष्य प.पू. भक्तराज महाराजजी ! इन बडे-बडे संतों ने भी उनके जीवन में अपार कष्ट सहन किए हैं । उन्हें समष्टि के कारण तथा समष्टि हेतु सभी कष्ट भोगने पडे थे ।

४. साधकों को स्वभावदोष एवं अहं से लडकर तथा चूकों से तैयार होकर‘उत्तम शिष्य’ बनने हेतु प्रयास करें !

साधकों को तो केवल स्वयं के स्वभावदोष एवं अहं से लडना है । कोई चूक हुई अथवा किसी ने कुछ बोला, तो उससे साधक इतने आहत हो जाते हैं कि उन विचारों में उनके कुछ घंटे अथवा कुछ दिन व्यर्थ चले जाते हैं । हमारी निरंतर परीक्षा लेनेवाले गुरु यदि हमें न मिले होते, तो साधकों का क्या होता ? ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने साधकों को फूल की भांति संभाला है’, इसका भान रखकर साधकों को उत्साह के साथ साधना के प्रयास करने चाहिए । चूक हुई, तो होने दीजिए; परंतु ईश्वर के लिए नेतृत्व लेकर श्रद्धापूर्वक, लगन के साथ तथा पूछकर की जानेवाली कृति साधना में आगे ही ले जाती है । साधकों को चूकों से तैयार होकर ‘उत्तम शिष्य’ बनने हेतु प्रयास करने चाहिए ।

५. साधक निर्मलता से स्वयं की चूकें बताकर उन चूकों से सीखने का आनंद उठाएं !

साधक स्वयं से किए गए अच्छे प्रयास बताते हैं तथा भावजागृति हेतु किए गए प्रयास बताते हैं; तो उसी प्रकार उन्हें उतनी ही निर्मलता से स्वयं की चूकें भी बताकर उन चूकों से सीखने का आनंद उठाना चाहिए । वास्तव में देखा जाए, तो साधकों का पहला प्रयास ‘सेवा में चूकें होंगी ही नहीं’, ऐसा ही होना चाहिए: परंतु सभी प्रकार की सावधानी बरतकर भी सेवा में कोई चूक हो भी गई, तब भी साधकों को हतोत्साहित नहीं होना चाहिए । ‘ईश्वर ने सेवा परिपूर्ण करने के लिए एक और अवसर दिया है’, यह भाव रखकर वे और प्रयास करें ।

अब साधकों को ही यह सुनिश्चित करना होगा कि क्या उन्हें अल्पावधि के लिए कष्ट सहन कर उसके उपरांत स्वयं से एक सुंदर मूर्ति बने, ऐसा अच्छा पत्थर बनना है अथवा तैयार होने के लिए थोडा कष्ट सहन किए बिना केवल धूप में पडे रहनेवाला पत्थर बनना है !’

– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ