पिछले कुछ दिनों से लद्दाख में असंतोष का वातावरण है । पर्यावरणवादी कार्यकर्ता, शिक्षक तथा ‘थ्री इडियट्स’ नामक हिन्दी चलचित्र में ‘रैंचो’ की प्रेरणा के रूप में पहचाने जानेवाले सोनम वांगचुक ने १० सितंबर से ‘लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले’, इस मांग के लिए अनशन आरंभ कर दिया है । (सोनम वांगचुक को कुछ दिन पूर्व ही बंदी बनाया गया है) निरंतर ३५ दिनों तक चलनेवाले इस अनशन की कालावधि में उनके गुट के २ व्यक्ति चक्कर खाकर गिर गए, जिससे उन्हें रुग्णालय में भरती किया गया । इस कारण स्थानीय लोग क्रोधित हुए तथा उन्होंने भाजपा के कार्यालय में आग लगा दी । यह सबकुछ जनता के सामने ही हो रहा था; पर एक दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना लोगों के ध्यान में नहीं आई ।

१. केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक की स्वयंसेवी संस्था को ‘कारण बताओ’ नोटिस भेजी
२० अगस्त को, केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने वांगचुक की स्वयंसेवी संस्था ‘स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ (SECML) को ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी की थी ।
‘कारण बताओ’ नोटिस क्या है ? जब किसी व्यक्ति, संस्था अथवा प्रतिष्ठान पर कानून के उल्लंघन का संदेह होता है, तो संबंधित प्राधिकरण उस व्यक्ति/संस्था से यह प्रश्न करता है कि ‘आप पर कार्रवाई क्यों न की जाए ?’ इसके लिए सामनेवाले को कारण और सबूत पेश करने का अवसर दिया जाता है । यदि संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है, तो लाइसेंस (अनुज्ञप्ति) रद्द करना, जुर्माना लगाना, जैसी कठोर कार्रवाई की जाती है ।

२. ‘विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम’ के अंतर्गत विदेशी निधि प्राप्त करने की प्रक्रिया
भारत में किसी भी स्वयंसेवी संस्था अथवा संगठन को विदेश से निधि (फंड) स्वीकार करनी हो, तो उसके लिए ‘विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम २०१० (एफ.सी.आर.ए.)’ के अंतर्गत लाइसेंस आवश्यक है । यह निधि पारदर्शी पद्धति से केवल अनुमति दिए कार्यों के लिए ही उपयोग की जानी चाहिए । विदेशी चंदे का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों, आंदोलनों अथवा व्यक्तिगत लाभ के लिए करने पर पूर्णतया मनाही है । उल्लंघन होने पर संस्था का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है तथा भविष्य की निधि पर स्थायी प्रतिबंध लगाया जा सकता है ।
३. वांगचुक की स्वयंसेवी संस्था द्वारा विदेशी निधि लेने पर प्रतिबंध के पश्चात भी ऐसी निधि लेना
२० अगस्त को गृह मंत्रालय द्वारा वांगचुक की स्वयंसेवी संस्था को भेजी गई नोटिस में सीधे पूछा गया था, ‘आपकी स्वयंसेवी संस्था द्वारा निरंतर ‘एफ.सी.आर.ए.’ के नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो आपका लाइसेंस रद्द क्यों न कर दिया जाए ?’ इस पर वांगचुक विदेशी चंदे का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर सकते थे; परंतु उन्होंने ऐसा न करके उस नोटिस की अनदेखी कर दी ।
वांगचुक की संस्था ‘एस.ई.सी.एम.ओ.एल.’ आधिकारिक तौर पर विदेशी चंदा स्वीकार करने के लिए पंजीकृत नहीं थी । ‘एफ.सी.आर.ए.’ अधिनियम के अनुसार, ऐसी संस्थाओं को विदेश से निधि लेना कानूनन प्रतिबंधित है; परंतु उन पर आरोप था कि यह संस्था अप्रत्यक्ष रूप से अन्य तरीकों से चंदा जुटा रही थी । सरकार ने इस आंदोलन के आरंभ होने से पूर्व ही जिसकी जांच आरंभ कर दी थी ।
गृह मंत्रालय ने १० सितंबर को ‘एस.ई.सी.एम.ओ.एल.’ को याद दिलाने के लिए दूसरा नोटिस (रिमाइंडर) भेजा । ठीक इसी दिन, सोनम वांगचुक ने ‘लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने’ की मांग को लेकर अनशन आरंभ कर दिया ।
इसलिए अब प्रश्न यह है कि : क्या यह आंदोलन वास्तव में राज्य की मांग के लिए था या वांगचुक स्वयं की संस्था पर सरकारी कार्रवाई से बचने के लिए युवाओं को भडकाना चाहते थे ?
४. क्या सोनम वांगचुक के आंदोलन केपीछे कोई गुप्त उद्देश्य (हिडेन एजेंडा) था ?
२५ सितंबर २०२५ तक, गृह मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर ‘एस.ई.सी.एम.ओ.एल.’ का लाइसेंस रद्द कर दिया है । अब यह संस्था किसी भी प्रकार का विदेशी चंदा स्वीकार नहीं कर पाएगी । इस पर कुछ उदारवादी समूह, स्वयंसेवी संस्थाएं तथा विरोधी दल सरकार के विरुद्ध रोना आरंभ कर देंगे; किंतु आम जनता को एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए कि विदेशी निधि का नियंत्रण भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है । लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में विदेशी निधि के नाम पर संदिग्ध लेन-देन होना चिंता का विषय है । वैसे देखा जाए तो लद्दाख के लोगों की मांगें स्वाभाविक हैं । पहले जम्मू-कश्मीर राज्य के दौरान कांग्रेस सरकार ने निरंतर लद्दाख की जनता की उपेक्षा की थी । लद्दाख में बढे पर्यटन के कारण पर्यावरण संबंधी कुछ समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं; परंतु दूसरी ओर क्या सोनम वांगचुक के आंदोलन के पीछे उनकी संस्था पर सरकारी कार्रवाई से बचने का गुप्त उद्देश्य (हिडन एजेंडा) था ? यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है ।
उत्तरदायी कोई भी हो, प्रश्न कुछ भी हो; परंतु इस पूरे आंदोलन में सबसे पीडादायक बात यह है कि ४ निर्दोष लद्दाख निवासियों की राजनीतिक हानि हुई ।
कु. शांभवी थिटे, विदेश नीति अध्येता, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, देहली. (२३.९.२०२५)
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