
मध्य के खजुराहो के श्री वामन मंदिर में मुगलों द्वारा तोडी गई भगवान श्रीविष्णु की ७ फुट ऊंची मूर्ति को पुनर्स्थापित करने की मांग से संबंधित याचिका, सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार कर दी । इस निर्णय में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता राकेश दलाल की याचिका पर विचार करना अस्वीकार करते हुए कहा, ‘वर्तमान में यह मूर्ति जिस स्थिति में है, वह उसी स्थिति में रहेगी । यदि श्रद्धालुओं को पूजा करनी है, तो वे अन्य मंदिर में जा सकते हैं । यह केवल प्रसिद्धि हेतु प्रविष्ट की गई याचिका है । आप जाइए तथा अब ईश्वर को ही इसके लिए कुछ करने के लिए कहिए । आप स्वयं को श्रीविष्णु के परमभक्त कहते हैं, तो आप भगवान से प्रार्थना कीजिए तथा ध्यान कीजिए !’ सर्वाेच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा की गई यह टिप्पणी हिन्दुओं के लिए आश्चर्यजनक है । वर्तमान समय में हिन्दू वास्तुओं का जो इस्लामीकरण हुआ है, उसके प्रति हिन्दुओं में रोष है । इन वास्तुओं को वापस लेने हेतु हिन्दू लोकतांत्रिक पद्धति से लडाई लडते हुए न्याय प्राप्त करने की प्रतीक्षा में हैं । उसके कारण पूरे भारत के विभिन्न न्यायालयों में ऐसी याचिकाएं प्रविष्ट की गई हैं; परंतु सर्वाेच्च न्यायालय के खंडपीठ द्वारा ही उक्त वक्तव्य दिए जाने से हिन्दुओं में गहरा आक्रोश व्याप्त है । हिन्दुओं ने सामाजिक माध्यमों द्वारा यह आक्रोश व्यक्त किया । स्वतंत्रता के उपरांत देश में अनेक सरकारें आईं तथा गईं; परंतु हिन्दुओं पर होनेवाले अत्याचार अल्प नहीं हुए । ‘पुलिस, प्रशासन अथवा राजनेता, इनमें किसी ने भी हिन्दुओं के साथ न्याय नहीं किया, तब भी, न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से निश्चित ही न्याय मिलेगा, भोले हिन्दू यह आशा रखे हुए थे; किंतु सर्वाेच्च न्यायालय की इस भूमिका के कारण क्या यह मान लिया जाए कि अब यह आशा भी पूरी तरह धुंधली हो गई है ? हिन्दुओं के इस अपेक्षाभंग की अनदेखी नहीं की जा सकती ।

हिन्दू ही हैं पीडित !
किसी भी प्रकरण में निर्णय तक पहुंचने के लिए न्यायाधीशों को सर्वांगीण विचार कर तथा कानून की चौखट में रहकर न्यायदान करना पडता है, इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता । उसके कारण इस प्रकरण में सर्वाेच्च न्यायालय को ऐसा कुछ दिखाई दिया होता, तो उसका संज्ञान लेकर यह याचिका निरस्त की जा सकती थी । जैसे, खंडपीठ को ऐसा लगा कि यह याचिका प्रसिद्धि के लिए ही प्रविष्ट की गई है, तो याचिकाकर्ता को चेतावनी देकर अथवा उस पर आर्थिक दंड लगाकर इस याचिका का निपटारा किया जा सकता था; परंतु खंडपीठ ने हिन्दुओं के देवताओं पर यह जो टिप्पणी की, क्या वास्तव में उसकी आवश्यकता थी ?, यह प्रश्न हिन्दुओं के मन में उठ रहा है । वर्तमान समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दुओं के देवता, धर्म एवं धर्मग्रंथों पर अति निम्न स्तर की टिप्पणी की जा रही है । इस विषय में अनेक प्रकरणों पर न्यायालयीन प्रक्रिया चल रही है । भारत के संविधान में भी ‘धार्मिक भावना’ एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है तथा ‘उसके प्रति संवेदनशीलता रखना आवश्यक है’, इस सूत्र पर समाज एवं कानून विशेषज्ञों में दो राय नहीं है । ऐसा होते हुए भी ‘सर्वाेच्च न्यायालय के एक खंडपीठ जिसमें स्वयं मुख्य न्यायाधीश विराजमान थे, उस खंडपीठ की ओर से हिन्दुओं के देवताओं के विषय में इस प्रकार के वक्तव्य कैसे दिए गए ?, हिन्दुओं के लिए यह अकल्पनीय है । इस प्रकरण में भी हिन्दू लोकतांत्रिक पद्धति से राष्ट्रपति को पत्र लिखना, ज्ञापन प्रस्तुत करना अथवा सामाजिक माध्यमों पर मत व्यक्त करना जैसी कृतियां करते हुए दिखाई दे रहे हैं । यदि मुसलमानों से संबंधित किसी याचिका पर सुनवाई चली होती, तो क्या सर्वाेच्च न्यायालय यही भूमिका लेता ? ऐसा होता, तो अब तक ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाकर न्यायालयीन भवनों में तोडफोड अथवा हिंसक गतिविधियों का सत्र चल रहा होता !

इतने दशकों से सभी घटक हिन्दुओं की उपेक्षा करते आए हैं । संविधान ने व्यक्ति, समूह अथवा समाज को जो अधिकार प्रदान किए हैं, उनकी रक्षा के लिए न्यायव्यवस्था होती है; परंतु हिन्दुओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में न्यायव्यवस्था भी असफल सिद्ध हो रही है, क्या हिन्दुओं को ऐसा मान लेना चाहिए ? यदि ऐसा है, तो जब हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं, ऐसी स्थिति में हिन्दुओं को अपनी धार्मिक भावनाओं को संजोने के लिए किसकी ओर देखना चाहिए ?
रामजन्मभूमि प्रकरण में हिन्दुओं ने लंबी न्यायालयीन लडाई लडी, वह केवल न्यायतंत्र के प्रति विश्वास के बल पर ही ! बहुसंख्यक हिन्दुओं को उन्हीं के देश में उनके महत्त्वपूर्ण आस्था केंद्रों के विषय में सैकडों वर्षाें तक प्रतीक्षा करना हिन्दुओं के लिए लज्जाप्रद था; परंतु न्यायप्रिय हिन्दुओं ने उसे भी सहन किया । परंतु अब जागृत हिन्दू प्रश्न उठाने लगे हैं । न्यायपालिका को हिन्दुओं की इस अस्वस्थता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । सर्वाेच्च न्यायालय के वक्तव्यों के कारण आहत होने से उन्हें यातनाएं हुईं, तो उन्हें समझना होगा । न्यायालय के किसी भी निर्णय को शांति से स्वीकार करनेवाला तथा पापभीरू हिन्दू आज उसी न्यायतंत्र पर क्षुब्ध क्यों है ? पिछले अनेक वर्षाें में विभिन्न न्यायालयों ने हिन्दुओं तथा अन्य धर्मियों के विषय में जो भी निर्णय दिए, हिन्दू समाजमानस पर उनके परिणाम हो रहे हैं । अनेक बार न्यायालयों ने मुसलमानों के संदर्भ में सदैव प्रमाण, स्वामित्व के अधिकार, धार्मिक प्रथा-परंपराओं के परिप्रेक्ष्य में निर्णय दिए; परंतु ‘जाइए और नमाज पढिए’, ऐसा वक्तव्य कभी नहीं दिया है । ईसाइयों के संदर्भ में भी न्यायालय सदैव संविधान के अनुसार निर्णय देता है; परंत ‘जाइए और चर्च में प्रार्थना कीजिए’, यह सुझाव उसने कभी नहीं दिया । हिन्दुओं के प्रत्येक त्योहार एवं उत्सवों को मनाने के संबंध में अनेक विषय अभी भी न्यायालयीन पडताल के अंतर्गत लंबित हैं । कुछ वर्ष पूर्व मुसलमानों की भीड द्वारा की गई हिंसा के लिए सर्वाेच्च न्यायालय ने नूपुर शर्मा को उत्तरदायी ठहराया; परंतु हिंसा करानेवाले मुस्लिम समुदाय की भीड का क्या ? उन पर कौन कार्रवाई करेगा ? ‘यदि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, तो न्यायालय को भी निर्णय देते समय बिना किसी भेदभाव से धर्मनिरपेक्षता दिखानी चाहिए’, न्यायतंत्र से हिन्दुओं की ऐसी अपेक्षा है ।

आगे की दिशा !
भारत में हिन्दू समाज संविधान का जितना सम्मान करता है, उतना अन्य कोई समाज करता है क्या ? उसके कारण न्यायतंत्र का दायित्व भी बहुत बडा है । पिछले अनेक प्रकरणों में न्यायालयीन प्रक्रियाओं के समय जो विभिन्न टिप्पणियां की गईं, उसके कारण हिन्दुओं में कहीं न कहीं असंतोष व्याप्त है । ‘सत्य के पक्ष में होते हुए भी हमारे साथ अन्याय हो रहा है’, जब समाज में यह भावना बढने लगती है, उस समय उससे उत्पन्न होनेवाला क्षोभ उग्र रूप धारण कर लेता है । विश्व में जिन देशों में क्रांति हुई, उसका कारण यही क्षोभ था । भारत में लोकतंत्र के चारों स्तंभ बिना किसी कारण हिन्दुओं को ही प्रताडित कर रहे हैं । इस क्षोभ के कारण हिन्दुओं ने यदि कानून को हाथ में लेकर व्यवस्था के विरुद्ध लडाई घोषित की, तो उसका उत्तरदायी कौन होगा ? स्वयं को समाजसुधारक तथा ‘संविधान के पालनकर्ता’ कहलवानेवालों को इसका उत्तर ढूंढने का यही उचित समय है ! इससे ध्यान में आता है कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता क्यों है !
| भारत में लोकतंत्र के चारों ही स्तंभ हिन्दुओं पर अकारण प्रहार करते हैैं, इसलिए हिन्दू आक्रोशित हो जाएं, तो उसका उत्तरदायी कौन ? |
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